{"_id":"614e0e7d8ebc3efac877e6a8","slug":"rahul-dev-of-hisar-became-ias-by-securing-76th-rank-in-the-country-hisar-news-hsr6126428154","type":"story","status":"publish","title_hn":"देश में 76वां रैंक हासिल कर आईएएस बने हिसार के राहुल देव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
देश में 76वां रैंक हासिल कर आईएएस बने हिसार के राहुल देव
विज्ञापन
राहुल बूरा
- फोटो : Hisar
हिसार। कोविड की बंदिशों के बीच कड़ी मेहनत कर हिसार के सेक्टर-15 निवासी राहुल देव बूरा ने अपने आईएएस बनने के सपने को साकार किया है। राहुल ने यूपीएससी की परीक्षा में देशभर में 76वां रैंक हासिल किया। वे कोविड के कारण दो वर्षों से घर पर ही आईएएस की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने बताया कि माता-पिता और दादा जी का सपना उन्होंने साकार कर दिखाया है।
आईएएस बने दोस्तों की गाइडेंस आई काम
राहुल ने बताया कि वर्ष 2019 में उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक मैकेनिकल की। इस दौरान उनके कई वरिष्ठ साथी आईएएस की परीक्षा पास कर सफल हो चुके थे। राहुल भी परिजनों के प्रोत्साहन के साथ अपने साथियों के कदम चिह्नों पर चल पड़े। आईएएस बन चुके अपने वरिष्ठ साथियों के मार्गदर्शन के कारण ही आज वह कामयाब हो पाए। राहुल ने 2012 में ब्लूमिंग डेल्स से 10 सीजीपीए से 10वीं की और बाद में 2014 में दिल्ली पब्लिक स्कूल से 94 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं कक्षा पास की थी।
राहुल कहते हैं कि किसी भी इंसान के लिए उसका बेहतर स्वास्थ्य ही पहली व सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी होती है। उन्होंने मानसिक मजबूती के लिए प्रतिदिनयोग किया और शाम के समय फुटबाल खेलते थे। इससे उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद मिली। कोरोना काल में जब लोग मानसिक तनाव में थे, राहुल अपने मजबूत इरादों के साथ अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे।
विज्ञापन
माता-पिता हैं संस्कृत अध्यापक
मूल रूप से गांव घिराय निवासी राहुल के माता-पिता संस्कृत अध्यापक हैं। पिता कर्मबीर शास्त्री बतौर हेडमास्टर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जबकि मां सरोज बाला एचएयू स्थित स्कूल में संस्कृत की अध्यापिका हैं। वहीं, आर्मी से सूबेदार रिटायर्ड दादा भीम सिंह के प्रोत्साहन ने आईएएस बनने के राहुल के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया।
सामान्य दिनों में 8 घंटे की थी पढ़ाई
राहुल ने बताया कि उन्होंने सामान्य दिनों में 8 घंटे पढ़ाई की और पढ़ाई को कभी भी दबाव की तरह नहीं लिया। पढ़ाई करने के साथ दोस्तों के साथ विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा भी उनके काम आई।
युवाओं के लिए संदेश
युवाओं को कहना चाहता हूं कि वे पहले अच्छे नागरिक बनें और अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। कोविड संकट के बीच हम भावनात्मक और दिमागी स्वास्थ्य पर जीत हासिल करके ही आगे बढ़ सकते हैं। इसके लिए परिजनों का सहयोग सबसे जरूरी है। इसके बाद आप चाहे कोई भी लक्ष्य रखें, उसमें सफलता पाना मुश्किल काम नहीं है।
विज्ञापन
आईएएस बने दोस्तों की गाइडेंस आई काम
राहुल ने बताया कि वर्ष 2019 में उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक मैकेनिकल की। इस दौरान उनके कई वरिष्ठ साथी आईएएस की परीक्षा पास कर सफल हो चुके थे। राहुल भी परिजनों के प्रोत्साहन के साथ अपने साथियों के कदम चिह्नों पर चल पड़े। आईएएस बन चुके अपने वरिष्ठ साथियों के मार्गदर्शन के कारण ही आज वह कामयाब हो पाए। राहुल ने 2012 में ब्लूमिंग डेल्स से 10 सीजीपीए से 10वीं की और बाद में 2014 में दिल्ली पब्लिक स्कूल से 94 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं कक्षा पास की थी।
विज्ञापन
राहुल कहते हैं कि किसी भी इंसान के लिए उसका बेहतर स्वास्थ्य ही पहली व सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी होती है। उन्होंने मानसिक मजबूती के लिए प्रतिदिनयोग किया और शाम के समय फुटबाल खेलते थे। इससे उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद मिली। कोरोना काल में जब लोग मानसिक तनाव में थे, राहुल अपने मजबूत इरादों के साथ अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे।
विज्ञापन
माता-पिता हैं संस्कृत अध्यापक
मूल रूप से गांव घिराय निवासी राहुल के माता-पिता संस्कृत अध्यापक हैं। पिता कर्मबीर शास्त्री बतौर हेडमास्टर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जबकि मां सरोज बाला एचएयू स्थित स्कूल में संस्कृत की अध्यापिका हैं। वहीं, आर्मी से सूबेदार रिटायर्ड दादा भीम सिंह के प्रोत्साहन ने आईएएस बनने के राहुल के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया।
सामान्य दिनों में 8 घंटे की थी पढ़ाई
राहुल ने बताया कि उन्होंने सामान्य दिनों में 8 घंटे पढ़ाई की और पढ़ाई को कभी भी दबाव की तरह नहीं लिया। पढ़ाई करने के साथ दोस्तों के साथ विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा भी उनके काम आई।
युवाओं के लिए संदेश
युवाओं को कहना चाहता हूं कि वे पहले अच्छे नागरिक बनें और अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। कोविड संकट के बीच हम भावनात्मक और दिमागी स्वास्थ्य पर जीत हासिल करके ही आगे बढ़ सकते हैं। इसके लिए परिजनों का सहयोग सबसे जरूरी है। इसके बाद आप चाहे कोई भी लक्ष्य रखें, उसमें सफलता पाना मुश्किल काम नहीं है।