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प्रसूताओं को भी नही मिल रही अस्पताल में कोई सुविधा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 06 May 2016 12:32 AM IST
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अस्पताल
- फोटो : ब्यूरो
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कलायत। कलायत अस्पताल खुद बीमार नजर आ रहा है। जिस कारण लोगों को परेशानी हो रही है। अमर उजाला द्वारा गत रात्रि कलायत के सरकारी अस्पताल में 9 बजे कर 30 मिनट पर जो जानकारियां जुटाई गईं, वे अपने आप में हैरतअंगेज ही नहीं बल्कि मानवता के साथ खिलवाड़ करने वाली थीं। पूरी तरह से अंधकार के आगोश में डूबी अस्पताल की बिल्डिंग में पीने के लिये तो दूर हाथ धोने के लिए भी पानी नही था। वार्डों में गंदगी, खून के धब्बों से सनी चादरें पड़ी हुई थीं।
तीन नवजात बच्चियां और उनकी नवप्रसूता माताएं व परिजन मच्छरों को कोप का ग्रास बन रहे है। अस्पताल में बिजली न होने के कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। मच्छरों से बचने के लिये तीनों नवप्रसूता महिलाएं अस्पताल की गैलरी के नंगे फर्श पर ही अपनी बच्चियों को लिये लेटी थीं। अस्पताल में उस समय केवल एक चौकीदार मौजूद था तथा पूछने पर उसने बताया कि ड्यूटी पर मौजूद सिस्टर खाना बनाने अपने क्वार्टर पर गई हैं।
एक तरह से कैदी का सा हो रहा है बर्ताव:-
गांव बड़सीकरी की प्रसूता पूनम, कौलेखां की राजबाला व कलायत की मनीषा का कहना था कि उन तीनों ने मंगलवार को पुत्रियों को जन्म दिया है। सांझ होते ही अंधेरे के आगोश में डूबने वाली अस्पताल की बिल्डिंग में बिजली न होने के कारण मच्छरों की भरमार है। न तो कोई डाक्टर है न कोई मूलभूत सुविधा।
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यदि घर जाने के लिए कहते हैं तो उसके लिये पूरी तरह से मनाही है। महिलाओं का कहना था कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे वे लोग प्रसूता न होकर जेल में बंद कैदी हों।
हाथ धोने तक नही है पानी:-
पूनम का कहना था कि अस्पताल परिसर में पीने के लिये तो दूर हाथ धोने तक के लिए पानी नही है। शौचालय में जाने के बाद हाथ तक धोने के लिए पानी न होने के कारण गंदे हाथों से ही खाना पड़ रहा है। अस्पताल में प्रसूति करवाने के लिए सरकार तो इस लिये प्रयासरत है कि प्रसूता किसी संक्रामक रोग की चपेट में न आये पर कलायत के अस्पताल में तो प्रसूता व नवजात को गंदगी के अलावा कुछ मिलता ही नहीं।
परिजन भगवान सिंह, वीरेंद्र कौलेखां का कहना था कि वे आधारभूत सुविधाओं को लेकर बार बार चिकित्सकों व कर्मचारियों से निवेदन कर चुके हैं पर कोई सुनवाई ही नही होती। प्रसूता को यदि घर लेकर जाने की बात करते हैं तो कहा जाता है कि दो दिन से पहले घर जाने की इजाजत ही नहीं है। जो हालात अस्पताल में बने हैं उससे तो नवजात व माताओं को संक्रामक रोगों से बचाया ही नही जा सकता।
परिजनों का कहना है कि शौचालयों पर या तो ताले लगे हैं या फिर उनमें दरवाजे भी टूटे हुए हैं। परिसर में खड़ा जनरेटर एक सफेद हाथी बना है तथा भवन अंधेरे में डूबा है।
इसी तरह से रात्रि में झगड़ा होने पर घायल हुये गांव सजूमा के युवक काका के परिजनों का कहना था कि वे अपने घायल पुत्र को लेकर कलायत के अस्पताल में आये हैं। पर यहां न तो चिकित्सक है तथा न ही कोई स्टाफ। क्वार्टर से नर्स को बुला कर ही उन्होंने मरहम पट्टी करवाई तथा उसने आगे कैथल के लिये रेफर कर दिया।
वहीं कार्यकारी चिकित्सा अधिकारी डा.बलविंद्र ने कहा कि यदि पानी नहीं था तो दिन में बात करनी चाहिए थी। अब रात में वे पानी का प्रबंध कैसे करें। बिजली को ठीक करने के लिए वे मैकेनिक को भिजवा रहे हैं।
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तीन नवजात बच्चियां और उनकी नवप्रसूता माताएं व परिजन मच्छरों को कोप का ग्रास बन रहे है। अस्पताल में बिजली न होने के कारण मच्छरों का भयंकर प्रकोप था। मच्छरों से बचने के लिये तीनों नवप्रसूता महिलाएं अस्पताल की गैलरी के नंगे फर्श पर ही अपनी बच्चियों को लिये लेटी थीं। अस्पताल में उस समय केवल एक चौकीदार मौजूद था तथा पूछने पर उसने बताया कि ड्यूटी पर मौजूद सिस्टर खाना बनाने अपने क्वार्टर पर गई हैं।
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एक तरह से कैदी का सा हो रहा है बर्ताव:-
गांव बड़सीकरी की प्रसूता पूनम, कौलेखां की राजबाला व कलायत की मनीषा का कहना था कि उन तीनों ने मंगलवार को पुत्रियों को जन्म दिया है। सांझ होते ही अंधेरे के आगोश में डूबने वाली अस्पताल की बिल्डिंग में बिजली न होने के कारण मच्छरों की भरमार है। न तो कोई डाक्टर है न कोई मूलभूत सुविधा।
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यदि घर जाने के लिए कहते हैं तो उसके लिये पूरी तरह से मनाही है। महिलाओं का कहना था कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे वे लोग प्रसूता न होकर जेल में बंद कैदी हों।
हाथ धोने तक नही है पानी:-
पूनम का कहना था कि अस्पताल परिसर में पीने के लिये तो दूर हाथ धोने तक के लिए पानी नही है। शौचालय में जाने के बाद हाथ तक धोने के लिए पानी न होने के कारण गंदे हाथों से ही खाना पड़ रहा है। अस्पताल में प्रसूति करवाने के लिए सरकार तो इस लिये प्रयासरत है कि प्रसूता किसी संक्रामक रोग की चपेट में न आये पर कलायत के अस्पताल में तो प्रसूता व नवजात को गंदगी के अलावा कुछ मिलता ही नहीं।
परिजन भगवान सिंह, वीरेंद्र कौलेखां का कहना था कि वे आधारभूत सुविधाओं को लेकर बार बार चिकित्सकों व कर्मचारियों से निवेदन कर चुके हैं पर कोई सुनवाई ही नही होती। प्रसूता को यदि घर लेकर जाने की बात करते हैं तो कहा जाता है कि दो दिन से पहले घर जाने की इजाजत ही नहीं है। जो हालात अस्पताल में बने हैं उससे तो नवजात व माताओं को संक्रामक रोगों से बचाया ही नही जा सकता।
परिजनों का कहना है कि शौचालयों पर या तो ताले लगे हैं या फिर उनमें दरवाजे भी टूटे हुए हैं। परिसर में खड़ा जनरेटर एक सफेद हाथी बना है तथा भवन अंधेरे में डूबा है।
इसी तरह से रात्रि में झगड़ा होने पर घायल हुये गांव सजूमा के युवक काका के परिजनों का कहना था कि वे अपने घायल पुत्र को लेकर कलायत के अस्पताल में आये हैं। पर यहां न तो चिकित्सक है तथा न ही कोई स्टाफ। क्वार्टर से नर्स को बुला कर ही उन्होंने मरहम पट्टी करवाई तथा उसने आगे कैथल के लिये रेफर कर दिया।
वहीं कार्यकारी चिकित्सा अधिकारी डा.बलविंद्र ने कहा कि यदि पानी नहीं था तो दिन में बात करनी चाहिए थी। अब रात में वे पानी का प्रबंध कैसे करें। बिजली को ठीक करने के लिए वे मैकेनिक को भिजवा रहे हैं।