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उच्च पद का करंट चार्ज सौंपने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए : हाईकोर्ट
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-केवल सीनियर और बेदाग रिकाॅर्ड वाले कर्मचारी को ही सौंपें जिम्मेदारी
-हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए दी स्पष्ट हिदायत
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि उच्च पद का करंट चार्ज सौंपने की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि इस प्रकार का कार्यभार सीनियर मोस्ट और बेदाग सेवा रिकॉर्ड वाले कर्मचारी को ही सौंपा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें नौ जूनियर इंजीनियरों ने अपने से वापस लिए गए सब डिविजनल इंजीनियर के करंट चार्ज के आदेश को चुनौती दी थी। ये चार्ज उन्हें वर्ष 2012 से 2018 के बीच सौंपे गए थे लेकिन बोर्ड ने 16 जून 2021 के आदेश के जरिये यह कार्यभार वापस ले लिया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि उनके वेतनमान पहले से ही सब डिविजनल इंजीनियर के बराबर है इसलिए वित्तीय बोझ का तर्क निराधार है। उन्होंने आदेश को मनमाना करार दिया था। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सेवा कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी कर्मचारी को उच्च पद के करंट चार्ज पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। इसलिए बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (जैसे सुनवाई का मौका देना) अपनाए भी यह कार्यभार वापस लिया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश शील नागू ने कहा कि अगर कोई अधिकार है ही नहीं, तो उसका हनन भी नहीं हो सकता। ऐसे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि बोर्ड जैसी संस्थाओं को उच्च पदों पर करंट चार्ज सौंपते समय तय प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
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-हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए दी स्पष्ट हिदायत
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि उच्च पद का करंट चार्ज सौंपने की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि इस प्रकार का कार्यभार सीनियर मोस्ट और बेदाग सेवा रिकॉर्ड वाले कर्मचारी को ही सौंपा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें नौ जूनियर इंजीनियरों ने अपने से वापस लिए गए सब डिविजनल इंजीनियर के करंट चार्ज के आदेश को चुनौती दी थी। ये चार्ज उन्हें वर्ष 2012 से 2018 के बीच सौंपे गए थे लेकिन बोर्ड ने 16 जून 2021 के आदेश के जरिये यह कार्यभार वापस ले लिया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि उनके वेतनमान पहले से ही सब डिविजनल इंजीनियर के बराबर है इसलिए वित्तीय बोझ का तर्क निराधार है। उन्होंने आदेश को मनमाना करार दिया था। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सेवा कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी कर्मचारी को उच्च पद के करंट चार्ज पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। इसलिए बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (जैसे सुनवाई का मौका देना) अपनाए भी यह कार्यभार वापस लिया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश शील नागू ने कहा कि अगर कोई अधिकार है ही नहीं, तो उसका हनन भी नहीं हो सकता। ऐसे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि बोर्ड जैसी संस्थाओं को उच्च पदों पर करंट चार्ज सौंपते समय तय प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
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