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आपके रौंगटे खड़े कर देगी इस चैंपियन की कहानी

Sun, 25 Aug 2013 12:28 AM IST
पानीपत/हरेंद्र रापरिया
पानीपत/हरेंद्र रापरिया Updated Sun, 25 Aug 2013 12:28 AM IST
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haryana famous athelete narendra

बचपन में पैर में गहरी चोट, फिर सड़क हादसे में माता-पिता की मौत और उसके बाद कैरियर उठान पर आया तो कमर में लगे झटके ने इस चैंपियन को अंदर तक हिलाकर रख दिया, लेकिन वह गोल्ड पर गोल्ड हासिल करता गया।

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आज उनकी गिनती भारत के नामी पैरा-एथलीटों में होती है। उन्हें विश्वास है कि रिले रेस की तरह एक दिन जैवलीन थ्रो में भी देश को पैरा विश्व चैंपियनशिप का गोल्ड लाकर देंगे।
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हरियाणा के पानीपत जिले के गांव पलड़ी में जन्में नरेंद्र की बचपन से ही एक नामी खिलाड़ी बनने की इच्छा थी, मगर छोटी ही उम्र में उनके पैर में गहरी चोट लग गई और स्थायी तौर पर इस पैर में कमी आ गई।
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2005 में एक सड़क हादसे में उनके माता-पिता की की मौत हो गई। इस हादसे ने उन्हें अंदर तक हिलाकर रख दिया, मगर वे मजबूत इच्छा शक्ति के बूते जल्द ही इस सदमे से उबर आए। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सोनीपत के सुभाष स्टेडियम में जाकर कुश्ती के दांव पेंच सीखना शुरू कर दिया।

उनके जुझारूपन को देखते हुए कोच प्रकाश दहिया ने उन्हें कुश्ती को छोड़कर पैरा गेम्स की श्रेणी में एंट्री करने की सलाह दी। कोच की सलाह पर नरेंद्र ने सीआरए कॉलेज सोनीपत के खेल मैदान पर कोच कंवर सिंह गुलिया की देखरेख में 2008 में पैरा श्रेणी में रेस का अभ्यास शुरू किया।

जल्द ही उनकी मेहनत रंग लाई और वे राष्ट्रीय टीम के लिए चुन लिए गए। 2010 में उन्होंने पैरा विश्व चैंपियनशिप में 100 गुना चार रिले रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने साथियों के साथ शानदार प्रदर्शन किया और देश की झोली में गोल्ड मेडल डाल दिया। उनकी उपलब्धि के बाद उनका नाम सुर्खियों में आ गया।

एक बार फिर किस्मत ने दिया झटका
चीन के ग्वांझू में 2010 को आयोजित पैरा एशियन गेम्स में उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया, मगर वहां पर वार्मअप के दौरान एक बार फिर किस्मत ने उसे झटका दिया और उनकी कमर में चोट आ गई। इसकी वजह से मैदान पर जौहर दिखाने के बजाय बिस्तर पर लेटना पड़ा।

दौड़ को छोड़ जैवलीन थ्रो को अपनाया
करीब छह माह इलाज के बाद दोबारा से मैदान में तो उतर आए लेकिन कमर में चोट की पूरी तरह से रिकवरी नहीं हो पाई। ऐसे में उन्हें अधिक दमखम वाली स्पर्धा दौड़ को भी छोड़ना पड़ा। उन्हाने इस बार पंचकूला के सेक्टर-3 स्थित खेल नर्सरी में कोच नसीम अहमद की देखरेख में जैवलीन थ्रो का अभ्यास शुरू कर दिया।

मैदान पर फिर दिखाया जलवा
कड़ी मेहनत के चलते जल्द ही इस खेल पर अपनी पकड़ बना ली। जनवरी-2012 में कुवैत में आयोजित पैरा एशिया चैंपियनशिप में उन्होंने 52.44 मीटर थ्रो मारकर गोल्ड अपने नाम कर लिया।

एशियन चैंपियन बनने के साथ ही उन्होंने 2012 में लंदन में होने वाले पैरा ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई कर लिया। तीन माह बाद ही अप्रैल में मलेशिया में आयोजित ओपन पैरा इंटरनेशनल में उन्होंने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर देश को गोल्ड दिलाया।

थमा नहीं बदकिस्मती का सिलसिला
लंदन पैरा ओलंपिक में रवाना होने से पूर्व बंगलूरू में कैंप के दौरान सीढ़ियों से फिसने से वह नीचे जा गिरे और हाथ में गंभीर चोट आ गई। इसकी वजह से उन्हें करीब डेढ़ माह तक खेल से दूर रहना पड़ा।


बिना अभ्यास किए लंदन रवाना हो गए जहां कडे़ मुकाबले में उन्हें छठे स्थान पर संतोष करना पड़ा।

हाल ही में 18 से 27 जुलाई तक फ्रांस में आयोजित पैरा विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया। मगर ऐन मौके पर उसके पेट में तकलीफ हो गई।

फिर भी मैदान में उतरकर दमखम दिखाया और मामूली अंतर से कांस्य पदक से चूक गए। उन्हें इस प्रतियोगिता में चौथा स्थान मिला।

एक बार फिर नरेंद्र मैदान से दूर रहकर पेट का इलाज करा रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि वह जल्द ही मैदान पर लौटेगा और 2014 में ग्लैस्को राष्ट्रमंडल खेल तथा 2014 के पैरा एशियन गेम्स में देश के लिए गोल्ड जीतेगा।

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