गोरखपुर निकाय चुनाव: प्रत्याशियों के मन में संशय के बादल और गहराए, सरकार के निर्णय के बाद सभी प्रत्याशी उलझे
नगर निगम गोरखपुर का कार्यकाल छह जनवरी को खत्म हो रहा है। मेयर से लेकर पार्षद तक निवर्तमान हो जाएंगे। वहीं, इसके बाद नगर निगम संचालन की कमान डीएम की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय टीम के पास होगी।
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नगर निकाय चुनाव के संबंध में हाईकोर्ट के निर्णय के बाद नगर निगम चुनाव में दम ठोंक रहे प्रत्याशियों के मन में संशय के बादल और गहरा गए हैं। भले ही हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने का निर्णय लिया है, लेकिन पिछले कई महीनों से चल रही उहापोह अब तक प्रत्याशियों के मन में बरकरार है। चुनाव की रूपरेखा से लेकर नई तिथि तक को लेकर उनके मन में सवाल उठने लगे हैं।
बिना अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण संबंधी हाईकोर्ट के निर्णय के अनुसार अगर चुनाव होता है तो गोरखपुर नगर निगम के कुल 80 वार्डों में से सामान्य पुरुष के लिए 48, सामान्य महिलाओं के लिए 24, अनुसूचित जाति पुरुष के लिए पांच और अनुसूचित जाति महिला के लिए तीन वार्ड निर्धारित होंगे। जबकि ओबीसी रैपिड सर्वे के बाद गोरखपुर नगर निगम में सामान्य पुरुष के लिए 34, महिला के लिए 17, पिछड़ा वर्ग के लिए 14, पिछड़ा वर्ग महिला के लिए सात, अनुसूचित जाति के लिए पांच और अनुसूचित महिला के लिए तीन वार्ड निर्धारित किए गए थे।
ऐसे में नगर निगम में पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका बढ़ गई है। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग के तमाम प्रत्याशियों के मन में काफी संशय के बादल और गहरा गए हैं। पिछड़ा वर्ग के कई पार्षदों का कहना है इस तरह से उनके सामने और तगड़ी चुनौती हो जाएगी। मुकाबला भी कठिन हो जाएगा।
गलत रैपिड सर्वे करने वालों पर गिर सकती है गाज
हाईकोर्ट में विभिन्न वार्डों में अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या के लिए किए गए ओबीसी रैपिड सर्वे पर भी सवाल उठाया गया था। गोरखपुर से साहबगंज, शिवपुर सहबाजगंज, रसूलपुर समेत 20 से अधिक पार्षदों और दावेदारों ने गलत सर्वे का आरोप लगाते हुए रिट दायर की थी। ऐसे में अगर वार्डों में फिर से अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या की गणना होती है और इसमें गड़बड़ी मिलती है तो गणना करने वाले कर्मचारियों आदि भी गाज गिर सकती है। वहीं, इसके बाद नए सिरे से आरक्षण निर्धारित होगा।
छह जनवरी को खत्म हो जाएगा नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल
नगर निगम गोरखपुर का कार्यकाल छह जनवरी को खत्म हो रहा है। मेयर से लेकर पार्षद तक निवर्तमान हो जाएंगे। वहीं, इसके बाद नगर निगम संचालन की कमान डीएम की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय टीम के पास होगी। इसमें डीएम के अलावा नगर आयुक्त एवं डीएम द्वारा नामित वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहेंगे।
दावेदारों को उत्साह पड़ेगा ठंडा
नगर निकाय चुनाव को लेकर हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार के रुख से यह तय है कि चुनाव में कम से कम तीन महीने की और देर होगी। ऐसे में शहर के विभिन्न वार्डों से चुनाव की तैयारी कर रहे दावेदारों का उत्साह ठंडा हो जाएगा। दिसंबर-जनवरी में चुनाव की संभावना को देखते हुए करीब करीब तमाम दावेदारों ने वोटरों को रिझाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर चुके हैं। चुनाव टलने की आशंका में अब सभी प्रत्याशी चुनाव की रूपरेखा से लेकर तारीख तय हो जाने के बाद तक अपनी गतिविधियों को धीमी कर देंगे।
क्या होता है ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला?
बोले राजनीतिक दल
प्रदेश सरकार ने ओबीसी सहित सभी वर्ग के आरक्षण को ध्यान में रखते हुए परिसीमन कराया था। अब ट्रिपल टेस्ट के गाइडलाइन के अनुसार आरक्षण नियंत्रण निर्धारित करते हुए चुनाव कराया जाएगा।- डॉ. धर्मेंद्र सिंह, क्षेत्रीय अध्यक्ष एवं एमएलसी, भाजपा।
सरकार को जब पहले से पता था कि आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या आदेश है तो उसने इसे नजरअंदाज क्यों किया। सरकार, आरक्षण खत्म कर पिछड़ों का हक मारना चाहती है। सारा खेल, प्रदेश की भाजपा सरकार का ही रचा हुआ है। पहले तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी की गई। फिर सरकार ने अपने ही याचिका दाखिल कराई ताकि बिना आरक्षण के चुनाव कराया जा सके। सरकार के इस रवैये से सपा में आक्रोश है और हम इसका विरोध करते हैं। - अवधेश यादव, निवर्तमान जिलाध्यक्ष, समाजवादी पार्टी।
ओबीसी पिछड़े समाज से आते हैं। ऐसे में समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए आरक्षण जरूरी है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। पार्टी की भी मांग है कि आरक्षण के हिसाब से ही चुनाव कराया जाए।- जितेंद्र कुमार नीरज, जिलाध्यक्ष, बसपा।
आरक्षण व्यवस्था को काफी सोच-समझकर लागू किया गया है। नगर निकाय चुनावों में भी यह व्यवस्था काफी शोध के बाद लागू की गई है। निकाय चुनाव आरक्षण के प्रावधानों के साथ ही किया जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने के लिए इस तरह की व्यवस्था की जा रही है।- अनिल सोनकर, निवर्तमान जिला महासचिव, कांग्रेस।