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पढ़िए गोरखपुर के इस गैंगवार की कहानी, जिसमें ब्राह्मण और ठाकुर लड़े वर्चस्व की जंग

Tue, 20 Oct 2020 02:23 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 20 Oct 2020 02:23 PM IST
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special story of Gorakhpur gangwar between Pandit harishankar tiwari and Virendra shahi
विरेंद्र शाही और पंडित हरिशंकर तिवारी। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

गोरखपुर आज विकास का शहर और मुख्यमंत्री के शहर के रूप में भले ही पहचान बना चुका है मगर इतिहास में इसी गोरखपुर में अपराध की एक नई कहानी लिखी गई थी। बात 1970 के दशक की है जब देश में जेपी का आंदोलन चल रहा था।

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छात्र नेता देश को बदलने के जुनून में सड़कों पर तरह-तरह के आंदोलन में जुटे थे। वहीं गोरखपुर के छात्र अपने वर्चस्व को कायम करने में जुटे थे। उस समय गोरखपुर यूनिवर्सिटी के दो छात्र नेता थे। एक बलवंत सिंह और दूसरे हरिशंकर तिवारी। इन दोनों में हमेशा वर्चस्व को लेकर लड़ाई थी।
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इस बीच बलवंत सिंह को वीरेंद्र प्रताप शाही नाम का एक नया लड़का मिला जो उसकी ही जाति का था। यह वो दौर था जब जाति को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी जाती थी। जिले में ब्राह्मण और ठाकुर दोनों अपना-अपना वर्चस्व कायम रखने में जुटे थे।
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जिले में हालात ऐसे थे कि लोग पेट्रोल भरा के पैसे नहीं देते थे और आंख मिलाकर बात करने पर गोली मार देते थे। ऐसी घटनाएं आम होने लगी थी। फिर क्या लोगों को वर्चस्व के साथ पैसे की अहमियत भी समझ में आने लगी। इस दौर में रेलवे स्क्रैप की ठेकेदारी मिलने लगी थी।

जमकर हुई थी गैंगवार

बताया जाता है कि ठेके के माध्यम से बड़ी आसानी से पैसा कमाया जा सकता था। हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही दोनों ने अपने-अपने गुट को मजबूत करना शुरू कर दिया। इटली के माफियाओं की तर्ज पर गैंग बना लिए गए। दोनों माफियाओं के बीच जारी वर्चस्व की जंग में पूरा शहर हिल गया था।

मंडल के चार जिलों में कहीं न कहीं रोज गैंगवार में निकली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी। आए दिन दोनों तरफ के कुछ लोग मारे जाते थे। कई निर्दोष लोग भी मरते थे। इसी दौरान लखनऊ और गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके युवा विधायक रविंद्र सिंह की भी हत्या हो गई।

कहते हैं कि इसके बाद ठाकुरों के गुट ने वीरेंद्र प्रताप शाही को अपना नेता मान लिया। गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था। सरकारी सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका था। प्रदेश की राजधानी में इन दोनों गुटों ने अपनी-अपनी एक समानांतर सरकार बना ली थी। दरबार लगने लगे। जमीनों के मुद्दे इनके दरबार में आने लगे। लोग कोर्ट जाने से बेहतर इनके दरबार को समझने लगे थे।

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