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जीव के दुख का कारण उसका अपना स्वभाव : प्रेम सागर पथिक

Mon, 10 Nov 2025 01:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला Updated Mon, 10 Nov 2025 01:32 AM IST
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The cause of a living being's suffering is his own nature: Prem Sagar Pathik
छावनी के बोह में  आयोजित श्रीमद भावत कथा के दौरान मौजूद श्रद्धालु। स्वयं

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अंबाला। छावनी के बोह में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने कथा का रसपान किया। इस दौरान अनिल मेहता एवं किरण मेहता ने ज्योति प्रज्वलन कर कथा का शुभारंभ किया। इसके बाद कथा व्यास प्रेम सागर पथिक ने कहा कि जीव के दुख का कारण उसका अपना स्वभाव है। स्वभाव को सुधारना बड़ा जटिल है। परमात्मा के ध्यान से और जप करने से स्वभाव सुधरता है। जीव का उद्धार नाम जप और नाम स्मरण से होता है। भगवान ने कुछ लोगों का उद्धार किया, लेकिन उनके नाम ने असंख्य लोगों को भवसागर से पार कर दिया। जीव माया के जाल में फंसे अजामिल का भी नाम स्मरण से ही बेड़ा पार हुआ है।

उन्होंने कहा कि अपनी संतान को संस्कारवान बनाना हमारा परम कर्तव्य है। गर्भ धारिणी स्त्री को प्रभु-भजन करते रहना चाहिए। कयाधु ने सत्संग किया और प्रभु का गुणगान सुना तभी तो उसकी कोख से भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ और अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उच्चार कर दिया। ईश्वर सर्वत्र है, जगत कण-कण में समाया हुआ है पर कोई सच्चा गुरु ही उनके दर्शन करवा सकता है। आज गुरु-शिष्य परंपरा दिखावा मात्र रह गई है। गुरुओं में शिष्य संख्या बढ़ाने की होड़ लगी हुई है, तभी गुरुओं की बात का असर कम हो रहा है। गुरु भगवान का रूप है और सदा पूजनीय है। गुरु और शिष्य दोनों को मर्यादित होना चाहिए। जीव को जो भी मिला है वह उसी भगवान का दिया हुआ है। भोजन को अगर प्रभु को समर्पित करोगे तो वही भोजन प्रभु का प्रसाद बन जाएगा, इससे मन सात्विक होगा और मन में प्रभु भक्ति का बीज अंकुरित होगा।
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छावनी के बोह में  आयोजित श्रीमद भावत कथा के दौरान मौजूद श्रद्धालु। स्वयं

छावनी के बोह में  आयोजित श्रीमद भावत कथा के दौरान मौजूद श्रद्धालु। स्वयं

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