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Hal Shashthi 2021: जानिए कब है हलषष्ठी का व्रत, इस बार कौन से संयोग बना रहे हैं इस पर्व को खास
Fri, 27 Aug 2021 01:42 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 27 Aug 2021 01:42 PM IST
सार
भरणी नक्षत्र, सुबह सात बजकर 47 मिनट तक वृद्धि योग पश्चात ध्रुव नामक शुभ योग है।
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हलषष्ठी का व्रत
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
ललही छठ (हलषष्ठी) व्रत का पर्व 28 अगस्त शनिवार को मनाया जाएगा। वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार, इस दिन षष्ठी रात को आठ बजकर 14 मिनट तक है। इसके साथ कि भरणी नक्षत्र, सुबह सात बजकर 47 मिनट तक वृद्धि योग पश्चात ध्रुव नामक शुभ योग है। चंद्रमा की स्थिति मेष राशिगत (उच्चारोही) है।
हलषष्ठी व्रत का महत्व
पंडित अवधेश मिश्रा के अनुसार, पुत्र की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी व्रत किया जाता है। इस दिन बलराम जी की जयंती भी मनाई जाती है। इसे तिन छठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं और व्रत के दौरान कोई अन्न नहीं ग्रहण करती हैं। इसमें महुआ की दातुन की जाती है। हलषष्ठी व्रत में हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है। इस व्रत में वही वस्तु ग्रहण की जाती है जो तालाब या सरोवर में पैदा होती है या बिना जुते हुए भूमि में पाया जाता है। जैसे तिन्नी का चावल, कर्मुआ का साग इत्यादि। इस दिन गाय के किसी उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। इसमें भैंस का दूध, दही घी का प्रयोग किया जाता है।
पूजा की विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, पूजा की सफलता के इस दिन घर के बाहर भैंस के गोबर से षष्ठी माता का चित्र बनाया जाता है। उसके पश्चात गणेश गौरी और बलराम जी की पूजा की जाती है। एक छोटा सा तालाब बना कर झरबेरी ,पलाश और कुश का पेड़ लगाते हैं और वही बैठकर पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं व्रती हलषष्ठी व्रत की कथा भी सुनती है। ऐसी मान्यता है कि षष्ठी देवी और भगवान बलराम जी की पूजा करने से उनके पुत्रों की आयु में वृद्धि होती है और वे पूर्ण स्वस्थ और निरोग रहते हैं। बलराम जी उनके पुत्रों को लंबी आयु प्रदान करते हैं। इस दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की जयंती है।
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हलषष्ठी व्रत का महत्व
पंडित अवधेश मिश्रा के अनुसार, पुत्र की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी व्रत किया जाता है। इस दिन बलराम जी की जयंती भी मनाई जाती है। इसे तिन छठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं और व्रत के दौरान कोई अन्न नहीं ग्रहण करती हैं। इसमें महुआ की दातुन की जाती है। हलषष्ठी व्रत में हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है। इस व्रत में वही वस्तु ग्रहण की जाती है जो तालाब या सरोवर में पैदा होती है या बिना जुते हुए भूमि में पाया जाता है। जैसे तिन्नी का चावल, कर्मुआ का साग इत्यादि। इस दिन गाय के किसी उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। इसमें भैंस का दूध, दही घी का प्रयोग किया जाता है।
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पूजा की विधि
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, पूजा की सफलता के इस दिन घर के बाहर भैंस के गोबर से षष्ठी माता का चित्र बनाया जाता है। उसके पश्चात गणेश गौरी और बलराम जी की पूजा की जाती है। एक छोटा सा तालाब बना कर झरबेरी ,पलाश और कुश का पेड़ लगाते हैं और वही बैठकर पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं व्रती हलषष्ठी व्रत की कथा भी सुनती है। ऐसी मान्यता है कि षष्ठी देवी और भगवान बलराम जी की पूजा करने से उनके पुत्रों की आयु में वृद्धि होती है और वे पूर्ण स्वस्थ और निरोग रहते हैं। बलराम जी उनके पुत्रों को लंबी आयु प्रदान करते हैं। इस दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की जयंती है।
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