चिंता: गोरखपुर में ब्लैक फंगस ने दी दस्तक, निजी अस्पतालों में मिले 16 मरीज
कोरोना संक्रमण से जंग जीते सात मरीज ऐसे हैं जिन्हें शुगर की भी दिक्कत नहीं, निजी अस्पतालों की ओपीडी में मिल रहे ऐसे मरीज, निजी अस्पतालों की तरफ से स्वास्थ्य विभाग को जानकारी नहीं दी गई
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गोरखपुर में कोविड संक्रमण के बीच जिले में ब्लैक फंगस ( म्यूकोरमाइकोसिस) के मरीज भी मिलने लगे हैं। निजी अस्पतालों की ओपीडी में कोरोना संक्रमण से मुक्ति पा चुके मरीजों में ब्लैक फंगस की शिकायतें मिली हैं। ऐसे मरीजों की संख्या 16 से ज्यादा हैं। यह मरीज एक सप्ताह के अंदर मिले हैं। आजाद नगर व राजेंद्र नगर के दो युवाओं सहित सात मरीज ऐसे हैं जिन्हें शुगर की भी दिक्कत नहीं हैं। इसके बावजूद गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक सूचना स्वास्थ्य विभाग को नहीं दी गई है। निजी अस्पताल संचालक अपने स्तर से ही इलाज में जुटे हैं।
ब्लैक फंगस के मरीज बढ़ने से डॉक्टर बेहद चिंतित हैं। डॉक्टरों ने सलाह दी है कि संक्रमितों में अगर ठीक होने के बाद आंख और नाक में कोई दिक्कत होती है तो तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें, वरना उनको आंखों की रोशनी के साथ नाक और कान में भी दिक्कत हो सकती है।
जानकारी के मुताबिक देश भर में कोरोना के मरीजों के ठीक होने के बाद ब्लैक फंगस की शिकायतें मिल रही हैं। ऐसे केस अब जिले में भी मिलने लगे हैं। कोरोना से ठीक होने के बाद 30 से 45 वर्ष के युवाओं में ब्लैक फंगस की शिकायतें मिली हैं। ऐसे 16 से ज्यादा मरीज निजी अस्पतालों में अपना इलाज कर रहे हैं।
छात्रसंघ चौराहा स्थित राज आई हॉस्पिटल के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ अनिल श्रीवास्तव ने बताया कि ओपीडी में रोजाना लगभग तीन से चार मरीज ब्लैक फंगस की शिकायत लेकर आ रहे हैं। एक सप्ताह में 16 से अधिक मरीज इलाज के लिए आ चुके हैं। इन मरीजों की उम्र 30 से 45 वर्ष के बीच हैं।
सात मरीज ऐसे हैं, जिन्हें शुगर की बीमारी भी नहीं है। इसमें राजेंद्र नगर और आजादनगर के दो युवक भी शामिल हैं। शुगर न होते हुए भी युवाओं के ब्लैक फंगस की चपेट में आने से चिंता बढ़ी है। हालांकि इन मरीजों ने कोरोना संक्रमण के दौरान स्टेरॉयड का इस्तेमाल किया है।
कमजोर इम्युनिटी सबसे बड़ा कारण
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ राम कुमार जायसवाल ने बताया कि जिन मरीजों की इम्युनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) कमजोर होती है, उन मरीजों में ब्लैक फंगस का खतरा अधिक रहता है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ब्लैक फंगस को लेकर शिकायतें मिली हैं। ऐसे मामले की जांच की जा रही है। बताया कि यह म्यूकोरमाइकोसिस फंगस संक्रमण है, जो शरीर में तेजी से फैलता है।
यह संक्रमण नाक, आंख, कान, दिमाग और फेफड़ों के साथ स्किन पर भी असर डालता है। इस बीमारी से आंखों की रोशनी भी चली जाती है। साथ ही मरीजों के जबड़े और नाक की हड्डी भी गल जाती है। अगर ब्लैक फंगस जैसे लक्षण दिखते हैं तो तत्काल डॉक्टर से संपर्क करें। यह घातक साबित हो सकता है।
आंख व नाक की नसें सूखने लगती हैं
मेडिकल कॉलेज में नेत्र रोग के विभागाध्यक्ष डॉ. राम कुमार जायसवाल ने बताया कि म्यूकोरमाइकोसिस में नाक और आंख के आसपास की नसों पर असर पड़ता है। नाक खुश्क हो जाती है। नाक की परत अंदर से सूखने लगती है। नाक के आसपास सूखी पपड़ियां जम जाती हैं। इसकी वजह से हड्डियां तक गलने लगती है। वहीं दूसरी ओर आंख की नसें भी सूखने लगती हैं। चेहरे की त्वचा सुन्न होने लगती है। चेहरा सूजने लगता है। आंखों की सेंट्रल रेटाइनल आर्टरी को ब्लॉक कर देता है। इसकी वजह से आंखों की रोशनी भी जा सकती है।
कोरोना मरीजों को दिखाई देने लगा कम
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के कोविड वार्ड में कुछ मरीजों ने कम दिखाई देने की शिकायत की है। डॉ राम कुमार जायसवाल ने बताया कि ऐसे मरीजों की जांच की गई तो उनका शुगर काफी ज्यादा था। साथ ही उन्हें स्टेरॉयड भी दी जा रही है। उनका इलाज किया जा रहा है। पोस्ट कोविड वार्ड में जब उनकी जांच की जाएगी तो सही जानकारी मिल पाएगी कि उन्हें ब्लैक फंगस या नहीं।
ब्लैक फंगस के लक्षण
संक्रमण से मुक्ति पा चुके लोगों के नाक में दर्द, नाक के रास्ते खून आना, नाक बंद हो जाना। दांत या जबड़े में दर्द, आंखों के सामने धुंधलापन, दोहरा दिखाई देना, गालों पर काले चक्कते, आंख के नीचे काले चक्कते पड़ना, चेहरे पर सूजन, कम दिखाई देना आदि लक्षण है।
स्वास्थ्य विभाग को मामले की जानकारी नहीं
गोरखपुर एसीएमओ डॉ एनके पांडेय ने कहा कि ब्लैक फंगस के एक भी मरीज की जानकारी नहीं है। निजी अस्पतालों में अगर ऐसे मरीज इलाज करा रहे हैं तो इसकी जानकारी स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है। जानकारी मिलने के बाद जरूरी कदम उठाया जाएगा।