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Ambala News: भगवान अपने भक्तों के संकट हरने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं - पं. भगवती प्रसाद पुरोहित
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अंबाला सिटी। जब भी किसी जीव पर संकट आया तो भगवान श्रीराम ने विभिन्न प्रकार से जीवों सुरक्षा की है। चाहे वह निराकार रूप में हो या साकार रूप में रही हो, भगवान अपने भक्तों के संकट हरने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। भले ही वह इंसान क्यों न हों, भगवान का कार्य करने का ढ़ग बहुत ही निराला होता है। भगवान दुख संकट हरते समय वह अपना नाम होने नहीं देते और कोई न कोई माध्यम बना ही देते हैं।
उपरोक्त शब्द अंबाला सिटी के सेक्टर-7 स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रही श्रीराम चरित मानस रामायण पाठ की कथा में कथा के दौरान व्यास पं. भगवती प्रसाद पुरोहित ने उपस्थित भक्तों को कहे। कथा से पूर्व प्रतिदिन की तरह समाजसेवी सदस्य धर्मवीर गुप्ता ने परिवार सहित शामिल होकर पूजन संपन्न करवाए, जहां पं. धर्मेद्र गौड व पं. त्रिलोचन शर्मा ने विधिवत पूजन कार्य संपन्न करवाए और कथा का शुभारंभ करवाया।
इस दौरान कथा व्यास ने भगवान श्रीराम की कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब भी ऋषि मुनियों पर किसी प्रकार का संकट आया तो भगवान प्रभु श्रीराम ने संरक्षक बनकर उनकी सुरक्षा करने का संकल्प लिया है। विश्वामित्र ने संपूर्ण उत्तर भारत को दुष्टजनों से श्रीराम के बल पर मुक्त करा लिया था और सभी ऋषि मुनि के यज्ञ सुचारू रूप से होने लगे तो, विश्वामित्र जी श्रीराम को जनकपुर की ओर ले गए।
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जहां सीता स्वयंवर चल रहा था। स्वयंवर में जब कोई राजा धनुष नहीं तोड़ पा रहा था, तो प्रभु श्रीराम ने विश्वामित्र की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर धनुष तोड़ दिया था, जहां बड़े-बड़े योद्धा विफल हो गए थे, वहां भगवान श्रीराम ने धनुष तोड़कर तीनों लोकों में सूर्यवंशी पताका फहराया। चारों ओर देवी-देवाताओं सहित भगवान श्रीराम की जय जयकार हुई। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने आरती कर प्रसाद ग्रहण किया।
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उपरोक्त शब्द अंबाला सिटी के सेक्टर-7 स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रही श्रीराम चरित मानस रामायण पाठ की कथा में कथा के दौरान व्यास पं. भगवती प्रसाद पुरोहित ने उपस्थित भक्तों को कहे। कथा से पूर्व प्रतिदिन की तरह समाजसेवी सदस्य धर्मवीर गुप्ता ने परिवार सहित शामिल होकर पूजन संपन्न करवाए, जहां पं. धर्मेद्र गौड व पं. त्रिलोचन शर्मा ने विधिवत पूजन कार्य संपन्न करवाए और कथा का शुभारंभ करवाया।
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इस दौरान कथा व्यास ने भगवान श्रीराम की कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब भी ऋषि मुनियों पर किसी प्रकार का संकट आया तो भगवान प्रभु श्रीराम ने संरक्षक बनकर उनकी सुरक्षा करने का संकल्प लिया है। विश्वामित्र ने संपूर्ण उत्तर भारत को दुष्टजनों से श्रीराम के बल पर मुक्त करा लिया था और सभी ऋषि मुनि के यज्ञ सुचारू रूप से होने लगे तो, विश्वामित्र जी श्रीराम को जनकपुर की ओर ले गए।
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जहां सीता स्वयंवर चल रहा था। स्वयंवर में जब कोई राजा धनुष नहीं तोड़ पा रहा था, तो प्रभु श्रीराम ने विश्वामित्र की आज्ञा और आशीर्वाद लेकर धनुष तोड़ दिया था, जहां बड़े-बड़े योद्धा विफल हो गए थे, वहां भगवान श्रीराम ने धनुष तोड़कर तीनों लोकों में सूर्यवंशी पताका फहराया। चारों ओर देवी-देवाताओं सहित भगवान श्रीराम की जय जयकार हुई। कथा के समापन पर सभी भक्तों ने आरती कर प्रसाद ग्रहण किया।