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शहर बढ़ा सुविधाएं नहीं: जलभराव की समस्या झेल रहा गोरखपुर शहर, नगर निगम नहीं ढूंढ सका स्थायी समाधान
Mon, 13 Dec 2021 01:59 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 13 Dec 2021 01:59 PM IST
सार
गोरखपुर शहर की बनावट कटोरे की तरह है। बांध बनाकर राप्ती नदी के पानी को शहर में आने से रोका जाता है। जब तक शहर के नाले से राप्ती नदी में जाने वाले पानी का स्तर राप्ती के जलस्तर से कम रहता है तब तक रेगुलेटर के जरिए शहर का पानी नदी में जाता है।
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गोरखपुर में जलभराव।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
गोरखपुर नगर निगम बने करीब तीन दशक हो चुके हैं, लेकिन आज तक नगर निगम शहर में होने वाले जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान नहीं खोज सका है। बारिश के दिनों में शहर के विभिन्न इलाकों की स्थिति ऐसी हो जाती है कि कहीं लोग महीने भर तक अपने घरों में कैद हो जाते हैं, तो कहीं पानी में डूबे घरों से लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए एनडीआरएफ की सहायता लेनी पड़ती है। हालांकि, फौरी राहत पहुंचाने के लिए नगर निगम की ओर से पंपिंग सेट लगाए जाते हैं, लेकिन इससे खास राहत नहीं मिलती। पूरी बरसात शहर के विभिन्न इलाके के लोगों को जलभराव की समस्या को झेलना पड़ता है।
बताया जाता है कि गोरखपुर शहर की बनावट कटोरे की तरह है। बांध बनाकर राप्ती नदी के पानी को शहर में आने से रोका जाता है। जब तक शहर के नाले से राप्ती नदी में जाने वाले पानी का स्तर राप्ती के जलस्तर से कम रहता है तब तक रेगुलेटर के जरिए शहर का पानी नदी में जाता है। जब नदी का जलस्तर बढ़ता है तो रेगुलेटर को बंद कर पंपसेट के जरिए पानी को नदी में फेंका जाता है। इसके लिए बांधों पर 11 रेगुलेटर बनाए गए हैं। इनमें कटनिया, ट्रांसपोर्टनगर, हांसुपुर, मिर्जापुर, इलाहीबाग, डोमिनगढ़, बसियाडीह, नया गांव में रेगुलेटर लगे हैं। वहीं, रसूलपुर, रामनगर, हड़हवा फाटक, बशारतपुर समेत कुल आठ स्थानों पर संपवेल बनाए गए हैं, जिनसे निचले इलाकों का पानी पंप के जरिए मुख्य नालों में फेंका जाता है। इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद हर साल शहर की जनता जलभराव की समस्या से जूझती है।
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बताया जाता है कि गोरखपुर शहर की बनावट कटोरे की तरह है। बांध बनाकर राप्ती नदी के पानी को शहर में आने से रोका जाता है। जब तक शहर के नाले से राप्ती नदी में जाने वाले पानी का स्तर राप्ती के जलस्तर से कम रहता है तब तक रेगुलेटर के जरिए शहर का पानी नदी में जाता है। जब नदी का जलस्तर बढ़ता है तो रेगुलेटर को बंद कर पंपसेट के जरिए पानी को नदी में फेंका जाता है। इसके लिए बांधों पर 11 रेगुलेटर बनाए गए हैं। इनमें कटनिया, ट्रांसपोर्टनगर, हांसुपुर, मिर्जापुर, इलाहीबाग, डोमिनगढ़, बसियाडीह, नया गांव में रेगुलेटर लगे हैं। वहीं, रसूलपुर, रामनगर, हड़हवा फाटक, बशारतपुर समेत कुल आठ स्थानों पर संपवेल बनाए गए हैं, जिनसे निचले इलाकों का पानी पंप के जरिए मुख्य नालों में फेंका जाता है। इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद हर साल शहर की जनता जलभराव की समस्या से जूझती है।
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शहर में 100 से ज्यादा इलाकों में होता है जलभराव
दिन प्रतिदिन शहर में जलभराव वाले स्थानों की संख्या बढ़ती जा रही है। करीब तीन साल पहले तक शहर के 67 स्थानों को जलभराव वाले इलाके के रूप में चिह्नित किया गया था, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 100 से ज्यादा हो चुकी है। इनमें सिद्धार्थपुरम कॉलोनी, आजाद नगर पूर्वी, सिद्धार्थनगर तारामंडल रोड, रसूलपुर, अजय नगर भट्टा, दरियाचक भट्टा, सिंघड़िया, चक्सा हुसैन, भेड़ियागढ़, इंदिरानगर, गोपलापुर, शक्तिनगर, धोबीगली, साकेतनगर, रुस्तमपुर, शिवाजीनगर, धर्मशाला, इलाहीबाग, लालडिग्गी, साहबगंज, गीताप्रेस, रेती चौक, माया बाजार, घोष कंपनी, दाउदपुर, इंजीनियरिंग कॉलेज, खोलेटोला, राप्ती नगर, ग्रीन सिटी आदि प्रमुख है।बढ़ता जा रहा शहर का दायरा, अनियोजित हो रहा विकास
शहर का दायरा बढ़ता जा रहा है। एक समय शहर के जिन बाहरी इलाकों में बारिश का पानी जाता था, अब उन इलाकों में मकान ही मकान हैं। ऐसे में पानी का प्राकृतिक बहाव खत्म हो गया है। परिणाम स्वरूप बाहरी इलाके बारिश के दिनों में डूब जाते हैं।नगर निगम के अविनाश सिंह ने बताया कि शहर के जलभराव को दूर करना नगर निगम की प्राथमिकता में है। बारिश के दिनों में तो तत्काल राहत पहुंचाने के मकसद से बड़ी क्षमता वाले पंप दूसरे राज्यों से भी मंगाए गए। 300 से भी ज्यादा पंप सेट लगाकर लोगों को राहत पहुंचाई गई। दीर्घकालिक योजना के तहत लिडार तकनीक से सर्वे किया जा रहा है। जल्द ही प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा।