कोरोना की तरह खतरा बढ़ा रहे हैं ये लोग, जानें कितना खतरनाक साबित हो सकता है ये कदम
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कंबाइन मशीन से गेहूं की फसल कटवाने के बाद खेतों में पराली (ठूंठ) जला रहे लोग ठीक वही खतरा बढ़ा रहे हैं, जो इस समय दुनिया में कहर बरपा रहा कोरोना वायरस (कोविड-19) कर रहा है।
पिछले साल अक्तूबर में अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान (आईएफपीआरआई) की ओर से लगाए गए अनुमान के मुताबिक, बीते पांच वर्षों में देश में पराली जलाने से बढ़े प्रदूषण और उससे हुई बीमारियों की वजह से करीब दो लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के चेस्ट विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर अश्वनी मिश्र बताते हैं कि पराली जलाने से बड़े पैमाने पर कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड के अलावा कुछ हद तक सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड रूप में जहरीला धुआं फैलता है।
पराली जलाने पर लग चुका है प्रतिबंध
इससे फेफड़े की कोशिकाओं को क्षति पहुंचती है। आंखों में जलन, खांसी, गले में तकलीफ, फेफड़े में सूजन के साथ ही तीव्र श्वसन संक्रमण का ख़तरा होता है। सांस और दमा के मरीजों के लिए तो यह जहरीला धुआं घातक है। सामान्य लोगों के भी सांस और दमा के मरीज होने का खतरा बढ़ जाता है।
कोरोना संक्रमण भी सेहत पर इसी तरह क्षति पहुंचा रहा है। जिनका फेफड़ा पहले से कमजोर है, या वे पहले से बीमार हैं, उनके लिए यह संक्रमण प्राणघातक साबित हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ओर से पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। कोर्ट और शासन की तरफ से ऐसा करने पर कार्रवाई के लिए कहा जा चुका है।
इसके बावजूद मंडल के लगभग सभी तहसील क्षेत्रों के विभिन्न इलाकों में गेहूं की फसल कटकर खाली पड़े खेतों में आग की लपटें, धुएं का गुबार और राख ही दिख रही है। गोरखपुर के चौरीचौरा, सदर और सहजनवां तहसील क्षेत्रों में फोरलेन हाईवे के किनारे खेतों में सुबह से लेकर शाम तक लोग पराली जलाते दिख जा रहे हैं।
चौरीचौरा के एसडीएम अर्पित गुप्ता कहते हैं कि इधर लॉकडाउन का पालन कराने में प्रशासन व्यस्त है, फिर भी अपने मातहतों, पुलिस को ऐसा करने वालों को चिन्हित करने के निर्देश देंगे। साथ ही प्रधानों से भी लोगों को जागरूक करने के लिए कहा जाएगा।