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तीर्थ पुरोहित नहीं चाहते वंशावलियों पर लगे ई कचरे का ग्रहण
कुरुक्षेत्र
Updated Sun, 22 Dec 2013 11:22 PM IST
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ताड़पत्रों-कागजों पर लिखी जाने वाली वंशावलियों पर कंप्यूटर, पैन ड्राइव, सीडी, मेमोरी कार्ड जैसे ई-कचरे का ग्रहण ना लगे इसके लिए तीर्थ पुरोहितों को पुरानी पद्धति पर ज्यादा भरोसा है।
इनका मानना है कि ये पद्धति न केवल पुरानी परंपराओं को जिंदा रखे है, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी ज्यादा बेहतर है। भगवान श्रीकृष्ण और दाऊ बलराम जी के पुरोहित गर्गाचार्य के वंशज 75 वर्षीय राज कुमार टेहरिया की माने तो आज के दौर में कंप्यूटरों में रिकार्ड रखने की परंपरा जोर पकड़ रही है, लेकिन सदियों पुरानी कागज की इन वंशावलियों (पोथियों) जो प्रभाव है, वह कंप्यूटर में दर्ज होने वाले रिकार्ड में नहीं दिख सकता।
उत्तर प्रदेश दाउजी से आए बुजुर्ग पुरोहित टेहरिया धर्मनगरी में आयोजित अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर प्रतिनिधित्व करने पहुंचे थे।
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यहां अमर उजाला से बातचीत में टेहरिया का कहना है कि संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीप्रकाश मिश्रा के नेतृत्व में अधिवेशन के दौरान अकादमी गठित करने और विश्वविद्यालयों में डिप्लोमा शुरू करने की जो मांग उठी है, उसका वह समर्थन करते हैं। वहीं उन्होंने सुझाव दिया कि विभागीय तौर पर आधुनिक और परंपरानुसार दोनों के सामंजस्य से तीर्थों, तीर्थ परंपराओं और वंशावली प्रबंधन जैसे विषयों पर गूढ़ता से कार्य हो सकेगा।
वहीं उन्होंने कहा कि तीर्थ पुरोहित के पास मौजूद वंशावलियां का गट्ठा मामूली कागज का पुलिंदा नहीं होता, बल्कि हमारी प्राचीन विरासत का अनूठा और अद्भुत पिटारा होता है, जिसके जरिए हम अपने अतीत में झांक सकते हैं। उन्होंने कहा कि तीर्थ पुरोहित के जरिए जब यह पिटारा यजमान के सामने खुलता है तो उसे अपनी पीढ़ियों के जहां साक्ष्य मिलते हैं, वहीं उनके पुरखे इस शैली में हस्ताक्षर, मुहर या अन्य प्रकार से लिखते थे उनके भी दर्शन इन वंशावलियों के जरिए होते हैं।
टेहरिया के मुताबिक अपने पुरखों के इतिहास से हर कोई अवगत होना चाहता है, लेकिन बहुत कम लोगों को ये रिकार्ड उपलब्ध होता है, जबकि आपके तीर्थ पुरोहित के जरिए यह संभव है। यह कार्य कुछ हद तक आज के कंप्यूटर में संभव जरूर है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं।
जाहिर है कि अब कंप्यूटर, सीडी, पैनड्राइव, मेमोरी कार्ड जैसे उपकरणों के जरिए रिकार्ड सुरक्षित रखने का दौर है। टेहरिया जैसे अनेक तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि वे नया 9 दिन और पुराना 100 दिन की बात से पूरा इत्तफाक रखते हैं। लिहाजा उन्हें कागज पर ही भरोसा है। आज उनके कुनबे के 500 लोगों का घर इन्हीं वंशावलियों पर निर्भर है।
12 पीढ़ियों से है हस्तलिखित गर्ग संहिता
बुजुर्ग पुरोहित राजकुमार टेहरिया के मुताबिक उनके पास 500 वर्षों से ज्यादा पुरानी बिहार के राजा, डुंगरपुर रियासत, महाराज सिंधिया, धोलपुर के राजाओं की मुहर लगी वंशावलियां (बहियां) वहीं इनमें से बसे अनूठा संग्रह टेहरिया परिवार के पास 12 पीढ़ी से मौजूद दाऊ बलराम जी के पुरोहित गर्गाचार्य जी की गर्ग संहिता है।
उन्होंने बताया कि गर्गाचार्य ने ही भगवान श्रीकृष्ण और दाऊजी का नामकरण किया था। टेहरिया के अनुसार इस प्राचीन गर्ग संहिता देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह सदियों पुरानी है। इसमें चटक रंगों का उपयोग किया गया है। उनके मुताबिक प्रिंटिंग को भी मात देने वाली यह संहिता अनोखी है।
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इनका मानना है कि ये पद्धति न केवल पुरानी परंपराओं को जिंदा रखे है, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी ज्यादा बेहतर है। भगवान श्रीकृष्ण और दाऊ बलराम जी के पुरोहित गर्गाचार्य के वंशज 75 वर्षीय राज कुमार टेहरिया की माने तो आज के दौर में कंप्यूटरों में रिकार्ड रखने की परंपरा जोर पकड़ रही है, लेकिन सदियों पुरानी कागज की इन वंशावलियों (पोथियों) जो प्रभाव है, वह कंप्यूटर में दर्ज होने वाले रिकार्ड में नहीं दिख सकता।
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उत्तर प्रदेश दाउजी से आए बुजुर्ग पुरोहित टेहरिया धर्मनगरी में आयोजित अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर प्रतिनिधित्व करने पहुंचे थे।
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यहां अमर उजाला से बातचीत में टेहरिया का कहना है कि संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीप्रकाश मिश्रा के नेतृत्व में अधिवेशन के दौरान अकादमी गठित करने और विश्वविद्यालयों में डिप्लोमा शुरू करने की जो मांग उठी है, उसका वह समर्थन करते हैं। वहीं उन्होंने सुझाव दिया कि विभागीय तौर पर आधुनिक और परंपरानुसार दोनों के सामंजस्य से तीर्थों, तीर्थ परंपराओं और वंशावली प्रबंधन जैसे विषयों पर गूढ़ता से कार्य हो सकेगा।
वहीं उन्होंने कहा कि तीर्थ पुरोहित के पास मौजूद वंशावलियां का गट्ठा मामूली कागज का पुलिंदा नहीं होता, बल्कि हमारी प्राचीन विरासत का अनूठा और अद्भुत पिटारा होता है, जिसके जरिए हम अपने अतीत में झांक सकते हैं। उन्होंने कहा कि तीर्थ पुरोहित के जरिए जब यह पिटारा यजमान के सामने खुलता है तो उसे अपनी पीढ़ियों के जहां साक्ष्य मिलते हैं, वहीं उनके पुरखे इस शैली में हस्ताक्षर, मुहर या अन्य प्रकार से लिखते थे उनके भी दर्शन इन वंशावलियों के जरिए होते हैं।
टेहरिया के मुताबिक अपने पुरखों के इतिहास से हर कोई अवगत होना चाहता है, लेकिन बहुत कम लोगों को ये रिकार्ड उपलब्ध होता है, जबकि आपके तीर्थ पुरोहित के जरिए यह संभव है। यह कार्य कुछ हद तक आज के कंप्यूटर में संभव जरूर है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं।
जाहिर है कि अब कंप्यूटर, सीडी, पैनड्राइव, मेमोरी कार्ड जैसे उपकरणों के जरिए रिकार्ड सुरक्षित रखने का दौर है। टेहरिया जैसे अनेक तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि वे नया 9 दिन और पुराना 100 दिन की बात से पूरा इत्तफाक रखते हैं। लिहाजा उन्हें कागज पर ही भरोसा है। आज उनके कुनबे के 500 लोगों का घर इन्हीं वंशावलियों पर निर्भर है।
12 पीढ़ियों से है हस्तलिखित गर्ग संहिता
बुजुर्ग पुरोहित राजकुमार टेहरिया के मुताबिक उनके पास 500 वर्षों से ज्यादा पुरानी बिहार के राजा, डुंगरपुर रियासत, महाराज सिंधिया, धोलपुर के राजाओं की मुहर लगी वंशावलियां (बहियां) वहीं इनमें से बसे अनूठा संग्रह टेहरिया परिवार के पास 12 पीढ़ी से मौजूद दाऊ बलराम जी के पुरोहित गर्गाचार्य जी की गर्ग संहिता है।
उन्होंने बताया कि गर्गाचार्य ने ही भगवान श्रीकृष्ण और दाऊजी का नामकरण किया था। टेहरिया के अनुसार इस प्राचीन गर्ग संहिता देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह सदियों पुरानी है। इसमें चटक रंगों का उपयोग किया गया है। उनके मुताबिक प्रिंटिंग को भी मात देने वाली यह संहिता अनोखी है।