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Karnal News: दावेदारों को सता रहा सीट आरक्षण का डर
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देव शर्मा
करनाल। नगर निगम और जिले की कुछ नगरपालिकाओं के चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं लेकिन दावेदारों को सीट आरक्षण का भय सता रहा है।
सीट का आरक्षण बदला तो उनकी तैयारियां धरी रह जाएंगी। इसके बावजूद मेयर और चेयरमैन पदों के साथ-साथ वार्डों के पार्षद के लिए भी दावेदारों ने अपनी पार्टी के आला नेताओं पर टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
जहां तक नगर निगम करनाल की बात है तो दिग्गजों की निगाहें करनाल के महापौर यानी मेयर पद पर टिकी हैं। जब नगर निगम बना तो पहला चुनाव वर्ष 2013 में हुआ।
पहला चुनाव होने के कारण इस समय आरक्षण का कोई शेड्यूल लागू नहीं था, तो सीट सामान्य रही। जिस पर रेणू बाला गुप्ता मेयर बनीं। दूसरा चुनाव 2018 में हुआ तो सामान्य महिला के लिए सीट आरक्षित थी और जनता से सीधा चुनाव कराया गया। उसमें दूसरी बार भी रेणू बाला गुप्ता मैदान में उतरीं और मेयर निर्वाचित हुईं।
अब नगर निगम का तीसरा चुनाव प्रस्तावित है। इसमें मेयर पद आरक्षित होगा या सामान्य रहेगा, इस पर सभी की निगाहे हैं। अधिकतर लोगों का मानना है कि तीसरा चुनाव होने के कारण मेयर का पद अनुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग के लिए भी आरक्षित हो सकता है। इस बार तो ओबीसी ए व बी का भी आरक्षण दिया जाना है।
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यदि सीट आरक्षित होती है, तो मेयर पद के कई दावेदारों के अरमानों पर पानी फिर सकता है और कई नए लोगों को मेयर जैसे बड़े पद पर आसीन होने का अवसर भी मिल सकता है। इसी तरह से वार्डों का परिसीमन भी हुआ है, यहां भी सीटों का आरक्षण किया जाना है। पुराने पार्षद भी अपनी दावेदारी कर रहे हैं, अधूरे विकास कार्य पूरे कराने में भी जुटे हैं, उन्हें भी कहीं न कहीं, ये डर सता रहा है कि यदि उनके वार्ड का आरक्षण बदला तो क्या होगा ? कमोबेश यही स्थिति नगरपालिकाओं में पालिकाध्यक्ष और वार्डों के दावेदारों की भी है।
आबादी का आधार है सामान्य वर्ग की दावेदारी की वजह ः लोगों को मेयर पद आरक्षित होने की उम्मीद तो है लेकिन वहीं उनका ये भी कहना है कि किसी भी पद का आरक्षण काफी हद तक सरकार की इच्छा पर भी निर्भर करता है। इसी संभावना को लेकर दावेदार अपने-अपने हिसाब से सियासी आकाओं पर दबाव भी बनाने लगे हैं। जिसमें सरकार मौजूदा आबादी को आधार बना सकती है।
सियासी जानकारों का ये भी कहना है कि चुनाव से पूर्व वार्डबंदी करनाल में भी कराई गई है, जिस पर आपत्तियां व दावे लिए जा चुके हैं, आज उन पर सुनवाई कर निस्तारण का कार्य भी पूरा कर लिया गया है।
अब वार्डबंदी को अंतिम प्रकाशन के लिए मुख्यालय भेजा जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण भी हुआ है, अब अंतिम मतदाता सूची भी प्रकाशित होगी।
इसमें परिवार पहचान पत्र को भी जोड़ा गया है, इससे ये भी पता लग पाएगा कि किस जाति वर्ग के कितनी आबादी हैं, इसी आधार पर सीटों का आरक्षण किया जा सकता है। जिसके कारण शेड्यूल को बदला जा सकता है। यही वह उम्मीद है जो सामान्य वर्ग की दावेदारी की वजह है।
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करनाल। नगर निगम और जिले की कुछ नगरपालिकाओं के चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं लेकिन दावेदारों को सीट आरक्षण का भय सता रहा है।
सीट का आरक्षण बदला तो उनकी तैयारियां धरी रह जाएंगी। इसके बावजूद मेयर और चेयरमैन पदों के साथ-साथ वार्डों के पार्षद के लिए भी दावेदारों ने अपनी पार्टी के आला नेताओं पर टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
जहां तक नगर निगम करनाल की बात है तो दिग्गजों की निगाहें करनाल के महापौर यानी मेयर पद पर टिकी हैं। जब नगर निगम बना तो पहला चुनाव वर्ष 2013 में हुआ।
पहला चुनाव होने के कारण इस समय आरक्षण का कोई शेड्यूल लागू नहीं था, तो सीट सामान्य रही। जिस पर रेणू बाला गुप्ता मेयर बनीं। दूसरा चुनाव 2018 में हुआ तो सामान्य महिला के लिए सीट आरक्षित थी और जनता से सीधा चुनाव कराया गया। उसमें दूसरी बार भी रेणू बाला गुप्ता मैदान में उतरीं और मेयर निर्वाचित हुईं।
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अब नगर निगम का तीसरा चुनाव प्रस्तावित है। इसमें मेयर पद आरक्षित होगा या सामान्य रहेगा, इस पर सभी की निगाहे हैं। अधिकतर लोगों का मानना है कि तीसरा चुनाव होने के कारण मेयर का पद अनुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग के लिए भी आरक्षित हो सकता है। इस बार तो ओबीसी ए व बी का भी आरक्षण दिया जाना है।
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यदि सीट आरक्षित होती है, तो मेयर पद के कई दावेदारों के अरमानों पर पानी फिर सकता है और कई नए लोगों को मेयर जैसे बड़े पद पर आसीन होने का अवसर भी मिल सकता है। इसी तरह से वार्डों का परिसीमन भी हुआ है, यहां भी सीटों का आरक्षण किया जाना है। पुराने पार्षद भी अपनी दावेदारी कर रहे हैं, अधूरे विकास कार्य पूरे कराने में भी जुटे हैं, उन्हें भी कहीं न कहीं, ये डर सता रहा है कि यदि उनके वार्ड का आरक्षण बदला तो क्या होगा ? कमोबेश यही स्थिति नगरपालिकाओं में पालिकाध्यक्ष और वार्डों के दावेदारों की भी है।
आबादी का आधार है सामान्य वर्ग की दावेदारी की वजह ः लोगों को मेयर पद आरक्षित होने की उम्मीद तो है लेकिन वहीं उनका ये भी कहना है कि किसी भी पद का आरक्षण काफी हद तक सरकार की इच्छा पर भी निर्भर करता है। इसी संभावना को लेकर दावेदार अपने-अपने हिसाब से सियासी आकाओं पर दबाव भी बनाने लगे हैं। जिसमें सरकार मौजूदा आबादी को आधार बना सकती है।
सियासी जानकारों का ये भी कहना है कि चुनाव से पूर्व वार्डबंदी करनाल में भी कराई गई है, जिस पर आपत्तियां व दावे लिए जा चुके हैं, आज उन पर सुनवाई कर निस्तारण का कार्य भी पूरा कर लिया गया है।
अब वार्डबंदी को अंतिम प्रकाशन के लिए मुख्यालय भेजा जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण भी हुआ है, अब अंतिम मतदाता सूची भी प्रकाशित होगी।
इसमें परिवार पहचान पत्र को भी जोड़ा गया है, इससे ये भी पता लग पाएगा कि किस जाति वर्ग के कितनी आबादी हैं, इसी आधार पर सीटों का आरक्षण किया जा सकता है। जिसके कारण शेड्यूल को बदला जा सकता है। यही वह उम्मीद है जो सामान्य वर्ग की दावेदारी की वजह है।