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चार गांवों में गेहूं की फसल पर पीला रतुआ का हमला
Updated Tue, 27 Feb 2018 12:56 AM IST
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चार गांवों में गेहूं की फसल पर पीला रतुआ का हमला
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
जिला में गेहूं की फसल में पीला रतुआ बीमरी लगने लगी है। अभी तक जिलाभर में गादली, थाना, मोरथला, धन्नी राम जट्टान के किसानों की फसलों में यह बीमारी देखने को मिली है। जिससे किसानों के साथ कृषि विभाग के अधिकारियों के भी पसीने छूटने लगे हैं। इस बीमारी का पता चलते ही जहां अधिकारियों ने मौके पर जाकर फसल का जायजा लिया। सोमवार को विभाग की जिला स्तर पर पेस्ट सर्विलांस एवं एडवाइजरी यूनिट की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. बलबीर सिंह भान ने की । उप मंडल कृषि अधिकारी थानेसर डॉ. सुरेश कुमार, उप मंडल कृषि अधिकारी पिहोवा डॉ. मदन सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र कुरुक्षेत्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदुम्न भटनागर व यूनिट के अन्य सदस्यों ने भाग लिया। मीटिंग में गेहूं में लगने वाले घातक रोग पीला रतुआ व अन्य फसलों में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों पर चर्चा की। डॉ. बलबीर सिंह भान ने बताया कि जिला के उक्त गांव में कहीं-कहीं पर गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के लक्षण पाए गए हैं। विभागीय टीम द्वारा प्रभावित खेतों का निरीक्षण किया गया तथा पीला रतुआ से निपटने का उपाय बताया गया। फसल में दवा का छिड़काव करवाया गया। उन्होंने कहा कि यह मौसम पीला रतुआ के अनुकूल है, इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेतों में जाकर जांच करनी चाहिए। शुरूआती संक्रमण फोसाई के रूप में 10-15 पौधों पर एक गोल दायरे में होता हैं, लेकिन बाद में आग की तरह फैलता है।
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ये फसलें हैं अति संवेदनशील
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पीबीडब्ल्यू 343, पीबीडब्ल्यू 373, डब्ल्यूएच 147, पीबीडब्लू 550, एचडी 2967, डीबीडब्ल्यू 88, एचडी 3059, डब्ल्यूएच 1021 और सी 306 जैसी किस्मों में पीले रतुआ का असर ज्यादा होने की संभावना है। ये किस्में पीले रतुआ के लिए अतिसंवेदनशील हैं और इन पर खेत में ठीक से नजर रखी जानी चाहिए।
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दवा का दूसरा छिड़काव 15 से 20 दिन बाद करें : कर्मचंद
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विभाग के उपनिदेशक डॉ. कर्मचंद ने बताया कि संक्रमण के दौरान रोगी पत्ती पर पीले पाउडर के साथ पीली पट्टियों का विकास होता है। जब दो उंगलियों के साथ संक्रमित पत्ती रगड़ते हैं तो पीले रंग का पाउडर उंगलियों के टिप्स पर आता है। अगर पीले रंग का पाउडर अनुपस्थित है और 2-3 दिन के भीतर पूरे खेत में पत्ते पीले होते हैं तो ठंड के मौसम के प्रभाव के कारण हो सकते हैं और किसान को फफूंदी नाशक का स्प्रे करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि पीला रतुआ आने पर 200 मिलीलीटर प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ प्रभावित फसल पर कोन अथवा कट नोजल से स्प्रे करवाएं। रोग के प्रकोप व उसको फैलने से रोकने के लिए दूसरा छिड़काव 15 से 20 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें।
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अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
जिला में गेहूं की फसल में पीला रतुआ बीमरी लगने लगी है। अभी तक जिलाभर में गादली, थाना, मोरथला, धन्नी राम जट्टान के किसानों की फसलों में यह बीमारी देखने को मिली है। जिससे किसानों के साथ कृषि विभाग के अधिकारियों के भी पसीने छूटने लगे हैं। इस बीमारी का पता चलते ही जहां अधिकारियों ने मौके पर जाकर फसल का जायजा लिया। सोमवार को विभाग की जिला स्तर पर पेस्ट सर्विलांस एवं एडवाइजरी यूनिट की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. बलबीर सिंह भान ने की । उप मंडल कृषि अधिकारी थानेसर डॉ. सुरेश कुमार, उप मंडल कृषि अधिकारी पिहोवा डॉ. मदन सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र कुरुक्षेत्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदुम्न भटनागर व यूनिट के अन्य सदस्यों ने भाग लिया। मीटिंग में गेहूं में लगने वाले घातक रोग पीला रतुआ व अन्य फसलों में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों पर चर्चा की। डॉ. बलबीर सिंह भान ने बताया कि जिला के उक्त गांव में कहीं-कहीं पर गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के लक्षण पाए गए हैं। विभागीय टीम द्वारा प्रभावित खेतों का निरीक्षण किया गया तथा पीला रतुआ से निपटने का उपाय बताया गया। फसल में दवा का छिड़काव करवाया गया। उन्होंने कहा कि यह मौसम पीला रतुआ के अनुकूल है, इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेतों में जाकर जांच करनी चाहिए। शुरूआती संक्रमण फोसाई के रूप में 10-15 पौधों पर एक गोल दायरे में होता हैं, लेकिन बाद में आग की तरह फैलता है।
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ये फसलें हैं अति संवेदनशील
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पीबीडब्ल्यू 343, पीबीडब्ल्यू 373, डब्ल्यूएच 147, पीबीडब्लू 550, एचडी 2967, डीबीडब्ल्यू 88, एचडी 3059, डब्ल्यूएच 1021 और सी 306 जैसी किस्मों में पीले रतुआ का असर ज्यादा होने की संभावना है। ये किस्में पीले रतुआ के लिए अतिसंवेदनशील हैं और इन पर खेत में ठीक से नजर रखी जानी चाहिए।
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दवा का दूसरा छिड़काव 15 से 20 दिन बाद करें : कर्मचंद
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विभाग के उपनिदेशक डॉ. कर्मचंद ने बताया कि संक्रमण के दौरान रोगी पत्ती पर पीले पाउडर के साथ पीली पट्टियों का विकास होता है। जब दो उंगलियों के साथ संक्रमित पत्ती रगड़ते हैं तो पीले रंग का पाउडर उंगलियों के टिप्स पर आता है। अगर पीले रंग का पाउडर अनुपस्थित है और 2-3 दिन के भीतर पूरे खेत में पत्ते पीले होते हैं तो ठंड के मौसम के प्रभाव के कारण हो सकते हैं और किसान को फफूंदी नाशक का स्प्रे करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि पीला रतुआ आने पर 200 मिलीलीटर प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ प्रभावित फसल पर कोन अथवा कट नोजल से स्प्रे करवाएं। रोग के प्रकोप व उसको फैलने से रोकने के लिए दूसरा छिड़काव 15 से 20 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें।
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