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Ambala News: पारिवारिक जमीन विवाद में दो दशक बाद आया फैसला, अपील खारिज
Fri, 06 Feb 2026 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
Updated Fri, 06 Feb 2026 12:57 AM IST
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माई सिटी रिपोर्टर,
अंबाला सिटी। अतिरिक्त जिला जज हितेश गर्ग की अदालत ने गांव पतरहेड़ी में जमीन के मालिकाना हक और कब्जे के संबंध में चल रहे एक पुराने विवाद में फैसला सुनाया है। अदालत ने अपीलकर्ता संत राम (अब मृतक) के कानूनी वारिसों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। यह मामला करीब दो दशक पुराने कानूनी विवाद और नेशनल हाईवे के लिए अधिग्रहित जमीन से जुड़ा था।
वादी संत राम ने निचली अदालत के 2018 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके दावे को खारिज कर दिया गया था। संत राम का तर्क था कि गांव पतरहेड़ी स्थित उनकी पैतृक जमीन का कभी औपचारिक बंटवारा नहीं हुआ, इसलिए वह सह-मालिक के रूप में पूरी जमीन पर काबिज थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके भतीजे गुरदयाल चंद ने प्रतिवादी अरुण कुमार के साथ मिलकर जाली रेंट नोट और लीज डीड तैयार की ताकि जमीन पर जबरन कब्जा किया जा सके।
दूसरी ओर प्रतिवादी अरुण कुमार (अब मृतक) के वारिसों ने दलील दी कि गुरदयाल चंद ने अपने हिस्से की जमीन (17 कनाल 14 मरला) उन्हें लीज पर दी थी और रेंट नोट के आधार पर उन्हें कब्जा भी सौंपा गया था। यह भी बताया गया कि इस जमीन का एक हिस्सा नेशनल हाईवे अथॉरिटी (एनएचएआई) द्वारा एनएच-73 के चौड़ीकरण के लिए पहले ही अधिग्रहित किया जा चुका है।
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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि इस मामले में पहले भी कई मुकदमे लड़े जा चुके हैं। अदालत ने माना कि लीज डीड और कब्जे के दस्तावेजों में कोई अवैधता नहीं पाई गई। न्यायाधीश ने अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और आदेश दिया कि दोनों पक्ष अपना-अपना अदालती खर्च खुद वहन करेंगे।
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अंबाला सिटी। अतिरिक्त जिला जज हितेश गर्ग की अदालत ने गांव पतरहेड़ी में जमीन के मालिकाना हक और कब्जे के संबंध में चल रहे एक पुराने विवाद में फैसला सुनाया है। अदालत ने अपीलकर्ता संत राम (अब मृतक) के कानूनी वारिसों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। यह मामला करीब दो दशक पुराने कानूनी विवाद और नेशनल हाईवे के लिए अधिग्रहित जमीन से जुड़ा था।
वादी संत राम ने निचली अदालत के 2018 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके दावे को खारिज कर दिया गया था। संत राम का तर्क था कि गांव पतरहेड़ी स्थित उनकी पैतृक जमीन का कभी औपचारिक बंटवारा नहीं हुआ, इसलिए वह सह-मालिक के रूप में पूरी जमीन पर काबिज थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके भतीजे गुरदयाल चंद ने प्रतिवादी अरुण कुमार के साथ मिलकर जाली रेंट नोट और लीज डीड तैयार की ताकि जमीन पर जबरन कब्जा किया जा सके।
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दूसरी ओर प्रतिवादी अरुण कुमार (अब मृतक) के वारिसों ने दलील दी कि गुरदयाल चंद ने अपने हिस्से की जमीन (17 कनाल 14 मरला) उन्हें लीज पर दी थी और रेंट नोट के आधार पर उन्हें कब्जा भी सौंपा गया था। यह भी बताया गया कि इस जमीन का एक हिस्सा नेशनल हाईवे अथॉरिटी (एनएचएआई) द्वारा एनएच-73 के चौड़ीकरण के लिए पहले ही अधिग्रहित किया जा चुका है।
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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि इस मामले में पहले भी कई मुकदमे लड़े जा चुके हैं। अदालत ने माना कि लीज डीड और कब्जे के दस्तावेजों में कोई अवैधता नहीं पाई गई। न्यायाधीश ने अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और आदेश दिया कि दोनों पक्ष अपना-अपना अदालती खर्च खुद वहन करेंगे।