{"_id":"58e142104f1c1b3a465b484f","slug":"development-kapisthal-new-name-nagar-parishad-kaithal","type":"story","status":"publish","title_hn":"...तो फिर से कपिस्थल बनेगा कैथल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...तो फिर से कपिस्थल बनेगा कैथल
ब्यूरो कैथ्ाल
Updated Sun, 02 Apr 2017 11:55 PM IST
विज्ञापन
पौराणिक महत्व के तीर्थ स्थित हैं कैथल में
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यदि सब कुछ सही रहा तो कैथल को लोग कपिस्थल के नाम से जानेंगे। नगर परिषद कैथल द्वारा इस संबंध में जानकारी जुटाई जा रही है। अगली परिषद की आम बैठक में यह मसौदा रखा जाएगा। जिसमें पार्षदों की सहमति से प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजा जाएगा। वेदों व पुराणों सहित कई धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रंथों में कैथल का नाम कपिस्थल रहा है। वहीं हनुमान जी की जन्मस्थली होने के कारण भी कैथल को कपिस्थल के नाम से जाना जाता है।
कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व के ग्रंथों में मिला है कपिस्थल का जिक्र
कपिस्थल अतीत के झरोखे से वर्तमान की देहली तक के रचयिता इतिहासकार कमलेश शर्मा के अनुसार महाभारत, वामन पुराण, पाणिनी की अष्टाध्यायी, वराहमिहिर की वृहत संहिता जैसे ग्रंथों में कपिस्थल का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वन पर्व के अनुसार यह कपिस्थल महात्मा का स्थान था। वराहमिहिर की वृहत संहिता और पाणिनी की अष्टाध्यायी में इसे कपिस्ठल कहा गया है। चौथी शताब्दी ईश्वी पूर्व के सम्राट चंद्रगुप्त मोर्य के दरबार में यूनान के राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में इसे कंबीस्थलों लिखा है। प्रसिद्ध विदेशी यात्री अल्बेरुनी ने अपनी पुस्तक खिताब उल हिंद में कविताल नाम से इसका उल्लेख किया है। इस प्रकार कपिस्थल, कपिस्ठल, कविताल ही अपभ्रंश होकर आज का कैथल बना है।
इस समय कई एतिहासिक महत्व के स्थल हैं शहर में
शहर में इस समय महाभारत कालीन एतिहासिक श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित नवग्रह कुंड, ऐतिहासिक एवं प्राचीन बावड़ी, वृद्धकेदार सरोवर, महाभारत कालीन कई गांवों में स्थिल तीर्थ स्थल, कलायत का कपिस्थल, अंबकेश्वर मंदिर, प्राचीन सूर्य मंदिर, पूंडरी में पूंडरीक तीर्थ, फरल में फल्गू तीर्थ, पोलड़ में पोलड़ थेह, अरंतुक यक्ष तीर्थ के अलावा महाभारत काल के करीब 51 तीर्थ हैं। यह महाभारत में 48 कोस की परिधि में आता है।
विज्ञापन
हनुमान जी की जन्मस्थली के कारण भी रहा है कपिस्थल नाम
शहर में आज भी माता अंजनि का टीला है। किवदंती के अनुसार जहां हनुमान जी का मंदिर है। बताया जा रहा है कि यहीं पर भगवान हनुमान जी का जन्म हुआ था। इस कारण भी कैथल का नाम कपिस्थल रहा है। जो बाद में धीरे-धीरे कैथल में तब्दील हो गया।
कैथल का नाम वेदों व पुराणों में कपिस्थल रहा है। यदि अब भी नाम बदलकर कपिस्थल कर दिया जाए तो हम सीधा वेद व पुराणों से जुड़ जाएंगे। इस बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। अगली बैठक में पार्षदों की सहमति से यह प्रस्ताव पारित किया जाएगा। इसके बाद सरकार को भेजा जाएगा। ताकि कैथल से यह कपिस्थल बन सके और अपना पौराणिक महत्व हासिल कर सके। इसके अलावा भी कई परियोजनाएं हैं। जिन पर नगर परिषद कैथल काम कर सकती है।
यशपाल प्रजापति, चेयरमैन, नगर परिषद, कैथल।
विज्ञापन
कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व के ग्रंथों में मिला है कपिस्थल का जिक्र
कपिस्थल अतीत के झरोखे से वर्तमान की देहली तक के रचयिता इतिहासकार कमलेश शर्मा के अनुसार महाभारत, वामन पुराण, पाणिनी की अष्टाध्यायी, वराहमिहिर की वृहत संहिता जैसे ग्रंथों में कपिस्थल का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वन पर्व के अनुसार यह कपिस्थल महात्मा का स्थान था। वराहमिहिर की वृहत संहिता और पाणिनी की अष्टाध्यायी में इसे कपिस्ठल कहा गया है। चौथी शताब्दी ईश्वी पूर्व के सम्राट चंद्रगुप्त मोर्य के दरबार में यूनान के राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में इसे कंबीस्थलों लिखा है। प्रसिद्ध विदेशी यात्री अल्बेरुनी ने अपनी पुस्तक खिताब उल हिंद में कविताल नाम से इसका उल्लेख किया है। इस प्रकार कपिस्थल, कपिस्ठल, कविताल ही अपभ्रंश होकर आज का कैथल बना है।
विज्ञापन
इस समय कई एतिहासिक महत्व के स्थल हैं शहर में
शहर में इस समय महाभारत कालीन एतिहासिक श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित नवग्रह कुंड, ऐतिहासिक एवं प्राचीन बावड़ी, वृद्धकेदार सरोवर, महाभारत कालीन कई गांवों में स्थिल तीर्थ स्थल, कलायत का कपिस्थल, अंबकेश्वर मंदिर, प्राचीन सूर्य मंदिर, पूंडरी में पूंडरीक तीर्थ, फरल में फल्गू तीर्थ, पोलड़ में पोलड़ थेह, अरंतुक यक्ष तीर्थ के अलावा महाभारत काल के करीब 51 तीर्थ हैं। यह महाभारत में 48 कोस की परिधि में आता है।
विज्ञापन
हनुमान जी की जन्मस्थली के कारण भी रहा है कपिस्थल नाम
शहर में आज भी माता अंजनि का टीला है। किवदंती के अनुसार जहां हनुमान जी का मंदिर है। बताया जा रहा है कि यहीं पर भगवान हनुमान जी का जन्म हुआ था। इस कारण भी कैथल का नाम कपिस्थल रहा है। जो बाद में धीरे-धीरे कैथल में तब्दील हो गया।
कैथल का नाम वेदों व पुराणों में कपिस्थल रहा है। यदि अब भी नाम बदलकर कपिस्थल कर दिया जाए तो हम सीधा वेद व पुराणों से जुड़ जाएंगे। इस बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। अगली बैठक में पार्षदों की सहमति से यह प्रस्ताव पारित किया जाएगा। इसके बाद सरकार को भेजा जाएगा। ताकि कैथल से यह कपिस्थल बन सके और अपना पौराणिक महत्व हासिल कर सके। इसके अलावा भी कई परियोजनाएं हैं। जिन पर नगर परिषद कैथल काम कर सकती है।
यशपाल प्रजापति, चेयरमैन, नगर परिषद, कैथल।