{"_id":"61067b6897cc323062525e7f","slug":"municipal-corporation-not-arrange-to-increase-income-in-gorakhpur-even-in-two-decades","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"गोरखपुर: दो दशक में भी आमदनी बढ़ाने का इंतजाम नहीं कर सका नगर निगम, आत्मनिर्भर नहीं होने से सरकार के फंड के लिए मोहताज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गोरखपुर: दो दशक में भी आमदनी बढ़ाने का इंतजाम नहीं कर सका नगर निगम, आत्मनिर्भर नहीं होने से सरकार के फंड के लिए मोहताज
Sun, 01 Aug 2021 04:16 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sun, 01 Aug 2021 04:16 PM IST
सार
अवस्थापना निधि का 40 प्रतिशत से आय के स्रोत विकसित करने का है प्रावधान। अंतिम बार वर्ष 2000 में नगर निगम ने बनाई थी दुकानें।
विज्ञापन
गोरखपुर नगर निगम।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
शासन की ओर से लगातार निर्देश दिया जाता रहा है कि नगर निगम अपनी आय के संसाधनों को बढ़ाकर आत्मनिर्भर बने। इसके लिए अवस्थापना निधि की राशि के 40 प्रतिशत आय के संसाधन विकसित करने का भी प्रावधान है, लेकिन पिछले दो दशक से गोरखपुर नगर निगम अपनी आय के संशाधनों को विकसित करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। स्थिति यह है कि शहर के विकास के लिए नगर निगम को सरकार की ओर टकटकी लगाए रहनी पड़ती है।
शासनादेश के अनुसार अवस्थापना निधि से प्राप्त आय का 60 प्रतिशत कार्य स्थायी प्रकृति और 40 प्रतिशत राशि नगर निगम की आय के नए स्रोतों को विकसित करने का प्रावधान है। लेकिन जिस अवस्थापना निधि से नगर निगम को अपनी आय का स्रोत बढ़ाना था, उस रकम को भी शहर में नाली, खड़ंजा बनाने में खर्च कर दिया गया।
सामान्य तौर पर नगर निगम को अवस्थापना निधि से हरेक साल करीब 17 करोड़ रुपये मिलते रहे हैं। प्रावधान के अनुसार नगर निगम को अवस्थापना निधि में मिले फंड का 40 प्रतिशत आय के संसाधनों को बढ़ाने के लिए खर्च करना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मद में करोड़ों रुपये मिलने के बावजूद निगम की ओर से पिछले करीब दो दशकों से आय के नए स्रोत बनाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
शासनादेश के अनुसार अवस्थापना निधि से प्राप्त आय का 60 प्रतिशत कार्य स्थायी प्रकृति और 40 प्रतिशत राशि नगर निगम की आय के नए स्रोतों को विकसित करने का प्रावधान है। लेकिन जिस अवस्थापना निधि से नगर निगम को अपनी आय का स्रोत बढ़ाना था, उस रकम को भी शहर में नाली, खड़ंजा बनाने में खर्च कर दिया गया।
विज्ञापन
सामान्य तौर पर नगर निगम को अवस्थापना निधि से हरेक साल करीब 17 करोड़ रुपये मिलते रहे हैं। प्रावधान के अनुसार नगर निगम को अवस्थापना निधि में मिले फंड का 40 प्रतिशत आय के संसाधनों को बढ़ाने के लिए खर्च करना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मद में करोड़ों रुपये मिलने के बावजूद निगम की ओर से पिछले करीब दो दशकों से आय के नए स्रोत बनाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
विज्ञापन
अंतिम बार वर्ष 2000 में नगर निगम ने बनवाई थी दुकानें
शहर में नगर निगम की करीब 2100 दुकानें हैं। इन दुकानों को बनाने की शुरुआत 1983-84 से शुरू हुई थी। अंतिम बार 2000 में इन दुकानों का निर्माण कराया गया। सबसे पुरानी दुकानें गोलघर में 1969-70 में बनी हैं। इन दुकानों से नगर निगम को हरेक साल करीब 2.70 करोड़ रुपये की आय होती है।
1998 में बनाई गई थी अवस्थापना निधि के संबंध में नीति
प्रदेश में अप्रैल 1998 में अवस्थापना निधि के संबंध में नीति बनाई गई थी। अप्रैल 1999 में ही शासनादेश जारी कर इस निधि से 60 प्रतिशत कार्य स्थायी प्रकृति के करने के अलावा 40 प्रतिशत राशि नगर निगम की आय के लिए नए स्रोत विकसित करने का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन नगर निगम की ओर से इस दिशा में पिछले दो दशक से कोई भी काम नहीं किया गया है, जबकि नगर निगम को इस निधि के करीब 100 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
आमदनी 47 करोड़, खर्च 400 करोड़
नगर निगम को कर और करेत्तर मद में इस साल करीब 47 करोड़ रुपये की आमदनी हुई है। लेकिन नगर निगम शहर के विकास में करीब 400 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। इसमें करीब 360 करोड़ रुपये शासकीय अनुदानों से प्राप्त होती है। ऐसे में नगर निगम को शहर के विकास के लिए हमेशा शासन की ओर से देखना पड़ता है।
1998 में बनाई गई थी अवस्थापना निधि के संबंध में नीति
प्रदेश में अप्रैल 1998 में अवस्थापना निधि के संबंध में नीति बनाई गई थी। अप्रैल 1999 में ही शासनादेश जारी कर इस निधि से 60 प्रतिशत कार्य स्थायी प्रकृति के करने के अलावा 40 प्रतिशत राशि नगर निगम की आय के लिए नए स्रोत विकसित करने का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन नगर निगम की ओर से इस दिशा में पिछले दो दशक से कोई भी काम नहीं किया गया है, जबकि नगर निगम को इस निधि के करीब 100 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
आमदनी 47 करोड़, खर्च 400 करोड़
नगर निगम को कर और करेत्तर मद में इस साल करीब 47 करोड़ रुपये की आमदनी हुई है। लेकिन नगर निगम शहर के विकास में करीब 400 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। इसमें करीब 360 करोड़ रुपये शासकीय अनुदानों से प्राप्त होती है। ऐसे में नगर निगम को शहर के विकास के लिए हमेशा शासन की ओर से देखना पड़ता है।
नगर निगम को होने वाली मुख्य आय
नगर आयुक्त अविनाश सिंह ने बताया कि नगर निगम अपनी आय बढ़ाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। नगर निगम में 32 गांवों के शामिल होने के बाद नगर निगम का लैंड बैंक मजबूत हुआ है। शहर के अलावा इन गांवों में कई स्थानों पर जमीन चिह्नित की गई है। इन जमीनों का नगर निगम के द्वारा नीलामी की जाएगी। इसके अलावा शहर के विभिन्न इलाकों के प्राइम लोकेशन में व्यावसायिक कांप्लेक्स का भी निर्माण किया जाएगा।
गृहकर- 15 करोड़
जलकर- 10 करोड़
सीवर कर- 80 लाख
विज्ञापन से आय- 2.80 करोड़
व्यावसायिक एवं सामुदायिक भवनों का किराया- 2.50
लाइसेंस शुल्क- 70 लाख
टैक्सी स्टैंड से आय- 55 लाख
राज्य वित्त आयोग अनुदान- 140 करोड़
केंद्रीय आपदा राहत अनुदान- 60 करोड़
नगरीय सड़क सुधार योजना अनुदान- 10 करोड़
अमृत मिशन अनुदान- 50 करोड़
गृहकर- 15 करोड़
जलकर- 10 करोड़
सीवर कर- 80 लाख
विज्ञापन से आय- 2.80 करोड़
व्यावसायिक एवं सामुदायिक भवनों का किराया- 2.50
लाइसेंस शुल्क- 70 लाख
टैक्सी स्टैंड से आय- 55 लाख
राज्य वित्त आयोग अनुदान- 140 करोड़
केंद्रीय आपदा राहत अनुदान- 60 करोड़
नगरीय सड़क सुधार योजना अनुदान- 10 करोड़
अमृत मिशन अनुदान- 50 करोड़