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Kaithal News: अहोई अष्टमी का व्रत संतान के लिए होता है फलदायी
Wed, 23 Oct 2024 02:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Wed, 23 Oct 2024 02:25 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल/कलायत। अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखती है। यह व्रत भी करवा चौथ की तरह निर्जला रखा जाता है और व्रत को आकाश में तारों को देखने के बाद ही खोला जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत 24 अक्तूबर को मनाया जाएगा।
अहोई अष्टमी का व्रत का कार्तिक माह की अष्टमी को मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक साहूकार के सात पुत्र व पुत्रवधू और एक बेटी थी, जो कार्तिक माह की अष्टमी पर मकान में लिपाई के लिए सभी पुत्र वधुओं व ननद के साथ मिट्टी लेने गई थी और मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से कुदाली स्याहू के बच्चों को लग गई, जिससे वे मर गए।
इससे नाराज होकर स्याहू माता उसे निसंतान होने का श्राप देती है, जिससे ननद अपनी भाभियों से श्राप अपने ऊपर लेने के लिए कहती है। इस दौरान सबसे छोटी भाभी उस श्राप को अपने ऊपर ले लेती है।
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इस कारण उसे जब भी बच्चा पैदा होता तो वह सात दिनों के अंदर मर जाता था, जिससे देकर एक पंडित जी कहते है कि तुम गाय की सेवा करो, जो कि स्याहू माता की काफी प्रिय है। इससे स्याहू माता प्रसन्न होकर अपने श्राप को वापस ले लेंगी। इसके पश्चात वह गाय की खूब सेवा करती है, जिससे प्रसन्न होकर गाय उसे स्याहू माता के पास ले जाती है। माता स्याहू पुत्रवधू से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्रों का वरदान देती है, जिससे उसे फिर से संतान प्राप्त होती है। इसी परंपरा के चलते अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं अपने पुत्रों की लंबी आयु के लिए रखती हैं।
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि अहोई अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अक्तूबर बुधवार को रात 1ः18 मिनट पर होगी। अहोई अष्टमी का समापन 24 अक्तूबर की रात 1ः58 पर होगा। तिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 24 अक्तूबर बृहस्पतिवार के दिन रखा जाएगा। पं. शांडिल्य ने बताया की अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के व्रत के 4 दिन के बाद आता है। इस व्रत को अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है।
गौरतलब है कि अहोई अष्टमी का व्रत उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय हैं। इस दिन माताएं अपने बच्चों के लिए व्रत करती हैं। वहीं अगर निसंतान महिलाएं अगर इस दिन व्रत करती हैं तो माना जाता है उन्हें संतान की प्राप्ति होती हैं।
व्रत का महत्व
शांडिल्य ने बताया कि अहोई अष्टमी व्रत का महत्व बहुत ही खास माना गया है। इस व्रत को करने से आपकी संतान खुशहाल होने के साथ ही दीर्घायु भी होती हैं। हर प्रकार के रोगों से उनकी रक्षा होता है। स्याहू माता बच्चों का भाग्य बनाती हैं और उनको हर बुरी नजर से बचाती हैं। इस व्रत को करने से घर में सुख समृद्धि बढ़ती हैं और बच्चे करियर में खूब तरक्की करते हैं। यह व्रत सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक रखा जाता है और बिना अन्न जल ग्रहण तारों को जल अर्पित करने के बाद ही यह व्रत खोला जाता है।
अहोई अष्टमी पर तारों को देखने का शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी पर तारों को देखकर अर्घ्य देने का समय शाम को छह बजकर छह मिनट से है। इस दिन सूर्यास्त पांच बजकर 42 मिनट पर होगा। माताएं अहोई अष्टमी पर तारों को जल चढ़ाने के बाद पूजा करती हैं और उसके गुड़ के बने पुए से चंद्रमा का भोग लगाकर स्वयं भी उसी से व्रत खोलती हैं। बच्चों को भी वह पुए प्रसाद के रूप में देती हैं।
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कैथल/कलायत। अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखती है। यह व्रत भी करवा चौथ की तरह निर्जला रखा जाता है और व्रत को आकाश में तारों को देखने के बाद ही खोला जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत 24 अक्तूबर को मनाया जाएगा।
अहोई अष्टमी का व्रत का कार्तिक माह की अष्टमी को मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक साहूकार के सात पुत्र व पुत्रवधू और एक बेटी थी, जो कार्तिक माह की अष्टमी पर मकान में लिपाई के लिए सभी पुत्र वधुओं व ननद के साथ मिट्टी लेने गई थी और मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से कुदाली स्याहू के बच्चों को लग गई, जिससे वे मर गए।
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इससे नाराज होकर स्याहू माता उसे निसंतान होने का श्राप देती है, जिससे ननद अपनी भाभियों से श्राप अपने ऊपर लेने के लिए कहती है। इस दौरान सबसे छोटी भाभी उस श्राप को अपने ऊपर ले लेती है।
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इस कारण उसे जब भी बच्चा पैदा होता तो वह सात दिनों के अंदर मर जाता था, जिससे देकर एक पंडित जी कहते है कि तुम गाय की सेवा करो, जो कि स्याहू माता की काफी प्रिय है। इससे स्याहू माता प्रसन्न होकर अपने श्राप को वापस ले लेंगी। इसके पश्चात वह गाय की खूब सेवा करती है, जिससे प्रसन्न होकर गाय उसे स्याहू माता के पास ले जाती है। माता स्याहू पुत्रवधू से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्रों का वरदान देती है, जिससे उसे फिर से संतान प्राप्त होती है। इसी परंपरा के चलते अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं अपने पुत्रों की लंबी आयु के लिए रखती हैं।
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि अहोई अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अक्तूबर बुधवार को रात 1ः18 मिनट पर होगी। अहोई अष्टमी का समापन 24 अक्तूबर की रात 1ः58 पर होगा। तिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 24 अक्तूबर बृहस्पतिवार के दिन रखा जाएगा। पं. शांडिल्य ने बताया की अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के व्रत के 4 दिन के बाद आता है। इस व्रत को अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है।
गौरतलब है कि अहोई अष्टमी का व्रत उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय हैं। इस दिन माताएं अपने बच्चों के लिए व्रत करती हैं। वहीं अगर निसंतान महिलाएं अगर इस दिन व्रत करती हैं तो माना जाता है उन्हें संतान की प्राप्ति होती हैं।
व्रत का महत्व
शांडिल्य ने बताया कि अहोई अष्टमी व्रत का महत्व बहुत ही खास माना गया है। इस व्रत को करने से आपकी संतान खुशहाल होने के साथ ही दीर्घायु भी होती हैं। हर प्रकार के रोगों से उनकी रक्षा होता है। स्याहू माता बच्चों का भाग्य बनाती हैं और उनको हर बुरी नजर से बचाती हैं। इस व्रत को करने से घर में सुख समृद्धि बढ़ती हैं और बच्चे करियर में खूब तरक्की करते हैं। यह व्रत सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक रखा जाता है और बिना अन्न जल ग्रहण तारों को जल अर्पित करने के बाद ही यह व्रत खोला जाता है।
अहोई अष्टमी पर तारों को देखने का शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी पर तारों को देखकर अर्घ्य देने का समय शाम को छह बजकर छह मिनट से है। इस दिन सूर्यास्त पांच बजकर 42 मिनट पर होगा। माताएं अहोई अष्टमी पर तारों को जल चढ़ाने के बाद पूजा करती हैं और उसके गुड़ के बने पुए से चंद्रमा का भोग लगाकर स्वयं भी उसी से व्रत खोलती हैं। बच्चों को भी वह पुए प्रसाद के रूप में देती हैं।