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Kurukshetra News: ढोल- नगाड़े व सारंगी की धुनों से गूंजा ब्रह़्मसरोवर, जंगम जोगी कलाकारों ने भी बांधा समां

Sun, 16 Nov 2025 01:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र Updated Sun, 16 Nov 2025 01:42 AM IST
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Brahma Sarovar resonated with the beats of drums and sarangi, and the wandering Jogi artists also enthralled the audience.
अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के पहले दिन ही पवित्र ब्रह्मसरोवर की छटा ढोल-नगाड़ों व सारंगी की धुनों में रंगी नजर आई। दूर दराज से पहुंचे लोगों ने ढोल-नगाड़े की थाप पर नाचकर गीता जयंती का लुप्त उठाया। जंगम जोगी कलाकारों ने भी समां बांध दिया। जोगिया सारंगी कलाकारों ने प्रस्तुति देकर सभी का मन मोह लिया। कलाकारों में पुश्तैनी परंपरा को जीवित रखने के लिए पारंपरिक भजनों की प्रस्तुति दी। सुभाष चंद, तारा राम व इस्लाम अली की टीम ने हीर रांझा की कहानियों को सारंगी की धुनों पर गाकर सुनाया। कलाकारों की प्रस्तुति को देखने के लिए ब्रह्मसरोवर के तट पर लोगों का जमावड़ा लग गया तो युवक-युवतियां झूमते रहे।
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कलाकारों ने कहा कि वह हर साल गीता जयंती महोत्सव व सूरजकुंड मेले में लोगों के सामने हरियाणवी लोक संगीत की प्रस्तुति देकर लोगों को संस्कृति से अवगत कराते हैं। वहीं जंगम जोगी ग्रुप ने भगवान शिव की आराधना के माध्यम से शिव और पार्वती की गाथा गाकर लोगों को शैव दर्शन के साथ-साथ लोक जीवन में शिव और पार्वती की कथा सुनाई। सारंगी गायन की परंपरा धीरे-धीरे लोकजीवन में समाप्त हो रही है।
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कलाकारों को नहीं मिलता उम्मीद अनुसार सम्मान



कलाकारों ने कहा कि महोत्सव में प्रशासन की ओर से प्रस्तुति के लिए बुलाया जाता है। कार्यक्रमों से उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से कमाई ( लगभग दो से ढाई हजार रुपये ) हो जाती है। मेले के अलावा अन्य दिनों में आसपास के गांवों में माह में दो या तीन बार किसी शादी-समारोह में प्रस्तुति देने का मौका मिल जाता है, लेकिन इससे कलाकारों का घर नहीं चलता। ऐसे में जब काम नहीं मिलता तो परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरी में इन कलाकारों को मजदूरी भी करनी पड़ती है। कलाकारों को उम्मीद अनुसार सम्मान नहीं मिल पाता जबकि ये कलाकार ही हमारी संस्कृति को संजीव किए हुए हैं।
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