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आंखों को भले अच्छे लगते हों, लेकिन बीमारी भी देते हैं आतिशबाजी के ‘रंग’
Tue, 03 Nov 2020 10:16 AM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 03 Nov 2020 10:16 AM IST
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Diwali Crackers
- फोटो : PTI
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दिवाली के दौरान आतिशबाजी की सतरंगी रोशनी भले ही आंखों को भली लगती हो, लेकिन इनके अलग-अलग रंग हमारे शरीर में कैंसर जैसा घातक रोग भी पनपने का कारण बन जाते हैं। दरअसल विभिन्न प्रकार के रंग पैदा करने के लिए पटाखों में अलग-अलग तरह के केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। ये केमिकल जलने के बाद रंग बिरंगी रोशनी देते हैं, लेकिन साथ में ऐसी गैस भी उत्सर्जित करते हैं जिसकी वजह से आम आदमी को चर्म रोग से लेकर कैंसर तक की आशंका बन जाती है।
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सुख और समृद्धि के पर्व दिवाली पर उत्साह-उमंग स्वाभाविक है। हर्ष-उल्लास के इस मौके पर हमारी जरा सी असावधानी या यूं कहें कि अति-उत्साह हमारी अपनी और शहर की सेहत पर भारी पड़ रहा है। पर्व की रात अधिक से अधिक आतिशबाजी की होड़ शहर की आबोहवा को जहरीली बना देती है जिसका सीधा दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। आतिशबाजी वायु को बुरी तरह प्रदूषित कर देती है जिसकी वजह से कई तरह की बीमारियों की आशंका बनी रहती है।
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रंगीन रोशनी वाले पटाखे ज्यादा खतरनाक
- रंगीन रोशनी वाले पटाखे स्वास्थ्य के लिए अधिक खतरनाक होते हैं। पटाखों को रंगीन बनाने के लिए जिन केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, वह स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह है। ऐसे में लोगों को मौका कोई भी हो आतिशबाजी से बचना चाहिए।
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डॉ. सीपी गुप्ता, रसायनशास्त्र शिक्षक, सेंट एंड्रयूज कॉलेज
विभिन्न रंग के लिए होने वाले केमिकल का इस्तेमाल और उससे होने वाले रोग (डॉ. सीपी गुप्ता के अनुसार)
- लाल : स्ट्रॉन्टियम के इस्तेमाल से बने पटाखों से लाल रंग निकलता है। यह छोटे बच्चों की वृद्धि पर प्रभाव डालता है और उनकी हड्डियों के विकास को रोकता है। इसके साथ ही लाल रंग की रोशनी निकालने के लिए उसमें सीजियम नाइट्रेट डाला जाता है। इस रसायन को बारूद के साथ मिलाने पर इसका रंग लाल पड़ जाता है। इसका प्रयोग ज्यादातर अनार और रॉकेट में किया जाता है.
- हरा : हरे रंग की रोशनी देने वाले पटाखों में बोरिक एसिड का इस्तेमाल होता है, जिससे शरीर में संक्रमण हो सकता है। इसके अलावा पटाखे में से हरे रंग यानी ग्रीन रोशनी निकालने के लिए बेरियम नाइट्रेट का भी इस्तेमाल होता है। इसकी वजह से त्चचा पर चकत्ते हो जाते हैं और सांस लेने पर मुंह, नाक और गला सूखने लगता है।
- पीला: सोडियम नाइट्रेट का रंग देखने पर ही इसका रंग हल्का पीला नजर आता है। पटाखों के बारूद के साथ इसे मिलाकर नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाई जाती है। यही वजह है कि आग लगाने के बाद ये पीले रंग की रोशनी छोड़ता है. इसका इस्तेमाल अमूमन हर पटाखे में होता है. खासकर चकरी में इसका इस्तेमाल अधिक है। इसकी वजह से चक्कर आना, पेट में ऐंठन, उल्टी दस्त की आशंका रहती है।
- नीला : इस रोशनी वाले पटाखों में डायक्सिन होता है। इससे कैंसर होने की आशंका रहती है।
- नारंगी : नारंगी रंग के लिए सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल होता है, जिससे ब्लड प्रेशर, किडनी संबंधी बीमारी हो सकती है।
- बैंगनी : रूबिडियम और पोटैशियम से बैंगनी रंग बनता है। इसमें कार्सिनोजेनिक या हार्मोन्स को खराब करने वाले केमिकल्स होते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है।
- सफेद : सफेद रोशनी पैदा करने वाले पटाखों में मैग्नीशियम, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का प्रयोग होता है, यह अल्जाइमर के कारक हो सकते हैं। मैग्नीशियम की वजह से सांस लेने में तकलीफ, टाइटेनियम की वजह से सीने में दर्द, खांसी तथा एल्युमिनियम की वजह से मस्तिष्क और फेफड़ों में तकलीफ हो सकती है।
- लाल : स्ट्रॉन्टियम के इस्तेमाल से बने पटाखों से लाल रंग निकलता है। यह छोटे बच्चों की वृद्धि पर प्रभाव डालता है और उनकी हड्डियों के विकास को रोकता है। इसके साथ ही लाल रंग की रोशनी निकालने के लिए उसमें सीजियम नाइट्रेट डाला जाता है। इस रसायन को बारूद के साथ मिलाने पर इसका रंग लाल पड़ जाता है। इसका प्रयोग ज्यादातर अनार और रॉकेट में किया जाता है.
- हरा : हरे रंग की रोशनी देने वाले पटाखों में बोरिक एसिड का इस्तेमाल होता है, जिससे शरीर में संक्रमण हो सकता है। इसके अलावा पटाखे में से हरे रंग यानी ग्रीन रोशनी निकालने के लिए बेरियम नाइट्रेट का भी इस्तेमाल होता है। इसकी वजह से त्चचा पर चकत्ते हो जाते हैं और सांस लेने पर मुंह, नाक और गला सूखने लगता है।
- पीला: सोडियम नाइट्रेट का रंग देखने पर ही इसका रंग हल्का पीला नजर आता है। पटाखों के बारूद के साथ इसे मिलाकर नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाई जाती है। यही वजह है कि आग लगाने के बाद ये पीले रंग की रोशनी छोड़ता है. इसका इस्तेमाल अमूमन हर पटाखे में होता है. खासकर चकरी में इसका इस्तेमाल अधिक है। इसकी वजह से चक्कर आना, पेट में ऐंठन, उल्टी दस्त की आशंका रहती है।
- नीला : इस रोशनी वाले पटाखों में डायक्सिन होता है। इससे कैंसर होने की आशंका रहती है।
- नारंगी : नारंगी रंग के लिए सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल होता है, जिससे ब्लड प्रेशर, किडनी संबंधी बीमारी हो सकती है।
- बैंगनी : रूबिडियम और पोटैशियम से बैंगनी रंग बनता है। इसमें कार्सिनोजेनिक या हार्मोन्स को खराब करने वाले केमिकल्स होते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है।
- सफेद : सफेद रोशनी पैदा करने वाले पटाखों में मैग्नीशियम, टाइटेनियम और एल्युमिनियम का प्रयोग होता है, यह अल्जाइमर के कारक हो सकते हैं। मैग्नीशियम की वजह से सांस लेने में तकलीफ, टाइटेनियम की वजह से सीने में दर्द, खांसी तथा एल्युमिनियम की वजह से मस्तिष्क और फेफड़ों में तकलीफ हो सकती है।