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सियासी वजूद के लिए जूझ रही इनेलो, आप और बसपा
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देव शर्मा
करनाल। ग्रामीण अंचलों में चुनावी बिसात सज गई है। शहर और मात के इस खेल में विजयश्री किसे मिलेगी ये तो मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन सियासी पार्टियों में काफी उठापटक की स्थिति है, क्योंकि ये चुनाव सिर्फ जिला परिषद या ब्लाक समिति के सदस्य का ही बल्कि इसके पीछे सीधे तौर पर जिले की सबसे बड़ी चौधर यानी जिला परिषद अध्यक्ष और ब्लाक समिति के चेयरमैन का पद भी छिपा है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने कूटनीतिक रणनीति के तहत किसी प्रत्याशी को सिंबल दिया ही नहीं लेकिन हरियाणा में अपनी जमीन तैयार कर रही बसपा, आम आदमी पार्टी के साथ साथ इनेलो की भी अस्तित्व दांव पर है। हालांकि ये पार्टियां सभी 25 सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं उतार पाईं है। सर्वाधिक 14 प्रत्याशी बहुजन समाज पार्टी ने उतारे हैं।
भले ही आम मतदाता आज जिला परिषद सदस्य और ब्लाक कमेटी के सदस्यों के लिए मतदान करेंगे, लेकिन सियासी दिग्गजों की निगाहें, इसके पीछे जिला परिषद अध्यक्ष व ब्लाक समिति के चेयरमैन के पद पर दांव खेल रहे हैं। सियासी बिसात पर भले ही मोहरे जीत हार में उलझे हों लेकिन राजनीतिक खिलाड़ियों की निगाहें तो राजा की घेराबंदी पर ही हैं। जिला परिषद के चुनाव के सियासी गणित की बात करें तो जिले की 25 सीटों में से इंडियन नेशनल लोक दल ने 10, आम आदमी पार्टी ने भी 10, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने 14 प्रत्याशी उतारे हैं। कुल मिलाकर कुल 239 जिला परिषद सदस्य पद के प्रत्याशियों में से कुल 34 प्रत्याशी अपनी राजनीतिक पार्टियों के सिंबल पर अपना भाग्य आजमा रहे हैं। कांग्रेस ने पहले से ही पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में सिंबल नहीं देने का फैसला कर लिया था। भाजपा ने भी करनाल जिले में किसी भी सीट पर किसी प्रत्याशी को सिंबल नहीं दिया। इन पार्टियों की सियासी सोच ये है कि एक एक सीट से उनके ही कई कई कार्यकर्ता टिकट के दावेदार थे। सिंबल यदि एक को दिया जाता तो दूसरे दावेदार कार्यकर्ता नाराज हो सकते थे, इसलिए पार्टी में बिखराव को रोकने के लिए बड़ी सियासी पार्टियों ने सिंबल न देने का फैसला किया। हालांकि ऐसा नहीं है कि भाजपा या कांग्रेस चुनाव नहीं लड़ रही है। लगभग अधिकांश सीटों पर समर्थित प्रत्याशी खुलकर भाजपा व कांग्रेस के बड़े नेताओं के फोटो और नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा ने तो प्रत्येक वार्ड में प्रभारी व सहप्रभारी नियुक्त करके बाकायदा रणनीति बनाकर चुनाव लड़ाया है। अधिकांश सीटों पर भाजपा ने अंत तक एक प्रत्याशी पर आम राय बना ली है, कुछेक वार्ड हैं, जहां आम राय नहीं बनी तो वहां उन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया गया है, लेकिन दोनों ही भाजपा नेताओं के फोटो, झंडे आदि का जमकर प्रयोग कर रहे थे।
कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी, बसपा और इनोलो ने अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतारकर अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के कदम बढाया है, ये तो मतदाता ही तय करेेंगे कि वह अपनी सियासी रणनीति पर कितने खरे उतरेंगे।
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करनाल। ग्रामीण अंचलों में चुनावी बिसात सज गई है। शहर और मात के इस खेल में विजयश्री किसे मिलेगी ये तो मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन सियासी पार्टियों में काफी उठापटक की स्थिति है, क्योंकि ये चुनाव सिर्फ जिला परिषद या ब्लाक समिति के सदस्य का ही बल्कि इसके पीछे सीधे तौर पर जिले की सबसे बड़ी चौधर यानी जिला परिषद अध्यक्ष और ब्लाक समिति के चेयरमैन का पद भी छिपा है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने कूटनीतिक रणनीति के तहत किसी प्रत्याशी को सिंबल दिया ही नहीं लेकिन हरियाणा में अपनी जमीन तैयार कर रही बसपा, आम आदमी पार्टी के साथ साथ इनेलो की भी अस्तित्व दांव पर है। हालांकि ये पार्टियां सभी 25 सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं उतार पाईं है। सर्वाधिक 14 प्रत्याशी बहुजन समाज पार्टी ने उतारे हैं।
भले ही आम मतदाता आज जिला परिषद सदस्य और ब्लाक कमेटी के सदस्यों के लिए मतदान करेंगे, लेकिन सियासी दिग्गजों की निगाहें, इसके पीछे जिला परिषद अध्यक्ष व ब्लाक समिति के चेयरमैन के पद पर दांव खेल रहे हैं। सियासी बिसात पर भले ही मोहरे जीत हार में उलझे हों लेकिन राजनीतिक खिलाड़ियों की निगाहें तो राजा की घेराबंदी पर ही हैं। जिला परिषद के चुनाव के सियासी गणित की बात करें तो जिले की 25 सीटों में से इंडियन नेशनल लोक दल ने 10, आम आदमी पार्टी ने भी 10, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने 14 प्रत्याशी उतारे हैं। कुल मिलाकर कुल 239 जिला परिषद सदस्य पद के प्रत्याशियों में से कुल 34 प्रत्याशी अपनी राजनीतिक पार्टियों के सिंबल पर अपना भाग्य आजमा रहे हैं। कांग्रेस ने पहले से ही पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में सिंबल नहीं देने का फैसला कर लिया था। भाजपा ने भी करनाल जिले में किसी भी सीट पर किसी प्रत्याशी को सिंबल नहीं दिया। इन पार्टियों की सियासी सोच ये है कि एक एक सीट से उनके ही कई कई कार्यकर्ता टिकट के दावेदार थे। सिंबल यदि एक को दिया जाता तो दूसरे दावेदार कार्यकर्ता नाराज हो सकते थे, इसलिए पार्टी में बिखराव को रोकने के लिए बड़ी सियासी पार्टियों ने सिंबल न देने का फैसला किया। हालांकि ऐसा नहीं है कि भाजपा या कांग्रेस चुनाव नहीं लड़ रही है। लगभग अधिकांश सीटों पर समर्थित प्रत्याशी खुलकर भाजपा व कांग्रेस के बड़े नेताओं के फोटो और नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा ने तो प्रत्येक वार्ड में प्रभारी व सहप्रभारी नियुक्त करके बाकायदा रणनीति बनाकर चुनाव लड़ाया है। अधिकांश सीटों पर भाजपा ने अंत तक एक प्रत्याशी पर आम राय बना ली है, कुछेक वार्ड हैं, जहां आम राय नहीं बनी तो वहां उन्हें स्वतंत्र छोड़ दिया गया है, लेकिन दोनों ही भाजपा नेताओं के फोटो, झंडे आदि का जमकर प्रयोग कर रहे थे।
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कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी, बसपा और इनोलो ने अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतारकर अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के कदम बढाया है, ये तो मतदाता ही तय करेेंगे कि वह अपनी सियासी रणनीति पर कितने खरे उतरेंगे।
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