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लॉकडाउन से बेहाल मजदूरों को चरखा ने दिखाई नई राह, हर महीने कमा रहे हैं हजारों रुपये
Fri, 29 May 2020 06:08 PM IST
vivek shukla
सुनील कुमार सुमन, तुर्कपट्टी (कुशीनगर)।
सुनील कुमार सुमन, तुर्कपट्टी (कुशीनगर)।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 29 May 2020 06:08 PM IST
सार
करीब 200 महिलाएं बनी परिवार की आर्थिक गतिविधियों की केंद्र
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Kushinagar news
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी ने चरखा से सूत कातकर स्वालंबी भारत की कल्पना की थी। करीब 100 साल बाद तुर्कपट्टी क्षेत्र में लॉकडाउन के दौरान इसकी हकीकत दिख रही है।
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करीब 200 महिलाएं एक संस्था से जुड़कर न्यू मॉडल चरखा से सूत कातकर खुद को स्वावलंबी बनाने के साथ-साथ परिवार को भी आर्थिक सहयोग दे रही हैं। लॉकडाउन के कारण परदेश से वापस लौट रहे मजदूरों के लिए भी यह नई राह हो सकती है।
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फाजिलनगर ब्लाक के सपहा गांव निवासी जयप्रकाश पांडेय तथा उनके पुत्र पंकज पांडेय द्वारा वर्ष 2008 में "खादी ग्रामोद्योग" की मदद से स्वरोजगार हेतु सुत कताई का कुटीर उद्योग प्रारंभ किया था। शुरू में एक दर्जन न्यू मॉडल चरखा मशीनों से कार्य प्रारंभ कराया गया।
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इसके लिए घर के कार्यों को निपटा कर खाली बैठीं गांव की महिलाओं को विधिवत प्रशिक्षण देकर जोड़ा गया। अतिरिक्त समय में आय का साधन मिला तो महिलाओं की रुचि बढती गई। नतीजा छोटे से कुटीर उद्योग को पंख लग गए और कुटीर उद्योग का चेहरा अब बड़े उद्योग का रूप लेता जा रहा है।
चरखा मशीनों की संख्या एक दर्जन से बढ़कर 105 और कामगार महिलाओं की संख्या करीब 200 पहुंच गई है। यहां सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच आसपास की महिलाएं अपनी आर्थिक योजनाओं के साथ महात्मा गांधी के स्वालंबी भारत की तस्वीर बुनने बैठ जाती हैं।
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चरखा को खुशहाली का हथियार मानती हैं महिलाएं
यह संस्थान रायबरेली व एटा के केंद्रीय पूसी संयंत्र से कच्चा माल मंगाता है। यहां क्षेत्र के करमा टोला,सपहा, अवरवा सोफीगंज, धौरहरा आदि गांव की महिलाओं को रोजगार मिला है। एक चरखा पर आठ किलोग्राम कच्चे माल के बंडल से महिलाएं 25 से 30 दिन में करीब 35 किलो सूत तैयार करती हैं।
इसके लिए उन्हें प्रत्येक दिन सात से आठ घंटा कार्य करना होता है। प्रत्येक माह की पहली तारीख को कार्य करने वाली इन महिलाओं के बैंक खाते में सात से 10 हजार रुपये तक का मैसेज पहुंच जाता है। इन हुनरमंद महिलाओं की कमाई रकम के तीस प्रतिशत हिस्से के बराबर रकम प्रोत्साहन स्वरूप भारत सरकार इनके बैंक खातों में भेजती है। इतना ही नहीं भारत सरकार और संस्थान इनका वार्षिक बीमा का प्रीमियम भी अदा करता है।
चरखे को परिवार की खुशहाली का केंद्र मानने वाली बसंती, रैबुन, हजरूति, शोभा आदि का कहना है कि रोजगार संकट के इस दौर में अपने गांव में ही रोजगार मिलने से परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है। घर का काम निपटाकर वे लोग इस कार्य को भी पूरा कर लेती हैं। आयशा और सावित्री ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान भी उनके घरों में केवल इस चरखा की वजह से ही आर्थिक तंगी नहीं आई है।
संस्थान के प्रबंधक जयप्रकाश पांडेय का कहना है कि सूत कातकर एक महिला औसतन आठ हजार रुपये कमा लेती हैं। स्थान इनके दो बच्चों की कक्षा नौ से बारहवीं तक की फीस भी भरता है। सरकार से प्रोत्साहन व बीमा की भी व्यवस्था है। इनके बनाये सूत हरदोई, मुरादाबाद व बिजनौर भेजा जाता है। जल्द ही स्थानीय स्तर पर बुनाई का कार्य भी प्रारम्भ होगा।
इसके लिए उन्हें प्रत्येक दिन सात से आठ घंटा कार्य करना होता है। प्रत्येक माह की पहली तारीख को कार्य करने वाली इन महिलाओं के बैंक खाते में सात से 10 हजार रुपये तक का मैसेज पहुंच जाता है। इन हुनरमंद महिलाओं की कमाई रकम के तीस प्रतिशत हिस्से के बराबर रकम प्रोत्साहन स्वरूप भारत सरकार इनके बैंक खातों में भेजती है। इतना ही नहीं भारत सरकार और संस्थान इनका वार्षिक बीमा का प्रीमियम भी अदा करता है।
चरखे को परिवार की खुशहाली का केंद्र मानने वाली बसंती, रैबुन, हजरूति, शोभा आदि का कहना है कि रोजगार संकट के इस दौर में अपने गांव में ही रोजगार मिलने से परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है। घर का काम निपटाकर वे लोग इस कार्य को भी पूरा कर लेती हैं। आयशा और सावित्री ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान भी उनके घरों में केवल इस चरखा की वजह से ही आर्थिक तंगी नहीं आई है।
संस्थान के प्रबंधक जयप्रकाश पांडेय का कहना है कि सूत कातकर एक महिला औसतन आठ हजार रुपये कमा लेती हैं। स्थान इनके दो बच्चों की कक्षा नौ से बारहवीं तक की फीस भी भरता है। सरकार से प्रोत्साहन व बीमा की भी व्यवस्था है। इनके बनाये सूत हरदोई, मुरादाबाद व बिजनौर भेजा जाता है। जल्द ही स्थानीय स्तर पर बुनाई का कार्य भी प्रारम्भ होगा।