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भारतीय धर्मशास्त्र व्यावहारिक न्याय व्यवस्था का दर्शन : प्रो. माथुर
Sun, 25 Aug 2024 03:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Sun, 25 Aug 2024 03:51 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय ने टीक परिसर में संस्थापित भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा में विधि शास्त्र विषय पर शनिवार को एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की। इसमे मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. आशुतोष दयाल माथुर रहे। उन्होंने प्रतिपादित किया कि भारतीय धर्मशास्त्र व्यावहारिक न्याय व्यवस्था का दर्शन है।
कार्यशाला में देशभर से आए हुए विधि शास्त्र एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वानों ने इससे संबंधित व्यावहारिक विषयों पर विमर्श किया। साथ ही इसमें आधुनिक विधि विशेषज्ञों के साथ-साथ भारतीय धर्मशास्त्र, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मीमांसा एवं स्मृति शास्त्रों पर भी चर्चा हुई। कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश गर्ग ने कहा कि प्रशासन व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और विशेष रूप से न्याय व्यवस्था भारतीय संदर्भों में भारतीय जनमानस की आकांक्षा और जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए।
कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विधि शास्त्र से संबंधित ग्रंथों पर चर्चा करके मॉड्यूल विकसित करने के उद्देश्य से यह कार्यशाला आयोजित की जा रही है। वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था में न्याय व्यवस्था (विधि शास्त्र) का व्यापक स्तर पर एलएलबी एवं एलएलएम पाठ्यक्रमों का स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन एवं अध्यापन होता है। इसलिए नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार इसके पाठ्यक्रमों का निर्माण किया जा रहा है।
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उन्होंने बताया कि भारत में जो न्याय व्यवस्था है, उसमें प्राचीन भारतीय विधि शास्त्र का भी समायोजन है। भारत की कोर्ट ने भी कई संदर्भों में अपने निर्णयों में प्राचीन भारतीय शास्त्रों को प्रमाण माना है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. अमित कुमार ने आधुनिक न्याय व्यवस्था की चुनौतियों को प्रस्तुत किया उन्होंने संस्कृत के विद्वानों से भारतीय दृष्टि से समाधान देने का अनुरोध किया।
गौरतलब है कि महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय में लगातार सम्मेलन, संगोष्ठी, कार्यशाला आदि का आयोजन किया जाता रहा है।
इसी कड़ी में विश्वविद्यालय का भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र प्राचीन भारतीय विधि शास्त्र पर संगोष्ठी आयोजित किया। गत वर्ष भी भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र की ओर से भारतीय गणित परंपरा, भारतीय खगोल विद्या, भारतीय रसायन विद्या, भारतीय राजनीति विज्ञान, भाषा विज्ञान के विषयों पर कार्यशाला के माध्यम से पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. सत्य प्रकाश दूबे, प्रो. भाग सिंह बोदला, डॉ. नवीन शर्मा आदि मौजूद रहे। इससे पूर्व कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ विधिवेत्ता अधिवक्ता मुकेश गर्ग रहे। अध्यक्षता कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने की।
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के निदेशक प्रो. चांद किरण सलूजा ऑनलाइन माध्यम से उपस्थित रहे। इस अवसर पर विषय विशेषज्ञ विद्वानों में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विधि संस्थान से डॉ. अमित कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. मीनाक्षी व जिला न्यायालय कैथल से अधिवक्ता राजेश गोरसी उपस्थित रहे।
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कैथल। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय ने टीक परिसर में संस्थापित भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा में विधि शास्त्र विषय पर शनिवार को एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की। इसमे मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. आशुतोष दयाल माथुर रहे। उन्होंने प्रतिपादित किया कि भारतीय धर्मशास्त्र व्यावहारिक न्याय व्यवस्था का दर्शन है।
कार्यशाला में देशभर से आए हुए विधि शास्त्र एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वानों ने इससे संबंधित व्यावहारिक विषयों पर विमर्श किया। साथ ही इसमें आधुनिक विधि विशेषज्ञों के साथ-साथ भारतीय धर्मशास्त्र, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मीमांसा एवं स्मृति शास्त्रों पर भी चर्चा हुई। कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश गर्ग ने कहा कि प्रशासन व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और विशेष रूप से न्याय व्यवस्था भारतीय संदर्भों में भारतीय जनमानस की आकांक्षा और जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए।
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कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विधि शास्त्र से संबंधित ग्रंथों पर चर्चा करके मॉड्यूल विकसित करने के उद्देश्य से यह कार्यशाला आयोजित की जा रही है। वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था में न्याय व्यवस्था (विधि शास्त्र) का व्यापक स्तर पर एलएलबी एवं एलएलएम पाठ्यक्रमों का स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन एवं अध्यापन होता है। इसलिए नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार इसके पाठ्यक्रमों का निर्माण किया जा रहा है।
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उन्होंने बताया कि भारत में जो न्याय व्यवस्था है, उसमें प्राचीन भारतीय विधि शास्त्र का भी समायोजन है। भारत की कोर्ट ने भी कई संदर्भों में अपने निर्णयों में प्राचीन भारतीय शास्त्रों को प्रमाण माना है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. अमित कुमार ने आधुनिक न्याय व्यवस्था की चुनौतियों को प्रस्तुत किया उन्होंने संस्कृत के विद्वानों से भारतीय दृष्टि से समाधान देने का अनुरोध किया।
गौरतलब है कि महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय में लगातार सम्मेलन, संगोष्ठी, कार्यशाला आदि का आयोजन किया जाता रहा है।
इसी कड़ी में विश्वविद्यालय का भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र प्राचीन भारतीय विधि शास्त्र पर संगोष्ठी आयोजित किया। गत वर्ष भी भारतीय ज्ञान परंपरा शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र की ओर से भारतीय गणित परंपरा, भारतीय खगोल विद्या, भारतीय रसायन विद्या, भारतीय राजनीति विज्ञान, भाषा विज्ञान के विषयों पर कार्यशाला के माध्यम से पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. सत्य प्रकाश दूबे, प्रो. भाग सिंह बोदला, डॉ. नवीन शर्मा आदि मौजूद रहे। इससे पूर्व कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ विधिवेत्ता अधिवक्ता मुकेश गर्ग रहे। अध्यक्षता कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने की।
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के निदेशक प्रो. चांद किरण सलूजा ऑनलाइन माध्यम से उपस्थित रहे। इस अवसर पर विषय विशेषज्ञ विद्वानों में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विधि संस्थान से डॉ. अमित कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. मीनाक्षी व जिला न्यायालय कैथल से अधिवक्ता राजेश गोरसी उपस्थित रहे।