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हरियाणा के सूचना आयुक्तों ने ही छिपाई सूचना
करनाल
Updated Sat, 15 Mar 2014 11:29 PM IST
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प्रदेश में कांग्रेस सरकार की ओर से नियुक्त किए गए सूचना आयुक्त खुद
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सूचना आयोग से अपनी सूचनाएं छिपा रहे हैं। अब तक मुख्य सूचना आयुक्त नरेश
गुलाटी और सूचना आयुक्त उर्वशी गुलाटी ने ही अपनी संपत्ति का ब्योरा आयोग
को दिया है। इसके अलावा किसी भी सूचना आयुक्त ने अब तक अपनी संपत्ति सूचना
आयोग को नहीं बताई है।
इनमें मेजर जनरल रिटायर्ड जेएस कुंडू, सज्जन सिंह, पीआर मीना, समीर माथुर, योगेंद्र पाल गुप्ता और हेमंत अत्री शामिल हैं। सूचना आयोग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में यह खुलासा हुआ है। आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा द्वारा हरियाणा सूचना आयोग से यह जानकारी मांगी गई थी। इससे स्पष्ट है कि सूचना आयोग को प्रदेश के सूचना आयुक्त भी गंभीरता से नहीं लेते हैं।
महज 597 मामलों में जुर्माना
आरटीआई को प्रदेश में कोई भी विभाग गंभीरता से नहीं लेता है। हरियाणा सूचना आयोग भी ऐसे अधिकारियों पर लगाम कसने में कुछ खास सक्षम साबित नहीं हो रहा है। प्रदेश में आरटीआई लागू होने से अब तक 19553 आरटीआई की अपीलें और 2316 शिकायतें निपटाई हैं, लेकिन इनमें से केवल 597 मामलों में ही जुर्माना किया गया। आयोग के पास 1492 अपीलें और 45 शिकायतें आज भी पेंडिंग हैं। यानी सिर्फ तीन प्रतिशत मामलों में ही सूचना आयोग ने सख्ती बरती। बाकी मामलों को आयोग आज भी दबाए बैठा है।
लगाना होता है 250 रुपये प्रतिदिन जुर्माना
आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा ने बताया कि एक्ट के अनुसार संबंधित विभाग को 30 दिन में सूचना देनी होती है। यदि कोई अधिकारी इस अवधि में सूचना नहीं देता है तो वह राज्य सूचना आयोग को शिकायत कर सकता है। तय समय सीमा में सूचना नहीं देने वाले अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये जुर्माना करने का प्रावधान एक्ट में किया गया है।
आयोग का दोहरा मापदंड
सूचना आयोग की ओर से हर गांव के सरपंच को जन सूचना अधिकारी बनाया गया है। सरपंच एक जनप्रतिनिधि होता है और इसी तरह सांसद व विधायक भी जनप्रतिनिधि की श्रेणी में आते हैं। लेकिन सांसद और विधायक को सूचना अधिकारी नहीं माना जा रहा। सरपंच से पहले पंचायत विभाग के बीडीपीओ सूचना अधिकारी होते थे।
इनमें मेजर जनरल रिटायर्ड जेएस कुंडू, सज्जन सिंह, पीआर मीना, समीर माथुर, योगेंद्र पाल गुप्ता और हेमंत अत्री शामिल हैं। सूचना आयोग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में यह खुलासा हुआ है। आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा द्वारा हरियाणा सूचना आयोग से यह जानकारी मांगी गई थी। इससे स्पष्ट है कि सूचना आयोग को प्रदेश के सूचना आयुक्त भी गंभीरता से नहीं लेते हैं।
महज 597 मामलों में जुर्माना
आरटीआई को प्रदेश में कोई भी विभाग गंभीरता से नहीं लेता है। हरियाणा सूचना आयोग भी ऐसे अधिकारियों पर लगाम कसने में कुछ खास सक्षम साबित नहीं हो रहा है। प्रदेश में आरटीआई लागू होने से अब तक 19553 आरटीआई की अपीलें और 2316 शिकायतें निपटाई हैं, लेकिन इनमें से केवल 597 मामलों में ही जुर्माना किया गया। आयोग के पास 1492 अपीलें और 45 शिकायतें आज भी पेंडिंग हैं। यानी सिर्फ तीन प्रतिशत मामलों में ही सूचना आयोग ने सख्ती बरती। बाकी मामलों को आयोग आज भी दबाए बैठा है।
लगाना होता है 250 रुपये प्रतिदिन जुर्माना
आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा ने बताया कि एक्ट के अनुसार संबंधित विभाग को 30 दिन में सूचना देनी होती है। यदि कोई अधिकारी इस अवधि में सूचना नहीं देता है तो वह राज्य सूचना आयोग को शिकायत कर सकता है। तय समय सीमा में सूचना नहीं देने वाले अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये जुर्माना करने का प्रावधान एक्ट में किया गया है।
आयोग का दोहरा मापदंड
सूचना आयोग की ओर से हर गांव के सरपंच को जन सूचना अधिकारी बनाया गया है। सरपंच एक जनप्रतिनिधि होता है और इसी तरह सांसद व विधायक भी जनप्रतिनिधि की श्रेणी में आते हैं। लेकिन सांसद और विधायक को सूचना अधिकारी नहीं माना जा रहा। सरपंच से पहले पंचायत विभाग के बीडीपीओ सूचना अधिकारी होते थे।