{"_id":"78-61491","slug":"Hisar-61491-78","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिसार रंगमंडल के दो दिवसीय रंग महोत्सव का दूसरा और अंतिम दिन ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिसार रंगमंडल के दो दिवसीय रंग महोत्सव का दूसरा और अंतिम दिन
Hisar
Updated Tue, 15 Oct 2013 05:42 AM IST
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हिसार। हिसार रंगमंडल के दो दिवसीय रंग महोत्सव का दूसरा और अंतिम दिन नादिरा जहीर बब्बर के नाम रहा। उनके निर्देशन और अदाकारी से सजे नाटक ‘बेगम जान’ के मंचन ने हिसार में रंगमंच को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया।
हिसार रंगमंडल द्वारा तीन साल से इस नाटक को हिसार में करवाए जाने का प्रयास रंग लाया और रंग प्रेमियों ने इस कृति को हाथों-हाथ लिया। नादिरा जहीर बब्बर की जानदार अदाकारी का दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों ने खूब आनंद उठाया। जिंदल स्टेनलेस स्टील के तुलसी भवन में नाटक के दो शो आयोजित किए गए और दोनों हाउसफुल रहे।
नाटक की कहानी है एक शास्त्रीय गायिका मौसकी की मल्लिका की, जिसने आजादी से पहले और आजादी के बाद के भारत को बदलते देखा है, जिसने वक्त और इतिहास बदलते देखा है। नाटक में दिखाया गया है कि कैसे एक पत्रकार बेगम जान और उनके चाहने वाले रसूखदार नामों के बीच रिश्तों की डोर बांधकर एक सनसनीखेज किताब लिखना चाहता है। इसी चाह में वह बेगमजान के यहां किरायेदार बनकर आता है और दुनिया से छुपी बैठी बेगम जान को अपनी बातों से प्रभावित करके उन्हें बीते दिनों के किस्से सुनाने को मना लेता है। वहीं बेगम जान पत्रकार संजय पांडे को अपनी नवासी जरीना को सहारा देने वाले के रूप में देखती है और इसलिए अपने पुराने किस्से कहने को राजी होती है। लखनवी सेट से सजे मंच पर उर्दू भाषा की इस कृति में जब बेगम जान देश की निरंकुश राजनीति पर व्यंग्य कसती हुई चीखती हैं तो बरसों से सोए समाज की रगों को हिलाकर रख देती हैं। जब वे हास्य की चुटकियां लेती हैं तो दर्शकों की मुस्कान फूटे बिना नहीं रहती और जब वे व्यंग्य की तलवार चलाती हैं तो बात सीधे दिल में जाकर लगती है। वे संस्कृति की विडंबना पर विलाप करती हैं तो रंगशाला में मौजूद लोगों की सोई चेतना को जागृत कर देती हैं। जब वे संवादों के उतार-चढ़ाव को अपने चेहरे पर साकार करती हैं तो भावनाओं का समंदर हिलोरें ले उठता है।
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जावेद सिद्दकी के लिखे इस नाटक की जान इसके संवाद हैं। नाटक में कलाकारों की हालत पर चिंता जताई गई है और पश्चिमी संस्कृति के पीछे भागकर भारतीय संस्कृति और तहजीब को भूलते युवाओं पर कटाक्ष भी किया गया है। हिसार रंग मंडल के संस्थापक व वरिष्ठ रंगकर्मी अनूप गोयल मीचू ने सभी का धन्यवाद किया। बेगम जान की भूमिका नादिरा जाहिर बब्बर ने, उनकी पोती जरीना की भूमिका जूही बब्बर सोनी और पत्रकार संजय पांडे की भूमिका अनूप सोनी ने निभाई। नाटक में संगीत निर्देशन सुनील सिन्हा का, सेट व्यवस्था छैल प्रेश, सेट डिजाइन लखनऊ से मधुसूदन का, वेषभूषा जूही बब्बर सोनी, प्रकाश व्यवस्था अकबर खान, म्यूजिक आपरेशन संतोष तिवारी, वेशभूषा सहायक नेहा शेख व मिथिलेश मेहर, साजोसामान मानव पांडे, मेकअप संजय के मोहंती, बैक स्टेज देवेश, शहनवाज, विपुल व रोहन, स्टेज मैनेजर जूही बब्बर सोनी, प्रोडक्शन हनीफ पटनी और प्रस्तुति एकजुट थियेटर ग्रुप की रही। मंच का संचालन कीर्ति गोयल ने किया।
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हिसार रंगमंडल द्वारा तीन साल से इस नाटक को हिसार में करवाए जाने का प्रयास रंग लाया और रंग प्रेमियों ने इस कृति को हाथों-हाथ लिया। नादिरा जहीर बब्बर की जानदार अदाकारी का दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों ने खूब आनंद उठाया। जिंदल स्टेनलेस स्टील के तुलसी भवन में नाटक के दो शो आयोजित किए गए और दोनों हाउसफुल रहे।
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नाटक की कहानी है एक शास्त्रीय गायिका मौसकी की मल्लिका की, जिसने आजादी से पहले और आजादी के बाद के भारत को बदलते देखा है, जिसने वक्त और इतिहास बदलते देखा है। नाटक में दिखाया गया है कि कैसे एक पत्रकार बेगम जान और उनके चाहने वाले रसूखदार नामों के बीच रिश्तों की डोर बांधकर एक सनसनीखेज किताब लिखना चाहता है। इसी चाह में वह बेगमजान के यहां किरायेदार बनकर आता है और दुनिया से छुपी बैठी बेगम जान को अपनी बातों से प्रभावित करके उन्हें बीते दिनों के किस्से सुनाने को मना लेता है। वहीं बेगम जान पत्रकार संजय पांडे को अपनी नवासी जरीना को सहारा देने वाले के रूप में देखती है और इसलिए अपने पुराने किस्से कहने को राजी होती है। लखनवी सेट से सजे मंच पर उर्दू भाषा की इस कृति में जब बेगम जान देश की निरंकुश राजनीति पर व्यंग्य कसती हुई चीखती हैं तो बरसों से सोए समाज की रगों को हिलाकर रख देती हैं। जब वे हास्य की चुटकियां लेती हैं तो दर्शकों की मुस्कान फूटे बिना नहीं रहती और जब वे व्यंग्य की तलवार चलाती हैं तो बात सीधे दिल में जाकर लगती है। वे संस्कृति की विडंबना पर विलाप करती हैं तो रंगशाला में मौजूद लोगों की सोई चेतना को जागृत कर देती हैं। जब वे संवादों के उतार-चढ़ाव को अपने चेहरे पर साकार करती हैं तो भावनाओं का समंदर हिलोरें ले उठता है।
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जावेद सिद्दकी के लिखे इस नाटक की जान इसके संवाद हैं। नाटक में कलाकारों की हालत पर चिंता जताई गई है और पश्चिमी संस्कृति के पीछे भागकर भारतीय संस्कृति और तहजीब को भूलते युवाओं पर कटाक्ष भी किया गया है। हिसार रंग मंडल के संस्थापक व वरिष्ठ रंगकर्मी अनूप गोयल मीचू ने सभी का धन्यवाद किया। बेगम जान की भूमिका नादिरा जाहिर बब्बर ने, उनकी पोती जरीना की भूमिका जूही बब्बर सोनी और पत्रकार संजय पांडे की भूमिका अनूप सोनी ने निभाई। नाटक में संगीत निर्देशन सुनील सिन्हा का, सेट व्यवस्था छैल प्रेश, सेट डिजाइन लखनऊ से मधुसूदन का, वेषभूषा जूही बब्बर सोनी, प्रकाश व्यवस्था अकबर खान, म्यूजिक आपरेशन संतोष तिवारी, वेशभूषा सहायक नेहा शेख व मिथिलेश मेहर, साजोसामान मानव पांडे, मेकअप संजय के मोहंती, बैक स्टेज देवेश, शहनवाज, विपुल व रोहन, स्टेज मैनेजर जूही बब्बर सोनी, प्रोडक्शन हनीफ पटनी और प्रस्तुति एकजुट थियेटर ग्रुप की रही। मंच का संचालन कीर्ति गोयल ने किया।