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Kurukshetra News: संता जैसा बाणा नहीं, गंगा जैसा स्नान नहीं रे हे सखी.... गीतों से जीवंत हो रहा लूर
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कुरुक्षेत्र। रत्नावली महोत्सव में रसिया नृत्य की प्रस्तुति देते कलाकार। संवाद
- फोटो : bah
कुरुक्षेत्र। मेरा भारत देश महान, पहले जैसा अब खाणा नहीं रहया हे सखी..., संता जैसा बाणा नहीं, गंगा जैसा स्नान नहीं रे हे सखी...। जब अंबाला कॉलेज की छात्राओं ने इस पारंपरिक गीत पर लूर नृत्य की प्रस्तुति शुरू की, तो सभागार में मौजूद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी सहित बुजुर्ग महिलाएं भी गुनगुनाने लगीं। 10 छात्राओं का यह लूर नृत्य दक्षिण हरियाणा की लुप्त प्राय लोक कला को जीवंत कर रहा था, जो पिछले पांच-छह दशकों से विलुप्त होने की कगार पर थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रदेश स्तरीय सांस्कृतिक महोत्सव रत्नावली ने इसे दो साल पहले पुनर्जीवित करने का सफल प्रयास किया। अब यह महोत्सव का मुख्य आकर्षण बन चुका है।
रत्नावली में लूर और रसिया नृत्यों को केंद्र में लाने की शुरुआत 2022 में हुई। विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग ने इन लुप्त प्राय कलाओं को बचाने की मुहिम छेड़ी।
बांगर क्षेत्र का है पारंपरिक महिला लोक नृत्य लूर
लूर हरियाणा के बांगर क्षेत्र का पारंपरिक महिला लोक नृत्य है, जो फाल्गुन माह में होली से पहले बसंत की रातों में किया जाता है। परंपरागत रूप से महिलाएं दो समूहों में आमने-सामने खड़ी होकर गीतों से प्रश्नोत्तर करती हैं और कई बार एक-दूसरे को छेड़ते हुए ताने मारती हैं। पहले इस कार्यक्रम को पुरुषों को देखने तक की अनुमति नहीं होती थी।
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डॉ. महासिंह पूनिया के प्रयास लाए रंग
विवि के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक रह चुके डॉ. महासिंह पूनिया ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ मिलकर 2023 में लूर नृत्य को जीवंत करने की पहल की थी। उन्होंने इसके लिए गहन रिसर्च भी की और संबंधित क्षेत्रों में इसकी बारीकी भी जानी। इसके बाद इसे रत्नावली महोत्सव के मंच पर उतारा गया व राजभवन में भी इसकी प्रस्तुति दी गई थी।
रसिया नृत्य को भी रत्नावली से मिली नई पहचान
उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र से सटे हरियाणवी इलाकों पलवल, होडल, फरीदाबाद में प्रचलित रसिया नृत्य को भी नई पहचान मिली। भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से प्रेरित यह सामूहिक नृत्य फाल्गुन में महिलाएं-पुरुष मिलकर करते हैं। ब्रज भाषा के लोकगीत हरियाणवी बोली में गाए जाते हैं जबकि पुरुष झांझ, खड़ताल, धमाल और नगाड़ा बजाते हैं। होली पर गांव-गलियों में धूम मचती थी लेकिन आधुनिकता के दौर में यह कम हो गई। रत्नावली ने इसे मंच देकर युवाओं और बुजुर्गों दोनों में लोकप्रिय बना दिया।
विवि में प्रवेश के साथ ही लूर के मंच के बारे में पूछ रहे दर्शक
इस वर्ष महोत्सव में प्रवेश करते ही दर्शक लूर और रसिया मंच की जानकारी जुटाने लगे हैं। कुर्सियां कम पड़ने पर भी लोग सभागार में घुसते रहे और पूरे प्रदर्शन के दौरान खड़े होकर आनंद लेते नजर आए। बुजुर्गों की पुरानी यादें ताजा हो गईं और युवा इनसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रहे हैं।
चोटिल होने के बाद भी लूर का अभ्यास करती रहीं छात्राएं
रत्नावली में लूर नृत्य की प्रस्तुति देने के दौरान अंबाला जोन में प्रथम स्थान पाने वाली एसए जैन कॉलेज की कई छात्राएं तैयारी के दौरान चोटिल हो गई थीं लेकिन उनकी लगन कम नहीं हुई। लूर नृत्य की प्रस्तुति करने वाली छात्रा अनू बताती है कि उनके व उनकी साथी प्रिया, जोनिसा व हरसीता के पैर में मोच आने पर भी वह पीछे नहीं हटी और अभ्यास जारी रखा।
छात्राएं लूर में दिखा रहीं रुचि : कमल राणा
कोरियोग्राफर कमल राणा ने बताया कि वह अलग-अलग कॉलेज की छात्राओं को कई साल से प्रशिक्षण दे रहे हैं लेकिन अंबाला कॉलेज में इस नृत्य का प्रशिक्षण लेने वाली ज्यादातर छात्राएं पंजाबी हैं और उन्हें हरियाणवी की ज्यादा समझ भी नहीं है। इसके बाद भी वह दक्षिण हरियाणा के इस लूर नृत्य में पूरी तरह मंझ चुकी हैं। छात्राओं ने रात-दिन रिहर्सल की, ताकि लुप्त नृत्य की मूल भावना को समझ सके और उसे बरकरार रख सके।
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रत्नावली में लूर और रसिया नृत्यों को केंद्र में लाने की शुरुआत 2022 में हुई। विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग ने इन लुप्त प्राय कलाओं को बचाने की मुहिम छेड़ी।
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बांगर क्षेत्र का है पारंपरिक महिला लोक नृत्य लूर
लूर हरियाणा के बांगर क्षेत्र का पारंपरिक महिला लोक नृत्य है, जो फाल्गुन माह में होली से पहले बसंत की रातों में किया जाता है। परंपरागत रूप से महिलाएं दो समूहों में आमने-सामने खड़ी होकर गीतों से प्रश्नोत्तर करती हैं और कई बार एक-दूसरे को छेड़ते हुए ताने मारती हैं। पहले इस कार्यक्रम को पुरुषों को देखने तक की अनुमति नहीं होती थी।
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डॉ. महासिंह पूनिया के प्रयास लाए रंग
विवि के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक रह चुके डॉ. महासिंह पूनिया ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ मिलकर 2023 में लूर नृत्य को जीवंत करने की पहल की थी। उन्होंने इसके लिए गहन रिसर्च भी की और संबंधित क्षेत्रों में इसकी बारीकी भी जानी। इसके बाद इसे रत्नावली महोत्सव के मंच पर उतारा गया व राजभवन में भी इसकी प्रस्तुति दी गई थी।
रसिया नृत्य को भी रत्नावली से मिली नई पहचान
उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र से सटे हरियाणवी इलाकों पलवल, होडल, फरीदाबाद में प्रचलित रसिया नृत्य को भी नई पहचान मिली। भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से प्रेरित यह सामूहिक नृत्य फाल्गुन में महिलाएं-पुरुष मिलकर करते हैं। ब्रज भाषा के लोकगीत हरियाणवी बोली में गाए जाते हैं जबकि पुरुष झांझ, खड़ताल, धमाल और नगाड़ा बजाते हैं। होली पर गांव-गलियों में धूम मचती थी लेकिन आधुनिकता के दौर में यह कम हो गई। रत्नावली ने इसे मंच देकर युवाओं और बुजुर्गों दोनों में लोकप्रिय बना दिया।
विवि में प्रवेश के साथ ही लूर के मंच के बारे में पूछ रहे दर्शक
इस वर्ष महोत्सव में प्रवेश करते ही दर्शक लूर और रसिया मंच की जानकारी जुटाने लगे हैं। कुर्सियां कम पड़ने पर भी लोग सभागार में घुसते रहे और पूरे प्रदर्शन के दौरान खड़े होकर आनंद लेते नजर आए। बुजुर्गों की पुरानी यादें ताजा हो गईं और युवा इनसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रहे हैं।
चोटिल होने के बाद भी लूर का अभ्यास करती रहीं छात्राएं
रत्नावली में लूर नृत्य की प्रस्तुति देने के दौरान अंबाला जोन में प्रथम स्थान पाने वाली एसए जैन कॉलेज की कई छात्राएं तैयारी के दौरान चोटिल हो गई थीं लेकिन उनकी लगन कम नहीं हुई। लूर नृत्य की प्रस्तुति करने वाली छात्रा अनू बताती है कि उनके व उनकी साथी प्रिया, जोनिसा व हरसीता के पैर में मोच आने पर भी वह पीछे नहीं हटी और अभ्यास जारी रखा।
छात्राएं लूर में दिखा रहीं रुचि : कमल राणा
कोरियोग्राफर कमल राणा ने बताया कि वह अलग-अलग कॉलेज की छात्राओं को कई साल से प्रशिक्षण दे रहे हैं लेकिन अंबाला कॉलेज में इस नृत्य का प्रशिक्षण लेने वाली ज्यादातर छात्राएं पंजाबी हैं और उन्हें हरियाणवी की ज्यादा समझ भी नहीं है। इसके बाद भी वह दक्षिण हरियाणा के इस लूर नृत्य में पूरी तरह मंझ चुकी हैं। छात्राओं ने रात-दिन रिहर्सल की, ताकि लुप्त नृत्य की मूल भावना को समझ सके और उसे बरकरार रख सके।