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गन्ना सहकारी समिति: ढाई दशक से अपडेट ही नहीं हुई बैलेंस सीट, जानिए कैसे पकड़ी गई गड़बड़ी
Sat, 18 Dec 2021 01:38 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sat, 18 Dec 2021 01:38 PM IST
सार
पिपराइच गन्ना सहकारी समिति का मामला है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों की देनदारी का मामला फंसा तब गड़बड़ी पकड़ी गई।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : pixabay
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विस्तार
चीनी मिल और गन्ना किसानों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी गन्ना सहकारी समितियों की हालत खस्ता है। गोरखपुर जिले के पिपराइच केन यूनियन में 26 वर्ष से बैलेंस सीट ही अपडेट नहीं हुई है। इसके चलते सेवानिवृत्त 23 कर्मचारियों को बकाया वेतन, एरियर और पीएफ की रकम भी नहीं मिल पा रही है। मामला जब मुख्यमंत्री तक पहुंचा, तब केन यूनियन ने इसे अपडेट कराना शुरू किया।
गन्ना किसानों की सहूलियत के लिए सहकारी गन्ना समितियों की स्थापना की गई थी। समितियां ही मिल को गन्ना बेचती हैं। बदले में इन्हें कमीशन मिलता है, जिससे समिति कर्मचारियों को वेतन देती हैं व अन्य खर्च चलते हैं। वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम की सभी मिलें घाटे में चली गईं। उसके बाद से सरकार ने मिलों को बेचना व बंद करना शुरू कर दिया। पिपराइच चीनी मिल भी घाटे के चलते बंद हो गई थीं। इसका असर यहां की केन यूनियन पर भी पड़ा और कर्मचारियों को वेतन भी मिलना बंद हो गया।
कर्मचारी अयोध्या सिंह, गोरख सिंह, आनंद सिंह, सूर्यलाल वर्मा आदि ने बताया कि वेतन नहीं मिलने पर उन लोगों ने केन कमिश्नर के यहां शिकायत की। इस पर उन्हें अन्य समितियों में स्थानांतरण का सुझाव दिया गया। साथ ही विकल्प भी मांगे गए। इसके बाद अधिकतर कर्मचारियों ने दूसरी अन्य समितियों में अपना स्थानांतरण करा लिया। अब जब ये कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं तो उन्हें बकाया ही नहीं मिल रहा है। वजह यह कि समिति की बैलेंस सीट ही अपडेट नहीं है।
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गन्ना किसानों की सहूलियत के लिए सहकारी गन्ना समितियों की स्थापना की गई थी। समितियां ही मिल को गन्ना बेचती हैं। बदले में इन्हें कमीशन मिलता है, जिससे समिति कर्मचारियों को वेतन देती हैं व अन्य खर्च चलते हैं। वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम की सभी मिलें घाटे में चली गईं। उसके बाद से सरकार ने मिलों को बेचना व बंद करना शुरू कर दिया। पिपराइच चीनी मिल भी घाटे के चलते बंद हो गई थीं। इसका असर यहां की केन यूनियन पर भी पड़ा और कर्मचारियों को वेतन भी मिलना बंद हो गया।
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कर्मचारी अयोध्या सिंह, गोरख सिंह, आनंद सिंह, सूर्यलाल वर्मा आदि ने बताया कि वेतन नहीं मिलने पर उन लोगों ने केन कमिश्नर के यहां शिकायत की। इस पर उन्हें अन्य समितियों में स्थानांतरण का सुझाव दिया गया। साथ ही विकल्प भी मांगे गए। इसके बाद अधिकतर कर्मचारियों ने दूसरी अन्य समितियों में अपना स्थानांतरण करा लिया। अब जब ये कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं तो उन्हें बकाया ही नहीं मिल रहा है। वजह यह कि समिति की बैलेंस सीट ही अपडेट नहीं है।
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सीएम के सामने पहुंचा मामला
सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अपनी मूल समिति से ही बकाया व पीएफ आदि का पैसा मिलना है। इसके चलते उन्होंने अपनी पुरानी समिति पिपराइच से संपर्क किया। इसके बाद पता लगा कि पीएफ खाते में केवल 1160 रुपये ही शेष हैं। अन्य खातों का हिसाब-किताब भी दुरुस्त नहीं था। इसके चलते बकाया देनदारी में बहानेबाजी होने लगी। इसके बाद कर्मचारियों ने गोरखनाथ मंदिर पहुंचकर मुख्यमंत्री से शिकायत की।आठ कर्मचारियों का बकाया है वेतन
वर्ष 2012 से पहले जिन कर्मचारियों का पिपराइच समिति से किसी दूसरी समिति में ट्रांसफर हो गया था, वे अपने बकाया वेतन के लिए दौड़ रहे हैं। किसी का एक लाख बकाया है तो किसी का 60 हजार रुपये। यह बकाया भी 10 साल पुराना है। समिति के कर्मचारी बताते हैं कि वर्ष 2012 में सरकार ने बकाया वेतन भुगतान के लिए बिल मांगा था, लेकिन तत्कालीन जिम्मेदारों ने यहां के आठ कर्मचारियों का नाम छोड़ दिया था, जिसके चलते वे परेशान हैं।पिपराइच केन यूनियन के सचिव गोपाल प्रसाद ने बताया कि कर्मचारियों की शिकायत पर छानबीन शुरू की गई तो पता लगा कि काफी पुराना रिकार्ड अपडेट नहीं है। इसके चलते दिक्कत आई है। एक कर्मचारी से रिकार्ड अपडेट कराया जा रहा है। बैलेंस सीट दुरुस्त होने पर ही स्थिति स्पष्ट होगी कि अभी किस सेवानिवृत्त कर्मचारी को कितना भुगतान करना है। कई साल तक केन यूनियन की स्थिति खराब थी। मिल के दोबारा शुरू होने के बाद अब समिति की हालत में सुधार की संभावना है।