Samwad 2025: 'गली बॉय' में एक भी गाली नहीं, जबकि यहां..., सिनेमा में गालियों के इस्तेमाल पर बोले दिव्य प्रकाश
Amar Ujala Samwad Event 2025: लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने हाल ही में अमर उजाला के लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम संवाद में शिरकत की। यहां उन्होंने फिल्मों और वेब सीरीज में गालियों के बढ़ते चलन पर बात की।
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सिनेमा में गालियों का इस्तेमाल बढ़ा है। ओटीटी की आमद के बाद तो इस पर मौजूद सीरीज में गालियों की भरमार रहती है। इसे लेकर आलोचनाएं भी होती हैं और चिंता भी जताई जाती है। समय-समय पर यह सवाल भी उठता है कि क्या सिनेमा में गालियों का इस्तेमाल उनके चलने की गारंटी बन गया है? हाल ही में अमर उजाला के वैचारिक संगम संवाद में जब दिव्य प्रकाश दुबे शिरकत करने पहुंचे, तो उनसे भी इस विषय पर सवाल पूछा गया। जानिए उन्होंने क्या कहा?
सिनेमा में गालियों का इस्तेमाल बढ़ा है। ओटीटी की आमद के बाद तो इस पर मौजूद सीरीज में गालियों की भरमार रहती है। इसे लेकर आलोचनाएं भी होती हैं और चिंता भी जताई जाती है। समय-समय पर यह सवाल भी उठता है कि क्या सिनेमा में गालियों का इस्तेमाल उनके चलने की गारंटी बन गया है? हाल ही में अमर उजाला के वैचारिक संगम संवाद में जब दिव्य प्रकाश दुबे शिरकत करने पहुंचे, तो उनसे भी इस विषय पर सवाल पूछा गया। जानिए उन्होंने क्या कहा?
टीवी से ओटीटी तक, लेखन में आया इस वजह से बदलाव
सिनेमा में गालियों के इस्तेमाल पर दिव्य प्रकाश दुबे, कहा कि इसमें संतुलन बनाना पड़ता है। संवाद में राइटर दिव्य प्रकाश दुबे से पूछा गया कि समय के साथ स्क्रिप्ट लेखन में बदलाव क्या आए हैं, डायलॉग बदले हैं, अब गालियां भी कहानी का हिस्सा बन गई हैं। कई बार गालियों की भरमार होती है। क्या इसकी वाकई जरूरत है? इस पर उन्होंने कहा, 'हमारी यादों में दूरदर्शन के सीरियल हैं, जब 'महाभारत' आता था, 'हम लोग' और 'बुनियाद' आता था। हफ्ते में वो एक बार आता था तो कुछ मिनट के शो को शूट करने और एडिट करने के लिए हमारे पास छह से सात दिन होते थे'। दिव्य ने आगे कहा, 'मैंने कुछ दिन एक चैनल में काम किया। वहां प्रोड्यूसर और राइटर आते थे। हम तय करते थे कि क्या जाएगा? तब हफ्ते में पांच दिन सीरियल आता था। उसे लिमिटिड लोकेशन पर ही उसे शूट भी करना है। हम काफी फ्री हो गए। कोई कहानी, जिसमें हमें जो तीन घंटे में बात कहनी थी, लेकिन एकदम से जब हमें दस घंटे मिले तो किसी किरदार को अंदर तक जान सकें।Amar Ujala Samwad 2025: अमर उजाला के मंच पर ‘छोरी 3’ का एलान, निर्देशक ने कहा- ‘अगला भाग जरूर बनेगा’
गाली कंटेंट के चलने की गारंटी नहीं
दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा, 'टीवी सीरियल लिमिटिड तरीके से लिखे जाते थे। फिर जब हमें ओटीटी पर दस घंटे मिले और समय की पाबंदी नहीं रही तो हम फ्री हो गए। यह हम राइटर्स के लिए बहुत बड़ा मौका था। यह सवाल अक्सर आता है कि क्या गाली डालने से कोई चीज चलती है? तो कहूंगा कि बिल्कुल नहीं चलती। कोई चीज तब चलती है, जब कोई बात किसी को टच करती है। फिर उसमें गाली है या नहीं है। हमारे पास कोई व्हॉट्सएप फॉरवर्ड आता है तो हम उसे और दस लोगों को बताते हैं'।
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जरूरत के हिसाब से संतुलन जरूरी है
दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा, 'फिल्म 'पान सिंह तोमर' को ही देखिए कि डकैत के जीवन पर फिल्म है और उसमें एक भी गाली नहीं है। संजय चौहान ने उसके डायलॉग लिखे थे। 'गली बॉय' फिल्म में लगभग एक भी गाली नहीं है, जबकि मुंबई के चॉल का जीवन है इसमें, यहां होनी चाहिए थी। अगर यहां गाली होनी चाहिए और उसे फिल्टर कर रहे हैं तो ये भी गलत है। मेरा मानना है कि जबरदस्ती गाली शामिल करना और जहां जरूरत है वहां से हटाना दोनों ही ठीक नहीं है। ऐसे में बैलेंस बनाना पड़ता है।' उन्होंने आगे कहा, 'राही मासूम रजा इतने बड़े लेखक हुए। उन्होंने किताब लिखी। उस पर इतनी बड़ी कंट्रोवर्सी हुई कि उन्होंने गाली लिखी तो उन्हें साहित्य अकादमी नहीं मिला। वे इतने बड़े राइटर थे। उन्होंने भी बैलेंस रखा'। दिव्य प्रकाश ने कहा कि कोई चैनल या डायरेक्टर ऐसा ब्रीफ नहीं देता कि भाई गाली डाल दो। ऐसा नहीं होता। आपको कोई बात छूती है, तब हम उसमें ऐसा करते हैं।