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Mahendragarh-Narnaul News: पर्यटन के क्षेत्र में नहीं बढ़ पाया महेंद्रगढ़, जिम्मेदार नहीं संभाल पाए ऐतिहासिक धरोहर
Sat, 21 Sep 2024 01:46 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Sat, 21 Sep 2024 01:46 AM IST
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महेंद्रगढ़। पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर के प्राचीन ऐतिहासिक महेंद्रगढ़ और माधोगढ़ के दो किलों के जीर्णोद्धार के लिए 16 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद भी इनका काम पूरा नहीं हो पाया है। यह दोनों ही किले अब लोगों के बीच खूब चर्चाओं में हैं। अब धीरे-धीरे यह दोनों ही किले अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए खंडहर होते जा रहे हैं।
इस ऐतिहासिक धरोहर को जिम्मेदार संभाल नहीं पाए। इसके कारण महेंद्रगढ़ क्षेत्र पर्यटन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद भी आगे नहीं बढ़ पाया। हालांकि अक्तूबर 2014 से जुलाई 2015 तक पर्यटन मंत्री भी जिले से भाजपा नेता प्रो. रामबिलास शर्मा ही थे। इनके प्रयासों से कुछ कार्य शुरू हुआ था, लेकिन अब जीर्णोद्धार का काम लंबे समय से बंद पड़ा है।
पांच वर्ष पूर्व दोनों किलों को पर्यटन केंद्र के रूप में शामिल कर 100 करोड़ का बजट तय किया था। इसके लिए पहली किस्त के रूप में दोनों के लिए करीब 30 करोड़ रुपये का बजट भी जारी किया गया था। दो साल पूर्व पर्यटन विभाग की ओर से महेंद्रगढ़ व माधोगढ़ किलों के जीर्णोद्धार के लिए करीब 19 करोड़ रुपये का बजट तय कर इनके जीर्णोद्धार का काम शुरू किया था।
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हालांकि महेंद्रगढ़ किले के लिए करीब 13.98 करोड़ रुपये तथा माधोगढ़ किले के लिए करीब 16 करोड़ रुपये का बजट तय किया था। महेंद्रगढ़ किले का करीब 50 प्रतिशत काम पूरा कर इसे बंद कर दिया गया। माधोगढ़ किले का अधिकांश काम पूरा हो चुका था। यहां रानी महल व तालाब के जीर्णोद्धार हुआ था, लेकिन मुख्य किले की दीवारें मरम्मत के इंतजार में गिरने लगी हैं, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते यह पूरी राशि भी इन किलों पर खर्च नहीं हो पाई।
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महेंद्रगढ़ किले के नाम से मिली थी जिले को पहचान
कानौड़िया ब्राह्मणों द्वारा आबाद किए जाने कि वजह से महेंद्रगढ़ शहर पहले कानौड़ के नाम से जाना जाता था। इतिहासकारों का कहना है कि 17वीं शताब्दी में मराठा शासक तात्या टोपे ने यहां एक किले का निर्माण करवाया था। 1861 में पटियाला रियासत के शासक महाराजा नरेंद्र सिहं ने अपने पुत्र महेंद्र सिहं के सम्मान में इस किले का नाम महेंद्रगढ़ रख दिया था। इसी किले के नाम कि वजह से ही जिले को महेंद्रगढ़ के रूप में पहचान मिली थी। अब यह ऐतिहासिक धरोहर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इस बार क्षेत्र के लोगों को उम्मीद जगी है कि आने वाला विधायक क्षेत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए अवश्य ही प्रयास करेगा।
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इस ऐतिहासिक धरोहर को जिम्मेदार संभाल नहीं पाए। इसके कारण महेंद्रगढ़ क्षेत्र पर्यटन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद भी आगे नहीं बढ़ पाया। हालांकि अक्तूबर 2014 से जुलाई 2015 तक पर्यटन मंत्री भी जिले से भाजपा नेता प्रो. रामबिलास शर्मा ही थे। इनके प्रयासों से कुछ कार्य शुरू हुआ था, लेकिन अब जीर्णोद्धार का काम लंबे समय से बंद पड़ा है।
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पांच वर्ष पूर्व दोनों किलों को पर्यटन केंद्र के रूप में शामिल कर 100 करोड़ का बजट तय किया था। इसके लिए पहली किस्त के रूप में दोनों के लिए करीब 30 करोड़ रुपये का बजट भी जारी किया गया था। दो साल पूर्व पर्यटन विभाग की ओर से महेंद्रगढ़ व माधोगढ़ किलों के जीर्णोद्धार के लिए करीब 19 करोड़ रुपये का बजट तय कर इनके जीर्णोद्धार का काम शुरू किया था।
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हालांकि महेंद्रगढ़ किले के लिए करीब 13.98 करोड़ रुपये तथा माधोगढ़ किले के लिए करीब 16 करोड़ रुपये का बजट तय किया था। महेंद्रगढ़ किले का करीब 50 प्रतिशत काम पूरा कर इसे बंद कर दिया गया। माधोगढ़ किले का अधिकांश काम पूरा हो चुका था। यहां रानी महल व तालाब के जीर्णोद्धार हुआ था, लेकिन मुख्य किले की दीवारें मरम्मत के इंतजार में गिरने लगी हैं, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते यह पूरी राशि भी इन किलों पर खर्च नहीं हो पाई।
महेंद्रगढ़ किले के नाम से मिली थी जिले को पहचान
कानौड़िया ब्राह्मणों द्वारा आबाद किए जाने कि वजह से महेंद्रगढ़ शहर पहले कानौड़ के नाम से जाना जाता था। इतिहासकारों का कहना है कि 17वीं शताब्दी में मराठा शासक तात्या टोपे ने यहां एक किले का निर्माण करवाया था। 1861 में पटियाला रियासत के शासक महाराजा नरेंद्र सिहं ने अपने पुत्र महेंद्र सिहं के सम्मान में इस किले का नाम महेंद्रगढ़ रख दिया था। इसी किले के नाम कि वजह से ही जिले को महेंद्रगढ़ के रूप में पहचान मिली थी। अब यह ऐतिहासिक धरोहर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इस बार क्षेत्र के लोगों को उम्मीद जगी है कि आने वाला विधायक क्षेत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए अवश्य ही प्रयास करेगा।