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Yuva Najariya: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की क्षमता पर बड़ा सवाल है इस्राइल-हमास संघर्ष

Thu, 28 Dec 2023 04:40 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो माई सिटी रिपोर्टर, हिसार (हरियाणा)
माई सिटी रिपोर्टर, हिसार (हरियाणा) Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 28 Dec 2023 04:40 PM IST
सार

Yuva Najariya: इस्राइल-हमास संघर्ष निर्णायक कार्रवाई करने में असमर्थता का केवल एक उदाहरण है। इस शिथिलता का मूल असमान शक्ति वितरण और वीटो प्रणाली में निहित है, जो परिषद की अपने जनादेश को पूरा करने की क्षमता में बाधा डालती है।

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Yuva Najariya: Israel-Hamas conflict is a big question on the capacity of UN Security Council
युवा नजरिया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गाजा में चल रहा इस्राइल-हमास संघर्ष लगातार दुनिया का ध्यान खींच रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी), शांति और सुरक्षा बनाए रखने में बार-बार विफल रही है। इस्राइल-हमास संघर्ष अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने मिशन में यूएनएससी के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालता है।

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बदलती वैश्विक शक्ति गतिशीलता के कारण इस्राइल-हमास संघर्ष में युद्धविराम लाने की संयुक्त राष्ट्र की क्षमता पर सवाल उठाया जा रहा है। समय के साथ, संघर्ष समाधान में संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता कम हो गई है और हाल के दशकों में इसके प्रभाव में कमी देखी गई है। प्रमुख शक्तियों के बीच परस्पर विरोधी हित अक्सर संयुक्त राष्ट्र को शांति निर्माण, सुरक्षा और युद्धविराम समझौतों से संबंधित मामलों पर आम सहमति तक पहुंचने से रोकते हैं।
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सुधार की आवश्यकता के साथ-साथ पी5 और वीटो शक्ति की भूमिका, गंभीर मुद्दे बने हुए हैं। यूएनएससी की वर्तमान स्थिति को इसके मौजूदा स्वरूप में व्यापक से पंगु और निष्क्रिय माना जाता है। ऐसे संयुक्त राष्ट्र की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।
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इस्राइल-हमास संघर्ष निर्णायक कार्रवाई करने में असमर्थता का केवल एक उदाहरण है। इस शिथिलता का मूल असमान शक्ति वितरण और वीटो प्रणाली में निहित है, जो परिषद की अपने जनादेश को पूरा करने की क्षमता में बाधा डालती है। जैसे-जैसे दुनिया संघर्षों, आतंकवाद, मानवीय संकटों और उभरते खतरों से जूझ रही है, एक पुनर्जीवित और अधिक कुशल संयुक्त राष्ट्र शांति और सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता तेजी से स्पष्ट होती जा रही है।

हालांकि, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों को लागू करने के लिए सदस्य देशों की सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ लगातार निगरानी और मूल्यांकन की आवश्यकता होगी। जब तक यूएनएससी वैश्विक राजनीति की बदलती गतिशीलता के अनुरूप ढलने में असमर्थ रहेगी, उसे अपनी कथित प्रभावहीनता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता रहेगा। दुनिया न केवल इस्राइल-हमास संघर्ष के समाधान की उम्मीद कर रही है, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को पूरा करने के लिए यूएनएससी की क्षमता में फिर से जान फूंकने की भी उम्मीद कर रही है। -प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार

विशेषज्ञ की राय

अमर उजाला ने जो युवा नजरिया कॉलम ने युवाओं की सोच को जानने, समझने व व्यावहारिक दृष्टि से परखने की जो पहल की है, निसंदेह वह अत्यंत सामयिक व सार्थक पहल है। इस बार का विषय हमास-इस्राइल युद्ध और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सामयिक, सामरिक व वैश्विक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील कहा जा सकता है। इस विषय में चार युवाओं के नजरियों के विश्लेषण करने का अवसर मिला। चूंकि विषय अत्यंत व्यापक-आतंकवाद की हद, मानवीय मूल्यों की सुरक्षा व संसार की सर्वाेच्च संस्था संयुक्त राष्ट्र की भूमिका से संबंधित है। अत: इसे सीमित शब्दों में वर्णित करना चुनौतिपूर्ण अवश्य है।

गाजा के विरूद्ध अंधाधुंध या असंगत कार्रवाई उचित नहीं

संयुक्त राष्ट्र इस इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के शांति पूर्ण समाधान की तलाश में सक्रिय रूप से शामिल है, किंतु वीटो पावर का प्रयोग उसे पंगु बना देता है। हम सभी जानते हैं कि आतंकवाद पर अंकुश जरूरी है। किंतु, आतंकवाद की आड़ में अस्पताल, स्कूल, संस्थान, व क्लीनिकों को कभी भी निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। गाजा के विरूद्ध अंधाधुंध या असंगत कार्रवाई उचित नहीं है। इसके लिए जहां इस्राइल मुख्य रूप से उत्तरदायी है, वहीं हमास को संरक्षण देना भी उचित नहीं है। इस समस्या का समाधान संवाद व कूटनीति से ही संभव हो सकता है। समस्या का हल केवल बल, बम, बंदूक व विस्फोट से संभव नहीं होता है।

अत: मानवीय मूल्यों की सुरक्षा हेतु जहां तत्काल सहायता की आवश्यकता है, वहीं सामूहिक तौर पर आतंकवाद पर अंकुश अनिवार्य रूप से लगाकर ही संयुक्त राष्ट्र अपनी सही भूमिका निभा सकेगा। युद्ध से कभी युद्ध का अंत नहीं होता। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि मानवता को भी ध्यान में रखना होगा और संयुक्त राष्ट्र की गरिमा रखनी होगी। - डाॅ. सुरेंद्र कुमार सिंधु, पूर्व प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय व रक्षा मामलों के विशेषज्ञ

हमास -इस्राइल युद्ध और संयुक्त राष्ट्र

1947 के बाद से, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फ़िलिस्तीन को यहूदी और अरब राज्यों में विभाजित करने के पक्ष में मतदान किया, संगठन मध्य पूर्व में संकटों से जूझ रहा है। हाल के दशकों में, संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल-फिलिस्तीनी संघर्ष की चर्चा में एक ही मूल गतिशीलता दिखाई दी है। संयुक्त राज्य अमेरिका सुरक्षा परिषद में इस्राइल की आलोचना को रोकने के लिए अपने वीटो का उपयोग करता है जबकि अरब राज्य फिलिस्तीनियों की रक्षा के लिए विकासशील देशों को एकजुट करते हैं।

इस्राइल और हमास के बीच युद्ध की लंबाई और दायरे के आधार पर, क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की उपस्थिति बढ़ या घट सकती है। यदि शत्रुता अपेक्षाकृत शीघ्र समाप्त हो जाती है, तो संयुक्त राष्ट्र राहत एजेंसियां पुनर्प्राप्ति प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। संघर्ष के बाद के एक परिदृश्य में, जिसे कथित तौर पर अमेरिकी और इस्राइली अधिकारियों द्वारा एक संभावना के रूप में पेश किया गया है, इस्राइली सेना द्वारा हमास को क्षेत्र से हटाने के बाद संयुक्त राष्ट्र को गाजा का प्रशासन करने के लिए कहा जा सकता है। इसके विपरीत, यदि युद्ध पूरे क्षेत्र में फैलने तक लंबे समय तक चलता है, तो यह दक्षिणी लेबनान और गोलान हाइट्स में संयुक्त राष्ट्र की लंबे समय से चली आ रही शांति स्थापना को खतरे में डाल सकता है।

जब इस्राइल ने आखिरी बार 2006 में दक्षिणी लेबनान में एक ऑपरेशन शुरू किया था, तो सुरक्षा परिषद वहां संयुक्त राष्ट्र मिशन को बंद करने के करीब पहुंच गई थी, लेकिन लेबनानी सरकार की आपत्ति के बाद उसने अपना रुख बदल दिया। आज, हिज़्बुल्लाह और ईरान में एक व्यापक युद्ध न केवल संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की वापसी को मजबूर कर सकता है, बल्कि मध्य पूर्व में कहीं और जैसे इराक और यमन में संगठन के मानवीय और राजनयिक कार्यों को भी खतरे में डाल सकता है। - डॉ. सत्यवान सौरभ।

हमास-इस्राइल युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध

युद्ध 21 वीं सदी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। चाहे वह हमास-इस्राइल युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध। हमास -इस्राइल युद्ध ने विश्व को खतरे में डाल दिया है । इससे खाद्यान्न की चीजों में कमी होती जा रही है। यह मानवता के लिए संकट है। युद्ध ने हमेशा विश्व को पीछे की ओर धकेला है जिसमें पहला और दूसरा विश्व युद्ध शामिल है। युद्ध को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई थी, लेकिन यह संस्था युद्ध को रोकने में नाकामयाब हुई है।

जो इस संस्था के उद्देश्य को धूमिल करती है । यह इस बात की और इशारा करती है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में बदलाव की जरूरत है ताकि जिस उद्देश्य से इसकी स्थापना हुई है वह सफल हो सके। संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध क्षेत्र में जरूरी चीजें भेजी हैं, जैसे कि दवाइयां, भोजन आदि। यह थोड़ी मदद तो जरूर है लेकिन युद्ध रोकने में असफल है। इसलिए चाहिए कि वह इस्राइल-हमास युद्ध को जल्दी से जल्दी रोके ताकि जान-माल की हानि बंद हो। युद्ध पर्यावरण के लिए भी हानिकारक होता है। वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी का यह एक कारक भी है। -पवन कुमार।

गाजा में रह रहे फिलिस्तीनी निशाना बने

हाल ही में हमास-इस्राइल युद्ध पर दूसरी बार युद्ध विराम की वार्ता चल रही है । इससे पहले एक सप्ताह की युद्ध विराम में सबसे अधिक बंधक रिहा किए गए। हमास जैसी आतंकी संगठन के हमले के कारण इस्राइल भी हमास को पूरी तरह से मिटाना चाहता है। हमास का अस्तित्व खत्म करने के लिए इसराइल अमानवीयता दिखा रहा है। गाजा में रह रहे फिलिस्तीनी निशाना बने हैं।

 


इन दोनों के संघर्ष की जड़ उनके उदय के साथ ही लग गई थी । इस उदय के कारण गाजा में जिस तरह का आर्थिक संकट पैदा हुआ है, आपातकाल सेवा बंद हुई है। यहां की हालत इस कदर तक खराब हो गई है कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां भी राहत देने की कगार पर नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस भी इन दोनों के एक -दूसरे पर हमले को असंवेदनशील कहा है लेकिन इस्राइल ने इस पर महासचिव से इस्तीफा मांग लिया।

हाल ही में अक्तूबर में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने सभी देशों से युद्ध रोकने की अपील की है। 26 अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र की बैठक में निरंतर संघर्ष विराम का प्रस्ताव अपनाया। 8 अक्तूबर को शुरू हुई हमास-इस्राइल जंग को रोकने के प्रयास लगातार असफल हो रहे हैं। इन दोनों के बीच जारी संघर्ष ने अशांति उत्पन्न कर दी है।

इस युद्ध में मारे गए हजारों गाजा नागरिकों को देखकर अरब देशों ने भी इसराइली हमले की निंदा की है । इन देशों के अनुसार फलस्तीन के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो फलस्तीन हमास हमले के कारण अपनी ही जमीन से बेदखल होने का दर्द झेल रहे हैं। इन हमले से हो रहे नुकसान को देखते हुए युद्ध को विराम देना ही सही है।

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