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घर से कम होनी चाहिए खेल मैदानों की दूरी, सुविधाओं को बढ़ाना जरूरी
सार
खिलाड़ियों का कहना है कि खेल अभ्यास के दौरान जहां विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वहीं घरों से खेल मैदानों की दूरी और अपर्याप्त खेल सुविधाएं भी कई बार पेश आती है। इसलिए सरकार को ऐसे पैरा खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए विशेष खेल सुविधाओं का इंतजाम करना होगा।
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Paralympic Player
विस्तार
ओलंपिक के बाद टोक्यो पैरालंपिक-2020 शुरू हो चुके हैं। इसमें भाग लेने के लिए हरियाणा से 19 खिलाड़ी टोक्यो में होने वाली विभिन्न खेल प्रतिस्पर्धाओं में अपना दमखम दिखाएंगे। लेकिन विडंबना इस बात की है कि इन 19 खिलाड़ियों में करनाल जिले का एक भी पैरा खिलाड़ी शामिल नहीं है। हालांकि जिले के कर्ण स्टेडियम में व्हीलचेयर फेंसिंग (तलवारबाजी) खेल का सेंटर भी है। बावजूद इसके इस खेल का कोई खिलाड़ी पैरालंपिक के लिए चयनित नहीं हो पाया है।
खिलाड़ियों का कहना है कि खेल अभ्यास के दौरान जहां विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वहीं घरों से खेल मैदानों की दूरी और अपर्याप्त खेल सुविधाएं भी कई बार पेश आती है। इसलिए सरकार को ऐसे पैरा खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए विशेष खेल सुविधाओं का इंतजाम करना होगा।
करनाल के कैलाश गांव के व्हीलचेयर फेंसिंग के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी राजीव वर्ष 2019 में नीदरलैंड विश्व चैंपियनशिप में भाग ले चुके हैं। वे कहते हैं कि सरकार खेलों को लेकर बहुत कुछ कर रही है। इसी तर्ज पर यदि पैरा खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाएं भी बढ़ाई जाएं तो हम भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। सरकार से मांग है कि स्टेडियम बनाते वक्त पैरा खिलाड़ियों की समस्याआें को ध्यान में रखकर निर्माण किया जाए। दूसरा, स्टेडियम पैरा खिलाड़ियों के घरों से भी बहुत दूर होते हैं, इसलिए स्टेडियम में ही इन खिलाड़ियों के लिए निशुल्क हॉस्टल सुविधा उपलब्ध करवाई जाए।
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पलवल की रहने वाली व्हीलचेयर फेसिंग की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रेखा करनाल में में अभ्यास करनाल में करती हैं। चूंकि इसका सेंटर कर्ण स्टेडियम में है, इसलिए रेखा यहां पीजी में रहती हैं। रेखा कहती हैं कि ममेरी बहन जो कोच भी हैं, उनके कहने पर इस खेल की शुरूआत की थी। पलवल में व्हीलचेयर का फेंसिंग सेंटर नहीं हैं, इसलिए यहीं करनाल में रह रहीं हैं। यदि पलवल में ही ये सेंटर होता तो, इस तरह परेशानी न झेलनी पड़ती।
करनाल में शिव कॉलोनी की रहने वाली दो बेटों की मां सीमा ने सात वर्ष पहले एक शिक्षक के कहने पर खेलना शुरू किया था। वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 9वीं व्हीलचेयर फेसिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण व रजत पदक जीता। सीमा कहती हैं कि उनके पति टेलर का काम करते हैं और दो बेटे भी हैं। पति की कमाई और मेरी दिव्यांग पेंशन से गुजारा नहीं चलता। पदक जीतने के बाद सरकारी नौकरी की आस बंधी थी, मगर वो नहीं मिली।
समालखा के गांव देहरा की अन्नु ने 2019 चेन्नई में आयोजित प्रतियोगिता में स्वर्ण व कांस्य पदक जीत चुकी हैं। अन्नु करनाल स्टेडियम में व्हीलचेयर फेंसिंग का अभ्यास करती थीं, लेकिन गांव से करनाल स्टेडियम में आने-
जाने में परेशानी के चलते दो साल पहले खेल छोड़ दिया था। अब करनाल के एक पीजी होस्टल मे रहने के बाद दोबारा खेलना शुरू किया है। अभी भी परेशानी कम नहीं हुई है। पीजी से रोजाना ऑटो पकड़कर स्टेडियम आना-जाना बहुत मुश्किल होता है। यदि स्टेडियम परिसर में ही खिलाड़ियों के निशुल्क हॉस्टल सुविधा होती तो अच्छा रहता।
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खिलाड़ियों का कहना है कि खेल अभ्यास के दौरान जहां विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वहीं घरों से खेल मैदानों की दूरी और अपर्याप्त खेल सुविधाएं भी कई बार पेश आती है। इसलिए सरकार को ऐसे पैरा खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए विशेष खेल सुविधाओं का इंतजाम करना होगा।
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करनाल के कैलाश गांव के व्हीलचेयर फेंसिंग के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी राजीव वर्ष 2019 में नीदरलैंड विश्व चैंपियनशिप में भाग ले चुके हैं। वे कहते हैं कि सरकार खेलों को लेकर बहुत कुछ कर रही है। इसी तर्ज पर यदि पैरा खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाएं भी बढ़ाई जाएं तो हम भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। सरकार से मांग है कि स्टेडियम बनाते वक्त पैरा खिलाड़ियों की समस्याआें को ध्यान में रखकर निर्माण किया जाए। दूसरा, स्टेडियम पैरा खिलाड़ियों के घरों से भी बहुत दूर होते हैं, इसलिए स्टेडियम में ही इन खिलाड़ियों के लिए निशुल्क हॉस्टल सुविधा उपलब्ध करवाई जाए।
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पलवल की रहने वाली व्हीलचेयर फेसिंग की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रेखा करनाल में में अभ्यास करनाल में करती हैं। चूंकि इसका सेंटर कर्ण स्टेडियम में है, इसलिए रेखा यहां पीजी में रहती हैं। रेखा कहती हैं कि ममेरी बहन जो कोच भी हैं, उनके कहने पर इस खेल की शुरूआत की थी। पलवल में व्हीलचेयर का फेंसिंग सेंटर नहीं हैं, इसलिए यहीं करनाल में रह रहीं हैं। यदि पलवल में ही ये सेंटर होता तो, इस तरह परेशानी न झेलनी पड़ती।
करनाल में शिव कॉलोनी की रहने वाली दो बेटों की मां सीमा ने सात वर्ष पहले एक शिक्षक के कहने पर खेलना शुरू किया था। वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 9वीं व्हीलचेयर फेसिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण व रजत पदक जीता। सीमा कहती हैं कि उनके पति टेलर का काम करते हैं और दो बेटे भी हैं। पति की कमाई और मेरी दिव्यांग पेंशन से गुजारा नहीं चलता। पदक जीतने के बाद सरकारी नौकरी की आस बंधी थी, मगर वो नहीं मिली।
समालखा के गांव देहरा की अन्नु ने 2019 चेन्नई में आयोजित प्रतियोगिता में स्वर्ण व कांस्य पदक जीत चुकी हैं। अन्नु करनाल स्टेडियम में व्हीलचेयर फेंसिंग का अभ्यास करती थीं, लेकिन गांव से करनाल स्टेडियम में आने-
जाने में परेशानी के चलते दो साल पहले खेल छोड़ दिया था। अब करनाल के एक पीजी होस्टल मे रहने के बाद दोबारा खेलना शुरू किया है। अभी भी परेशानी कम नहीं हुई है। पीजी से रोजाना ऑटो पकड़कर स्टेडियम आना-जाना बहुत मुश्किल होता है। यदि स्टेडियम परिसर में ही खिलाड़ियों के निशुल्क हॉस्टल सुविधा होती तो अच्छा रहता।