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Karnal: देश में बकरियों की 37 नस्लों को मिली रंग और नई पहचान, दूध और मीट उत्पादन में होगा इजाफा

Fri, 14 Apr 2023 10:20 AM IST
नवीन दलाल देव शर्मा, करनाल (हरियाणा)
देव शर्मा, करनाल (हरियाणा) Published by: नवीन दलाल Updated Fri, 14 Apr 2023 10:20 AM IST
सार

देश के कुल मीट उत्पादन में बकरी मीट का हिस्सा 13.50 प्रतिशत है, लेकिन अब इसका पालन घट रहा है, इसके लिए केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मखदूमपुर, फरह (मथुरा) ने बकरी फार्मिंग यानि व्यावसायिक बकरी पालन शुरू कराया है।

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breeds of goats got color and new identity in country
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

करीब चार दशक पहले तक न तो किसी बकरी की नस्ल का नाम था और न ही रंग, ये सभी मिश्रित नस्लें थी, उनके रंग भी मिले जुले थे। इनकी नस्लों को अलग करने पर विचार किया गया, क्योंकि बिना इसके उनकी पहचान और कौन सी नस्ल कितना दूध व मीट देगी, ये बताना काफी मुश्किल था। केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा ने कार्य शुरू किया तो अब तक 37 नस्लों को नये नाम व रंग से अलग पहचान दी गई है।

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केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा ने शुरू कराई बकरी फार्मिंग
एनडीआरआई में पिछले दिनों आयोजित किए गए राष्ट्रीय डेयरी मेले में आए केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा (सीआईआरजी) के मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. विजय किशोर ने बताया कि नई नस्लों के लिए पहले इनके बकरे तैयार किए गए, फिर उनसे क्रास कराकर नई नस्लें सामने आईं। जैसे यूपी के इटावा जिले आदि में पाई वाली जमुनापारी, जो सफेद रंग की होती है, जिससे दूध व मीट के उत्पादन में कई गुना इजाफा हुआ है।
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ये हैं अलग-अलग नस्ल
मथुरा जिले की बरबरी को सोद, ब्राउन धब्बेदार, राजस्थान की सिरोही को लाल, पंजाब की बीटल को काला, (आंख की सफेद पुतली), अलवर की झझराना को काली, कान व मुंह सफेद, पंश्चिमी बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, बिहार आदि की ब्लैक बंगाल को काला, सूरत (गुजरात) में पाई जाने वाली सूरती को सफेद, यूपी के बुंदेलखंड की बुंदेलखंडी को काला, मध्यम कद, मिर्जापुरी को ब्राउन रंग मिला। अब ये शुद्ध नस्लें अलग-अलग हैं, जिनकी अलग पहचान है।
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देशी नस्लें होने के कारण जलवायु परिवर्तन का नहीं खास असर
जलवायु परिवर्तन में बकरियों को लेकर कोई चिंता की बात नहीं है, क्योंकि ये सभी देशी नस्लें हैं। अपने-अपने क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन के लिए अनुकूल है। खास बात ये भी है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, पंजाब, बिहार की बकरियां कहीं भी पाली जा सकती हैं, जिसमें जमुनापारी, बरबरी, सिरोही, झकराना, बीटल, मिर्जापुरी, बुंदेलखंडी आदि नस्लें शामिल हैं। वहीं चेगूं, चांगथांगी, गद्दी आदि नस्लों की बकरियों को मैदानी क्षेत्रों में पाला नहीं जा सकता है। ये सिर्फ ठंडे क्षेत्रों जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड आदि में अनुकूल रहती हैं।

झकराना नस्ल की बकरी देती है सर्वाधिक दूध

बकरियों की नस्लों में सर्वाधिक झकराना पांच लीटर प्रतिदिन, जमुनापारी और बीटल चार लीटर दूध देती हैं। सूरती तीन लीटर प्रतिदिन दूध देती है। कई मामलों में बकरी का दूध काफी उपयोगी होता है, जिसमें औषधीय गुण होते हैं। बरबरी व सिरोही बकरी का मीट सर्वोत्तम माना जाता है।

बकरी पालन के व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर
देश के कुल मीट उत्पादन में बकरी मीट का हिस्सा 13.50 प्रतिशत है, लेकिन अब इसका पालन घट रहा है, इसके लिए केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मखदूमपुर, फरह (मथुरा) ने बकरी फार्मिंग यानि व्यावसायिक बकरी पालन शुरू कराया है। इसके तहत बकरी के दूध और मीट के विभिन्न उत्पादों पर अनुसंधानिक तरीके से तैयार कर बाजार में उपलब्धता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों से अब तक हजारों युवाओं को इसका प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

एक दशक में 10 प्रतिशत तक बढ़ी बकरियों की संख्या

एनडीआरआई में पिछले दिनों आयोजित किए गए राष्ट्रीय डेयरी मेले में आए केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा (सीआईआरजी) के मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. विजय किशोर ने बताया कि 2019 की गणना के अनुसार देश में बकरियों की आबादी करीब 15 करोड़ थी, जबकि 2009 में ये करीब 12.50 करोड़ थी। औसतन एक दशक में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अधिकारी के अनुसार
केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा के निदेशक डॉ. मनीश कुमार चेटली के दिशा निर्देशन में संस्थान लगातार बेहतर कार्य कर रहा है। 2022 में संस्थान ने राजस्थान में पाई जाने वाली सोजत, कोटा व करौली को शुद्ध नस्ल में लाकर नया नाम दिया है। सोनत को सफेद, कोटा को काला, करोली को छीटदार काला सफेद रंग मिला है। - डॉ. विजय किशोर, मुख्य तकनीकी अधिकारी, सीआईआरजी मथुरा।

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