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पारंपरिक खेती की बजाय कृषि को दें व्यवसाय का रूप : डा.कंबोज
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07-कलायत। गांव बाता में किसान मेले में लगे आर्गेनिक दवाओं के बारे में ईश्वर कुंडू से जानकारी लेते क
- फोटो : Kaithal
कलायत। प्राकृतिक खेती व फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय हिसार के सौजन्य से गांव बात्ता में किसान मेले का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में एचएयू व गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार के उप कुलपति बीआर कंबोज बतौर मुख्यातिथि मौजूद रहे। इस मौके पर उन्होंने किसानों को प्राकृतिक खेती का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि वे पारंपरिक खेती की बजाय कृषि को व्यवसाय का रूप दें। इस मौके पर कई किसानों को उन्होंने सम्मानित भी किया।
उन्होंने कहा कि पहले देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर होने की जरूरत थी, जिसमें पंजाब व हरियाणा ने अपना 40 प्रतिशत योगदान दिया। जब देश को अनाज की आवश्यकता थी तो हरित क्रांति के माध्यम से पैदा किया गया। कृषि क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हुए और निर्यात भी किया पर उसकी कीमत देश की मिट्टी को चुकानी पड़ी। उन्होंने कहा कि आज समय के साथ-साथ कृषि की जरूरतें बदल गई हैं। पारंपरिक खेती पूरी तरह से घाटे का सौदा बन गई है। मौजूदा कृषि किसान को लाभ तो दे नहीं रही पर प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान अवश्य पहुंचा रही है।
उन्होंने कहा कि हालात बताते हैं कि मृदा की संरचना को नुकसान हुआ है। भूमिगत जल नीचे चला गया है। साथ ही मृदा से आर्गेनिक कार्बन समाप्त हो रहा है। ये सारे लक्षण बर्बादी के हैं। इसमें सुधार के लिए बदलाव की अति आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आज पारंपरिक खेती की बजाए, हमें कृषि को व्यवसाय का रूप देना होगा। पूरी दुनिया इस साल को मोटे अनाज के वर्ष के रूप में बना रही है। अब हमें अंधाधुंध कृषि रसायनों व खादों के प्रयोग से बचना होगा तथा वक्त की जरूरत के अनुसार अपनी खेती को प्रकृति से जोड़ कर उसे प्राकृतिक खेती की और मोड़ना होगा।
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इस मौके पर किसानों की ओर से पूछे गए प्राकृतिक खेती की कम पैदावार, कम मुनाफा व बाजार आदि के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र व प्रदेश सरकार देश को जैविक खेती की दिशा में अग्रसर करने के लिए अनेक कदम उठा रही है। पैदावार कम है तो उस पर लागत भी कम आती है, जिससे शुद्ध मुनाफा बढ़ता है। कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती करने वाले जिला के कई किसानों को उन्होंने सम्मानित भी किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डा.बलवान सिंह मंडल, डीडीए कर्मचंद, कार्यक्रम के आयोजन डा.रमेश चंद्र वर्मा, डा.जसबीर सिंह व पीएनबी से रमन कुमार के अलावा बड़ी संख्या में जिला भर के किसान मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि पहले देश को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर होने की जरूरत थी, जिसमें पंजाब व हरियाणा ने अपना 40 प्रतिशत योगदान दिया। जब देश को अनाज की आवश्यकता थी तो हरित क्रांति के माध्यम से पैदा किया गया। कृषि क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हुए और निर्यात भी किया पर उसकी कीमत देश की मिट्टी को चुकानी पड़ी। उन्होंने कहा कि आज समय के साथ-साथ कृषि की जरूरतें बदल गई हैं। पारंपरिक खेती पूरी तरह से घाटे का सौदा बन गई है। मौजूदा कृषि किसान को लाभ तो दे नहीं रही पर प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान अवश्य पहुंचा रही है।
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उन्होंने कहा कि हालात बताते हैं कि मृदा की संरचना को नुकसान हुआ है। भूमिगत जल नीचे चला गया है। साथ ही मृदा से आर्गेनिक कार्बन समाप्त हो रहा है। ये सारे लक्षण बर्बादी के हैं। इसमें सुधार के लिए बदलाव की अति आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आज पारंपरिक खेती की बजाए, हमें कृषि को व्यवसाय का रूप देना होगा। पूरी दुनिया इस साल को मोटे अनाज के वर्ष के रूप में बना रही है। अब हमें अंधाधुंध कृषि रसायनों व खादों के प्रयोग से बचना होगा तथा वक्त की जरूरत के अनुसार अपनी खेती को प्रकृति से जोड़ कर उसे प्राकृतिक खेती की और मोड़ना होगा।
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इस मौके पर किसानों की ओर से पूछे गए प्राकृतिक खेती की कम पैदावार, कम मुनाफा व बाजार आदि के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र व प्रदेश सरकार देश को जैविक खेती की दिशा में अग्रसर करने के लिए अनेक कदम उठा रही है। पैदावार कम है तो उस पर लागत भी कम आती है, जिससे शुद्ध मुनाफा बढ़ता है। कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती करने वाले जिला के कई किसानों को उन्होंने सम्मानित भी किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डा.बलवान सिंह मंडल, डीडीए कर्मचंद, कार्यक्रम के आयोजन डा.रमेश चंद्र वर्मा, डा.जसबीर सिंह व पीएनबी से रमन कुमार के अलावा बड़ी संख्या में जिला भर के किसान मौजूद रहे।