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राजभवन में आज होगी लूर नृत्य की प्रस्तुति
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रत्नावली महोत्सव में लूर नृत्य की प्रस्तुति देतीं कलाकार। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कभी प्राचीन समय में हरियाणवी संस्कृति की शान रहा लूर नृत्य भले ही अनेकों वर्षो से लुप्त हो गया था, लेकिन रत्नावली महोत्सव ने अब इसे नया आयाम दिया है। इस बार यह हरियाणा दिवस पर राजभवन में आयोजित समारोह के मंच की शान बनेगा। राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय व मुख्यमंत्री मनोहर लाल की मौजूदगी में लूर नृत्य की हरियाणवी कलाकारों द्वारा प्रस्तुति दी जाएगी। यह पहली बार होगा जब हरियाणा दिवस पर राजभवन में लूर नृत्य का आनंद लिया जाएगा।
लूर हरियाणा का मुख्य नृत्य है। जानकारों की मानें तो लूर नृत्य का नाम हरियाणा के बांगर क्षेत्र में लड़कियों के नाम पर रखा गया है। यह विशेष रूप से होली के त्योहार के दौरान किया जाता है। यह नृत्य सुखद वसंत के मौसम के आगमन और इसके साथ खेतों में रबी फसलों की बुवाई का प्रतीक है। लड़कियां आमतौर पर घाघरा, कुर्ती, चुंदरी, और चुंडा की अपनी पारंपरिक पोशाक पहनकर इस नृत्य में भाग लेती हैं।
केयू के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया बताते हैं कि राजभवन में लूर नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी, जो हरियाणवी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम करेगी। प्रदेश में करीब 40 साल से लूर नृत्य गायब हो गया था। अब 80 वर्ष के पड़ाव पर पहुंच चुकी महिलाएं बांगर क्षेत्र में यह नृत्य करती थी।
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इस नृत्य पर हिसार, लोहारू, कोसली व बांगर के अन्य क्षेत्र में रिसर्च किया गया। बुजुर्ग महिलाओं की तलाश कर डाक्यूमेंटेशन किया तो वीडियो भी बनाई। महिलाओं के इंटरव्यू लिए गए तो उनके द्वारा गाए गीतों को स्टूडियों में रिकार्ड किया गया। नृत्य पर उनके निर्देशन में विशेष टीम द्वारा गंभीरता से रिसर्च किया गया, जिसके बाद इस बार रत्नावली महोत्सव में यह प्रस्तुति दी गई। हर किसी ने इसकी जमकर सराहना की तो वहीं केयू प्रशासन ने भी निर्णय लिया है कि विश्वविद्यालय के अंतर्गत किसी भी कॉलेज में यूथ फेस्टिवल में यह एक नई विधा होगी।
रिसर्च में शामिल महिलाएं आई मंच पर
केयू के रत्नावली महोत्सव में उन बुजुर्ग महिलाओं को भी मंच पर लाया गया, जिन्हें लूर नृत्य के रिसर्च में शामिल किया गया। इन महिलाओं के उत्साह को हर किसी ने सराहा। बता दें कि लूर नृत्य की खोज का कनसेप्ट केयू के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया का ही था और उनके प्रयासों के चलते अब यह नृत्य राजभवन तक पहुंचा है।
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कुरुक्षेत्र। कभी प्राचीन समय में हरियाणवी संस्कृति की शान रहा लूर नृत्य भले ही अनेकों वर्षो से लुप्त हो गया था, लेकिन रत्नावली महोत्सव ने अब इसे नया आयाम दिया है। इस बार यह हरियाणा दिवस पर राजभवन में आयोजित समारोह के मंच की शान बनेगा। राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय व मुख्यमंत्री मनोहर लाल की मौजूदगी में लूर नृत्य की हरियाणवी कलाकारों द्वारा प्रस्तुति दी जाएगी। यह पहली बार होगा जब हरियाणा दिवस पर राजभवन में लूर नृत्य का आनंद लिया जाएगा।
लूर हरियाणा का मुख्य नृत्य है। जानकारों की मानें तो लूर नृत्य का नाम हरियाणा के बांगर क्षेत्र में लड़कियों के नाम पर रखा गया है। यह विशेष रूप से होली के त्योहार के दौरान किया जाता है। यह नृत्य सुखद वसंत के मौसम के आगमन और इसके साथ खेतों में रबी फसलों की बुवाई का प्रतीक है। लड़कियां आमतौर पर घाघरा, कुर्ती, चुंदरी, और चुंडा की अपनी पारंपरिक पोशाक पहनकर इस नृत्य में भाग लेती हैं।
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केयू के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया बताते हैं कि राजभवन में लूर नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी, जो हरियाणवी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम करेगी। प्रदेश में करीब 40 साल से लूर नृत्य गायब हो गया था। अब 80 वर्ष के पड़ाव पर पहुंच चुकी महिलाएं बांगर क्षेत्र में यह नृत्य करती थी।
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इस नृत्य पर हिसार, लोहारू, कोसली व बांगर के अन्य क्षेत्र में रिसर्च किया गया। बुजुर्ग महिलाओं की तलाश कर डाक्यूमेंटेशन किया तो वीडियो भी बनाई। महिलाओं के इंटरव्यू लिए गए तो उनके द्वारा गाए गीतों को स्टूडियों में रिकार्ड किया गया। नृत्य पर उनके निर्देशन में विशेष टीम द्वारा गंभीरता से रिसर्च किया गया, जिसके बाद इस बार रत्नावली महोत्सव में यह प्रस्तुति दी गई। हर किसी ने इसकी जमकर सराहना की तो वहीं केयू प्रशासन ने भी निर्णय लिया है कि विश्वविद्यालय के अंतर्गत किसी भी कॉलेज में यूथ फेस्टिवल में यह एक नई विधा होगी।
रिसर्च में शामिल महिलाएं आई मंच पर
केयू के रत्नावली महोत्सव में उन बुजुर्ग महिलाओं को भी मंच पर लाया गया, जिन्हें लूर नृत्य के रिसर्च में शामिल किया गया। इन महिलाओं के उत्साह को हर किसी ने सराहा। बता दें कि लूर नृत्य की खोज का कनसेप्ट केयू के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया का ही था और उनके प्रयासों के चलते अब यह नृत्य राजभवन तक पहुंचा है।