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यूपी: गोरखपुर में मिला दो हजार वर्ष पुराना कुषाणकालीन स्तूप और 13वीं शताब्दी की मूर्तियां, पुरातत्व विभाग की टीम ने किया सर्वे
Thu, 26 Aug 2021 01:13 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Thu, 26 Aug 2021 01:13 PM IST
सार
ब्रह्मपुर ब्लॉक के गोरसैरा गांव पहुंची पुरातत्व विभाग की टीम ने सर्वे किया। इस दौरान पुरातत्व अधिकारी नरसिंह त्यागी ने बताया कि स्तूप से प्राप्त हुई ईंटों के अवशेषों के आधार पर यह टीला कुषाण कालीन है।
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मंदिर में मिले अवशेष।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में पुरातत्व विभाग के सर्वे में चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के ब्रह्मपुर ब्लॉक के गोरसैरा गांव में दो हजार साल पुराना स्तूप और 13वीं शताब्दी की मूर्तियां मिली हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी नरसिंह त्यागी और उनकी टीम ने गोरसैरा, उपधौलिया, राजधानी व बसुही गांव में पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के अवशेषों का सर्वे किया।
सर्वे के पश्चात क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी ने बताया कि गोरसैरा स्थित स्तूप से प्राप्त हुई ईंटों के अवशेषों के आधार पर यह टीला कुषाण कालीन है जो लगभग आज से दो हजार वर्ष से अधिक पूर्व का स्तूप है। इसे प्रमाणिक अभिलेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह वही भगवान बुद्ध का प्रसिद्ध स्तूप का शेष है जिसमें बुद्ध की चिता की लकड़ी की राख रखी गई थी। कालांतर में तेरहवीं शताब्दी के आसपास इस स्तूप के ऊपर शिव मंदिर का निर्माण करा दिया गया है। शिव मंदिर के गर्भ गृह में लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित शिवलिंग है, जो लगभग 700 वर्ष प्राचीन है।
नरसिंह त्यागी ने बताया कि इस मंदिर के देव कुलिका में प्राचीन खंडित मूर्तियों का पृष्ठ भाग और स्थानक त्रिभंग मुद्रा में कार्तिकेय की वाहन सहित मूर्ति है। यह मूर्ति भी तेरहवीं शताब्दी ईस्वी सन की है। स्तूप के समीप लगभग 500 मीटर पर एक अन्य स्तूप बना है जो पहले के स्तूप के अपेक्षाकृत छोटा है।
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इस स्तूप पर भी लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित शिवलिंग को स्थापित किया गया है। यह भी लगभग 13वीं शताब्दी का है। शिवलिंग के पास पक्की हुई ईंटों की दीवार के अवशेष विद्यमान र्हैं। ईंटों के आकार प्रकार के आधार पर यह कुषाण काल का है।
गोर्रा नदी के बाएं किनारे पर खुले आसमान में लाल बलुआ पत्थर पर भी एक शिवलिंग स्थापित है, यह भी तेरहवीं शताब्दी का ही है। उन्होंने बताया कि ब्रह्मपुर क्षेत्र के कुछ गांव पुरातात्विक महत्व से जुड़े हैं। दूसरी तरफ सपा नेता कालीशंकर ने गांवों की पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को दृष्टिगत रखते हुए इसे संरक्षित करने की मांग की है।
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सर्वे के पश्चात क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी ने बताया कि गोरसैरा स्थित स्तूप से प्राप्त हुई ईंटों के अवशेषों के आधार पर यह टीला कुषाण कालीन है जो लगभग आज से दो हजार वर्ष से अधिक पूर्व का स्तूप है। इसे प्रमाणिक अभिलेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह वही भगवान बुद्ध का प्रसिद्ध स्तूप का शेष है जिसमें बुद्ध की चिता की लकड़ी की राख रखी गई थी। कालांतर में तेरहवीं शताब्दी के आसपास इस स्तूप के ऊपर शिव मंदिर का निर्माण करा दिया गया है। शिव मंदिर के गर्भ गृह में लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित शिवलिंग है, जो लगभग 700 वर्ष प्राचीन है।
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नरसिंह त्यागी ने बताया कि इस मंदिर के देव कुलिका में प्राचीन खंडित मूर्तियों का पृष्ठ भाग और स्थानक त्रिभंग मुद्रा में कार्तिकेय की वाहन सहित मूर्ति है। यह मूर्ति भी तेरहवीं शताब्दी ईस्वी सन की है। स्तूप के समीप लगभग 500 मीटर पर एक अन्य स्तूप बना है जो पहले के स्तूप के अपेक्षाकृत छोटा है।
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इस स्तूप पर भी लाल बलुआ पत्थर पर निर्मित शिवलिंग को स्थापित किया गया है। यह भी लगभग 13वीं शताब्दी का है। शिवलिंग के पास पक्की हुई ईंटों की दीवार के अवशेष विद्यमान र्हैं। ईंटों के आकार प्रकार के आधार पर यह कुषाण काल का है।
गोर्रा नदी के बाएं किनारे पर खुले आसमान में लाल बलुआ पत्थर पर भी एक शिवलिंग स्थापित है, यह भी तेरहवीं शताब्दी का ही है। उन्होंने बताया कि ब्रह्मपुर क्षेत्र के कुछ गांव पुरातात्विक महत्व से जुड़े हैं। दूसरी तरफ सपा नेता कालीशंकर ने गांवों की पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को दृष्टिगत रखते हुए इसे संरक्षित करने की मांग की है।