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Kurukshetra News: डेरा फतेह सिंह और सुरमी में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से पहुंचे किसान
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पिहोवा। स्थानीय लोगों से प्राकृतिक खेती बारे चर्चा करते आंधे प्रदेश एवं तेलंगाना से आए किसान। स
पिहोवा। उपमंडल के गांव डेरा फतेह सिंह और सुरमी में आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना से आए किसानों ने एक शिविर लगाया। इसका उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और किसानों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। टीम के छह सदस्यों ने किसान परमजीत सिंह और सुखविंदर सिंह के खेतों का निरीक्षण किया।
उन्होंने किसानों के साथ प्राकृतिक खेती से जुड़े अनुभव और व्यावहारिक जानकारियां साझा कीं। उपमंडल कृषि अधिकारी डॉ. मनीष वत्स, खंड कृषि अधिकारी डॉ. अनिल और कृषि पर्यवेक्षक जगसीर सिंह भी इसमें शामिल हुए। टीम ने बताया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों और जैविक पदार्थों का उपयोग होता है, इससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम होती है। यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित खाद्य उत्पादन टिकाऊ कृषि के आधार हैं। किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू करने को प्रोत्साहित किया गया।
पराली प्रबंधन पर जोर
टीम ने धान की पराली और अन्य फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उचित प्रबंधन पर विशेष जोर दिया। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के सूक्ष्म जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. मनीष वत्स ने किसानों से प्राकृतिक खेती की उपयोगी तकनीकों की जानकारी प्राप्त करने की अपील की।
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उन्होंने किसानों के साथ प्राकृतिक खेती से जुड़े अनुभव और व्यावहारिक जानकारियां साझा कीं। उपमंडल कृषि अधिकारी डॉ. मनीष वत्स, खंड कृषि अधिकारी डॉ. अनिल और कृषि पर्यवेक्षक जगसीर सिंह भी इसमें शामिल हुए। टीम ने बताया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों और जैविक पदार्थों का उपयोग होता है, इससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम होती है। यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित खाद्य उत्पादन टिकाऊ कृषि के आधार हैं। किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू करने को प्रोत्साहित किया गया।
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पराली प्रबंधन पर जोर
टीम ने धान की पराली और अन्य फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उचित प्रबंधन पर विशेष जोर दिया। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के सूक्ष्म जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. मनीष वत्स ने किसानों से प्राकृतिक खेती की उपयोगी तकनीकों की जानकारी प्राप्त करने की अपील की।
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