{"_id":"6953dd1e5e1d635a34022a5c","slug":"a-child-cannot-be-considered-a-non-earning-member-of-the-family-the-income-for-compensation-should-be-treated-equivalent-to-that-of-a-skilled-worker-high-court-court-news-haryana-news-chandigarh-haryana-news-c-16-1-pkl1060-910647-2025-12-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"Highcourt: बच्चे को परिवार का न कमाने वाला सदस्य नहीं मान सकते, मुआवजे के लिए कुशल श्रमिक के बराबर आय मानें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Highcourt: बच्चे को परिवार का न कमाने वाला सदस्य नहीं मान सकते, मुआवजे के लिए कुशल श्रमिक के बराबर आय मानें
Tue, 30 Dec 2025 07:39 PM IST
चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो
Updated Tue, 30 Dec 2025 07:39 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मामलों में साक्ष्य का मानक संतुलित संभावना होता है, न कि आपराधिक मामलों जैसा कठोर। केवल एफआईआर में देरी या आपराधिक मुकदमे में बरी होना, मुआवज़ा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।
विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 11 वर्षीय बलविंदर कुमार की सड़क हादसे में मौत के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बच्चे की मौत के मुआवजे की गणना के लिए उसे न कमाने वाला नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी आय कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन जितनी मान मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की मृत्यु से माता-पिता को जो अपार मानसिक पीड़ा होती है, उसकी भरपाई केवल आर्थिक गणना से नहीं की जा सकती, लेकिन कानून के तहत न्याय दिलाना आवश्यक है।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश को पलटते हुए अदालत ने पीड़ित परिवार को 7,94,492 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और तकनीकी आधारों पर दावा खारिज कर दिया, जो कानूनन उचित नहीं था।
विज्ञापन
हादसा 22 अक्तूबर 2004 को हुआ था, जब 11 वर्षीय बलविंदर कुमार अपनी मां के साथ खेतों की ओर जा रहा था। इसी दौरान एक तेज रफ्तार महिंद्रा जीप ने उसे कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वाहन चालक पर लापरवाही का आरोप लगाया गया था।
परिवार ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की थी, लेकिन वर्ष 2008 में ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि दुर्घटना में लापरवाही साबित नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मामलों में साक्ष्य का मानक संतुलित संभावना होता है, न कि आपराधिक मामलों जैसा कठोर। केवल एफआईआर में देरी या आपराधिक मुकदमे में बरी होना, मुआवज़ा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मां और प्रत्यक्षदर्शी की गवाही विश्वसनीय है।
अदालत ने कहा कि मृतक बच्चा होने के बावजूद उसकी भविष्य की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस आधार पर न्यायालय ने मुआवजे की गणना के लिए मृतक की मासिक अनुमानित आय 4,375 रुपये मानते हुए भविष्य की संभावनाएं 1,750 रुपये जोड़ी।
कोर्ट ने कुल वार्षिक आय के आधार पर अंतिम कुल मुआवजा 7,94,492 रुपये तय किया और इस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का बीमा कंपनी को आदेश दिया। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह दो महीने के भीतर पूरी राशि ब्याज सहित ट्रिब्यूनल में जमा करे, जिसे बाद में पीड़ित परिवार के खातों में भेजा जाएगा।
विज्ञापन
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी आय कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन जितनी मान मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की मृत्यु से माता-पिता को जो अपार मानसिक पीड़ा होती है, उसकी भरपाई केवल आर्थिक गणना से नहीं की जा सकती, लेकिन कानून के तहत न्याय दिलाना आवश्यक है।
विज्ञापन
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के आदेश को पलटते हुए अदालत ने पीड़ित परिवार को 7,94,492 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और तकनीकी आधारों पर दावा खारिज कर दिया, जो कानूनन उचित नहीं था।
विज्ञापन
हादसा 22 अक्तूबर 2004 को हुआ था, जब 11 वर्षीय बलविंदर कुमार अपनी मां के साथ खेतों की ओर जा रहा था। इसी दौरान एक तेज रफ्तार महिंद्रा जीप ने उसे कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वाहन चालक पर लापरवाही का आरोप लगाया गया था।
परिवार ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की थी, लेकिन वर्ष 2008 में ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि दुर्घटना में लापरवाही साबित नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मामलों में साक्ष्य का मानक संतुलित संभावना होता है, न कि आपराधिक मामलों जैसा कठोर। केवल एफआईआर में देरी या आपराधिक मुकदमे में बरी होना, मुआवज़ा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मां और प्रत्यक्षदर्शी की गवाही विश्वसनीय है।
अदालत ने कहा कि मृतक बच्चा होने के बावजूद उसकी भविष्य की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस आधार पर न्यायालय ने मुआवजे की गणना के लिए मृतक की मासिक अनुमानित आय 4,375 रुपये मानते हुए भविष्य की संभावनाएं 1,750 रुपये जोड़ी।
कोर्ट ने कुल वार्षिक आय के आधार पर अंतिम कुल मुआवजा 7,94,492 रुपये तय किया और इस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का बीमा कंपनी को आदेश दिया। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह दो महीने के भीतर पूरी राशि ब्याज सहित ट्रिब्यूनल में जमा करे, जिसे बाद में पीड़ित परिवार के खातों में भेजा जाएगा।