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लोकगीत हमारी धरोहर, इतिहास और संस्कारों का जीवंत दस्तावेज : प्रो. महासिंह

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 04 Feb 2026 01:52 AM IST
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Folk songs are a living document of our heritage, history and culture: Prof. Maha Singh
कुरुक्षेत्र। निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया प्रतिभागियों को संबो​धित करते हुए। संवाद
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रशिक्षण अनुसंधान संस्थान (आईटीटीआर) में हरियाणवी लोकगीत विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का समापन मंगलवार को हुआ। जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान व लोक संपर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि लोकगीतों की सांस्कृतिक परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और यह एक समृद्ध मौखिक इतिहास का हिस्सा है। लोकगीतों के डॉक्यूमेंटेशन के माध्यम से युवाओं को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है, ताकि वर्तमान पीढ़ी अपने अतीत के सांस्कृतिक इतिहास से परिचित हो सके।
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उन्होंने कहा कि हर्षचरित और बाणभट्ट की आत्मकथा से प्रमाण मिलता है कि सातवीं सदी में राजधानी थानेसर में महाराजा हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री के विवाह अवसर पर बरातियों का स्वागत गीत गाकर किया गया था।
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लोकगीत हमारी सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये हमारी धरोहर और हमारा इतिहास हैं। इन गीतों में सभी संस्कार समाहित हैं और इनके माध्यम से सामाजिक व नैतिक मूल्यों का निर्धारण होता रहा है।
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प्रो. पूनिया ने बताया कि लोकगीतों का उद्देश्य लोक परंपराओं का संरक्षण करना है। मनोरंजन के साथ-साथ इनका समाज में विशेषकर महिलाओं पर सकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने पगड़ी बांधने और महिलाओं की ओर से लंबे केश रखने को स्वास्थ्य व पर्यावरण के अनुकूल परंपराएं बताया। विद्यार्थियों ने आईआईएचएस के डॉ. वीर विकास के निर्देशन में लोक नृत्यों की सुंदर प्रस्तुति दी। आईटीटीआर की प्राचार्या प्रो. अनिता दुआ ने कहा कि हरियाणा का लोक संगीत यहां की सांस्कृतिक पहचान है जिसके कारण प्राचीन परंपराएं आज भी जीवंत हैं। इस मौके पर संगीत एवं नृत्य क्लब की इंचार्ज डॉ. रोहिणी, रीना यादव, डॉ. दिग्विजय सिंह, डॉ. अंग्रेज सिंह सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।
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