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महंत सच्चानाथ ने किया देहत्याग, अंतिम दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु
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पालकी में महंत सच्चनाथ की पार्थिव देह को स्माधिस्थल तक ले जाते श्रद्धालु।
- फोटो : CharkhiDadri
बाला वाला मंदिर के पिछले पचास वर्षों से महंत सच्चानाथ (79) ने रविवार सुबह रोहतक पीजीआई में देह त्याग दी। वो पिछले चार दिनों से अस्वस्थ थे और रोहतक पीजीआई में उनका इलाज चल रहा था। तीन दिनों से वेटिलेंटर पर थे। सुबह 5:00 बजे उनका पार्थिव शरीर मंदिर पहुंचा। उनके अंतिम दर्शन को भक्तजनों का तांता लग गया। मंदिर परिसर में ही उनको समाधि दी गई।
महज 13 वर्ष की उम्र में नाथ संप्रदाय से जुड़ने वाले महंत सच्चानाथ पिछले 50 वर्षों से दादरी के बाला वाले मंदिर के महंत की गद्दी पर आसीन रहे। मूल रूप से राजस्थान के बीकानेर के गांव नापासर के निवासी थे। माता-पिता द्वारा उनको महेश का नाम दिया गया था लेकिन संन्यास गृहण करने के बाद जब वह नाथ संप्रदाय से जुड़े तो गुरू ने उनको सच्चानाथ का नाम दिया। नारायण सेवा के साथ साथ उन्होंने गो सेवा और मानव सेवा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। मंदिर परिसर में उन्हाेंने नेत्र चिकित्सालय की स्थापना कराई। उनके प्रयासों से 10,000 लोगों की आंखों का ऑपरेशन किया गया।
महंत सच्चानाथ का जन्म 1942 में हुआ था। वो आठ भाई-बहनों में पांचवें नंबर के थे। उनके पिता का नाम काशीराम जबकि मांग का नाम सूरज देवी था। युवा अवस्था में ही वो कटड़ा स्थित ज्वाला देवी मंदिर में पुजारी बन गए। 1971 में उन्होंने दादरी के बाला वाला मंदिर की गद्दी संभाल ली थी।
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महंत सच्चानाथ ने बाला वाला मंदिर में वर्ष 1994 में औषधालय बनवाया था। पिछले 27 सालों से औषधालय चल रहा है और अब तक 20 लाख से ज्यादा मरीज इसका लाभ उठा चुके हैं। 2004 में महंत ने गोवंश के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए गोशाला बनवाई। इस गोशाला में 300 से अधिक गायें हैं। वर्ष 2011 में उन्होंने बाला वाला मंदिर में नेत्र औषधालय की स्थापना करवाई। उन्होंने जिले में अलग-अलग जगहों पर 700 नेत्र जांच शिविर लगवाए। जिनमें चयनित दस हजार लोगों का निशुल्क आंखों का ऑपरेशन करवाया गया। इसके अलावा उनके मार्गदर्शन में अलग-अलग सार्वजनिक स्थानों में दस से अधिक प्याऊ भी बनवाई।
इन संतों ने दी अंतिम विदाई
महंत सच्चानाथ की अंतिम यात्रा में कपूरी धाम से महंत राजूनाथ, डुडीवाला धाम से महंत बूंदीनाथ, नंगला धाम से महंत घीसूनाथ और चमननाथ, आसलवास धाम से महंत बुधनाथ, खोरड़ा धाम से महंत प्रभातनाथ, पिलाना धाम से महंत देवेंद्रनाथ, डोहका धाम से महंत खटकनाथ समेत दूर-दराज से आए साधु-संत शामिल हुए।
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महज 13 वर्ष की उम्र में नाथ संप्रदाय से जुड़ने वाले महंत सच्चानाथ पिछले 50 वर्षों से दादरी के बाला वाले मंदिर के महंत की गद्दी पर आसीन रहे। मूल रूप से राजस्थान के बीकानेर के गांव नापासर के निवासी थे। माता-पिता द्वारा उनको महेश का नाम दिया गया था लेकिन संन्यास गृहण करने के बाद जब वह नाथ संप्रदाय से जुड़े तो गुरू ने उनको सच्चानाथ का नाम दिया। नारायण सेवा के साथ साथ उन्होंने गो सेवा और मानव सेवा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। मंदिर परिसर में उन्हाेंने नेत्र चिकित्सालय की स्थापना कराई। उनके प्रयासों से 10,000 लोगों की आंखों का ऑपरेशन किया गया।
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महंत सच्चानाथ का जन्म 1942 में हुआ था। वो आठ भाई-बहनों में पांचवें नंबर के थे। उनके पिता का नाम काशीराम जबकि मांग का नाम सूरज देवी था। युवा अवस्था में ही वो कटड़ा स्थित ज्वाला देवी मंदिर में पुजारी बन गए। 1971 में उन्होंने दादरी के बाला वाला मंदिर की गद्दी संभाल ली थी।
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महंत सच्चानाथ ने बाला वाला मंदिर में वर्ष 1994 में औषधालय बनवाया था। पिछले 27 सालों से औषधालय चल रहा है और अब तक 20 लाख से ज्यादा मरीज इसका लाभ उठा चुके हैं। 2004 में महंत ने गोवंश के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए गोशाला बनवाई। इस गोशाला में 300 से अधिक गायें हैं। वर्ष 2011 में उन्होंने बाला वाला मंदिर में नेत्र औषधालय की स्थापना करवाई। उन्होंने जिले में अलग-अलग जगहों पर 700 नेत्र जांच शिविर लगवाए। जिनमें चयनित दस हजार लोगों का निशुल्क आंखों का ऑपरेशन करवाया गया। इसके अलावा उनके मार्गदर्शन में अलग-अलग सार्वजनिक स्थानों में दस से अधिक प्याऊ भी बनवाई।
इन संतों ने दी अंतिम विदाई
महंत सच्चानाथ की अंतिम यात्रा में कपूरी धाम से महंत राजूनाथ, डुडीवाला धाम से महंत बूंदीनाथ, नंगला धाम से महंत घीसूनाथ और चमननाथ, आसलवास धाम से महंत बुधनाथ, खोरड़ा धाम से महंत प्रभातनाथ, पिलाना धाम से महंत देवेंद्रनाथ, डोहका धाम से महंत खटकनाथ समेत दूर-दराज से आए साधु-संत शामिल हुए।

पार्थिव देह के पास बैठे साधु-संत।- फोटो : CharkhiDadri

महंत सच्चानाथ। फाइल फोटो- फोटो : CharkhiDadri