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Fatehabad News: पराली प्रबंधन बना मुनाफे का सौदा, कृषि यंत्रों से आत्मनिर्भर बन रहे किसान

Sat, 13 Dec 2025 11:36 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद Updated Sat, 13 Dec 2025 11:36 PM IST
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Stubble management has become a profitable deal, farmers are becoming self-reliant with agricultural equipment
फतेहाबाद के खेतों में  पराली की गांठें बनाता बेलर मशीनसंचालक। फाइल फोटो
फतेहाबाद। जिले के किसानों ने पराली जलाने की प्रथा छोड़कर इसे आय का नया स्रोत बना लिया है। कृषि विभाग की पहल और 50 फीसदी अनुदान पर उपलब्ध कराए गए आधुनिक कृषि यंत्रों की मदद से जिले में 126 प्रगतिशील किसानों को बेलर और सुपर सीडर मशीनें प्रदान की गई हैं।
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बेलर मशीन धान के अवशेषों को गांठों में बदलकर रोल बनाती हैं। इन रोल्स को उद्योगों, बिजली संयंत्रों, कागज मिलों और गोशालाओं में चारे के रूप में बेचा जा रहा है। इससे किसानों को आय का नया स्रोत मिला और पराली जलाने के मामलों में कमी आई। सुपर सीडर मशीन पराली को खेत में मिलाकर गेहूं की बुवाई भी संभव बनाती है।
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यह पराली मिट्टी के लिए जैविक खाद का काम करती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और अगली फसल की पैदावार में सुधार होता है। कई किसान इस मशीन की जुताई सेवा देकर अतिरिक्त शुल्क भी कमा रहे हैं। कृषि विभाग ने बताया कि इन यंत्रों से किसानों को न केवल आर्थिक लाभ हुआ है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिला है।
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इससे जिले के किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं और स्थायी कृषि प्रथाओं को अपनाने में आगे बढ़ रहे हैं। किसानों का कहना है कि आधुनिक यंत्रों की मदद से पराली प्रबंधन आसान और लाभकारी बन गया है, जिससे वे खेतों की साफ-सफाई के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभा पा रहे हैं।

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मैं वर्ष 2016 से बेलर मशीन से पराली की गांठें बना रहा हूं। हर वर्ष 1500 एकड़ के करीब पराली की गांठें बनाकर सरकार का पराली प्रबंधन में सहयोग कर रहा हूं। प्रति एकड़ की गांठ बनाने का किसान से 1000 रुपये लेता हूं और 1350 रुपये सरकार की ओर से मुझे मिलते हैं।

-सूरजभान, बेलर संचालक, हसंगा।

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मेरे पास 10 बेलर मशीन हैं, इनसे में हर वर्ष 3 लाख क्विंटल पराली प्रबंधन करता हूं। पराली प्रबंधन के कृषि यंत्रों से मुझे अच्छा रोजगार भी मिलता है और सरकार की पराली प्रबंधन में भी सहयोग होता है। इससे पर्यावरण संरक्षण में भी सहयोग हो जाता है।

- सतनाम, बेलर संचालक, गांव, चांदपुरा।

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पिछले 11 वर्षों से पराली प्रबंधन कर रहा हूं, मेरे पास 13 सुपर सीडर और 3 बेलर मशीन हैं। इससे में हर वर्ष 5000 एकड़ का पराली प्रबंधन करता हूं। सरकार पराली प्रबंधन के कृषि यंत्रों पर अनुदान समय पर उपलब्ध करवाए तो इसमें और भी सुधार हो सकता है।

-रमेश, बेलर संचालक।

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वर्ष 2017 से पराली प्रबंधन कर रहा हूं। सरकार की ओर से पराली प्रबंधन करने के लिए 50 फीसदी अनुदान पर कृषि यंत्रों से लोगों को रोजगार मिला है। हर वर्ष 950 एकड़ में पराली प्रबंधन करता हूं। इससे अच्छा रोजगार मिला है और पराली प्रबंधन भी हो रहा है।


-मेजर सिंह, बेलर संचालक, गांव ढाणी मसीतावाली।



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किसानों को आत्मनिर्भर बनाना और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना था। अनुदानित कृषि यंत्रों के बल पर किसान अब स्वयं के खेतों के साथ-साथ दूसरे किसानों के खेतों में भी पराली प्रबंधन की सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। जिससे एक कस्टम हायरिंग मॉडल तैयार हो गया है। किसानों ने भी इन कृषि यंत्रों को अपनाने में रुचि दिखाई है।

-डॉ. पवन बिश्नोई, सहायक कृषि अभियंता, फतेहाबाद।
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