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Karnal News: घरेलू कलह, अकेलेपन के कारण आत्मघाती कदम उठा रहीं महिलाएं
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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
- मनोरोग ओपीडी में रोजाना पहुंच रहे चार केस, इनमें तीन महिलाएं व एक पुरुष शामिल
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। एक तरफ महिलाओं पर घरेलू हिंसा के केस बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर काम के बढ़ते बोझ के कारण पति-पत्नी आपस में समय नहीं बिता पा रहे हैं। ऐसे में विशेषकर घरेलू महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो रही हैं। इस कारण से उनके मन में बार-बार आत्महत्या के विचार आ रहे हैं।
जिला नागरिक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता ने बताया कि 14 वर्ष के बाद लगभग 50 प्रतिशत बच्चे और 21 वर्ष के बाद 70 प्रतिशत बच्चे डिप्रेशन का शिकार होने लगते हैं। डिप्रेशन के ज्यादातर मामले 15 से 30 वर्ष के लोगों में सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी में रोजाना 80 से 100 मरीज आ रहे हैं। इनमें से आत्महत्या करने की सोचने वाले रोजाना लगभग चार केस पहुंच रहे हैं। इनमें तीन महिलाएं व एक पुरुष शामिल हैं।
ऐसे में विभाग काउंसलिंग के माध्यम से आत्महत्या के विचार को जड़ से खत्म करने में जुटा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार थोड़ी-सी सावधानी बरतकर डिप्रेशन के मामलों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। रोजाना अगर घर के सदस्यों के साथ बैठकर बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो शायद ही मन में आत्महत्या का विचार आए। उन्होंने बताया कि अपनी दूसरे की जिंदगी से तुलना करना भी जानलेवा साबित हो रहा है। इसका बड़ा कारण एकल परिवार और उनमें भी एक-दूसरे से सही तरीके से बातचीत न होना भी आत्महत्या का कारण बनता जा रहा है।
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घर के सदस्यों के साथ बैठकर बातें शेयर करने की डालें आदत
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता बताते हैं कि पहले संयुक्त परिवार होते थे। तब सभी लोग एक साथ बैठा करते थे और सारे दिन की बातें एक-दूसरे को बताते थे, लेकिन अब एकल परिवार और सोशल मीडिया के कारण यह खत्म हो गया है। इससे अकेलापन बढ़ने से मन में गलत विचार आते हैं, जो कई बार आत्मघाती साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना अगर आप अपने घर के सदस्यों के साथ बैठकर अपनी बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो आत्महत्या जैसी घटनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।
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- मनोरोग ओपीडी में रोजाना पहुंच रहे चार केस, इनमें तीन महिलाएं व एक पुरुष शामिल
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। एक तरफ महिलाओं पर घरेलू हिंसा के केस बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर काम के बढ़ते बोझ के कारण पति-पत्नी आपस में समय नहीं बिता पा रहे हैं। ऐसे में विशेषकर घरेलू महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो रही हैं। इस कारण से उनके मन में बार-बार आत्महत्या के विचार आ रहे हैं।
जिला नागरिक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता ने बताया कि 14 वर्ष के बाद लगभग 50 प्रतिशत बच्चे और 21 वर्ष के बाद 70 प्रतिशत बच्चे डिप्रेशन का शिकार होने लगते हैं। डिप्रेशन के ज्यादातर मामले 15 से 30 वर्ष के लोगों में सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी में रोजाना 80 से 100 मरीज आ रहे हैं। इनमें से आत्महत्या करने की सोचने वाले रोजाना लगभग चार केस पहुंच रहे हैं। इनमें तीन महिलाएं व एक पुरुष शामिल हैं।
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ऐसे में विभाग काउंसलिंग के माध्यम से आत्महत्या के विचार को जड़ से खत्म करने में जुटा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार थोड़ी-सी सावधानी बरतकर डिप्रेशन के मामलों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। रोजाना अगर घर के सदस्यों के साथ बैठकर बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो शायद ही मन में आत्महत्या का विचार आए। उन्होंने बताया कि अपनी दूसरे की जिंदगी से तुलना करना भी जानलेवा साबित हो रहा है। इसका बड़ा कारण एकल परिवार और उनमें भी एक-दूसरे से सही तरीके से बातचीत न होना भी आत्महत्या का कारण बनता जा रहा है।
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घर के सदस्यों के साथ बैठकर बातें शेयर करने की डालें आदत
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता बताते हैं कि पहले संयुक्त परिवार होते थे। तब सभी लोग एक साथ बैठा करते थे और सारे दिन की बातें एक-दूसरे को बताते थे, लेकिन अब एकल परिवार और सोशल मीडिया के कारण यह खत्म हो गया है। इससे अकेलापन बढ़ने से मन में गलत विचार आते हैं, जो कई बार आत्मघाती साबित होते हैं। उन्होंने कहा कि रोजाना अगर आप अपने घर के सदस्यों के साथ बैठकर अपनी बातें शेयर करते हैं और उनकी बातें सुनते हैं तो आत्महत्या जैसी घटनाओं पर अंकुश लगा सकते हैं।