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पाठकनामा: तुलसीदास ने ठुकरा दिया था अकबर का आमंत्रण, वरिष्ठ साहित्यकार ने साझा किए विचार
Wed, 25 Jan 2023 02:29 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 25 Jan 2023 02:29 PM IST
सार
तुलसीदास या कोई भी महामानव सर्वथा दोषरहित या दोषपूर्ण नहीं हो सकता। तुलसी संत थे, कवि थे, ब्राह्मण थे, समाजसुधारक थे और अपने समय के गुणनायक भी थे। ये वही तुलसीदास थे, जिन्होंने अकबर जैसे सम्राट के आमंत्रण को ठुकरा दिया और उनके शासनकाल में होने वाले अत्याचारों एवं दुर्भिक्षों का निर्ममता के साथ चित्रण किया।
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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास। (प्रतीकात्मक)
- फोटो : सोशल मीडिया।
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विस्तार
महाकवि तुलसीदास विचरित रामचरितमानस की कतिपय पंक्तियों को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिज्ञों की टिप्पणियां इन दिनों चर्चा में हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग इस पर अपनी राय दे रहे हैं। इसी क्रम में वरिष्ठ साहित्यकार वेद प्रकाश पांडेय ने अमर उजाला से अपने विचार साझा किए।
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रामचरितमानस की कुछ पंक्तियों को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ राजनीतिज्ञों की नाराजगी भरी प्रतिक्रियाएं अपनी जगह गलत नहीं हैं। मानस में अनेक ऐसे कथन हैं जो सहृदय मन को अखरते हैं, किंतु मात्र इतने से विश्व के महान साहित्यिक ग्रंथों में स्थान रखने वाला यह ग्रंथ सिरे से खारिज कर देने योग्य नहीं है। उसमें बहुत कुछ ऐसा है जो विश्व मानवता के लिए शिक्षाप्रद, वरेण्य और अनुकरणीय है।
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कई आयोच्य कथनों के बीच अनेक ऐसे कथन भी हैं जो तुलसी की उदारता, महानता और व्यापक दृष्टि के उत्तम उदाहरण हैं। ‘कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ और ‘सियाराम मय सब जग जानी, करउं प्रताप जोरि जुग पानी’। आलोचना करने वाले महानुभावों को इन्हें और इन जैसी अनेक पंक्तियों को दृष्टिपथ में रखना चाहिए।
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नहीं भूलना चाहिए कि तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में उत्पन्न हुए थे। आज की दृष्टि से उन्हें देखना दृष्टिहीनता होगी। वह समय और स्थान भी ध्यान देने योग्य है। तुलसीदास या कोई भी महामानव सर्वथा दोषरहित या दोषपूर्ण नहीं हो सकता। तुलसी संत थे, कवि थे, ब्राह्मण थे, समाजसुधारक थे और अपने समय के गुणनायक भी थे। ये वही तुलसीदास थे, जिन्होंने अकबर जैसे सम्राट के आमंत्रण को ठुकरा दिया और उनके शासनकाल में होने वाले अत्याचारों एवं दुर्भिक्षों का निर्ममता के साथ चित्रण किया।
नाथूराम गोडसे द्वारा, निजी मतभेद के कारण महात्मा गांधी को गोली मार दिए जाने के बावजूद, जैसे गांधीजी विश्वबंधु हैं, राष्ट्रपिता हैं, वैसे ही कतिपय न्यूनताओं के साथ रामचरितमानस भी विश्वमान्य महान साहित्यिक ग्रंथ है। स्वामी प्रसाद मौर्य की बेजा टिप्पणी पर अखिलेश यादव की नाराजगी इसका ताजा और जबर्दस्त उदाहरण है।