Nagesh Kukunoor: ‘थिएटर अब पॉपकॉर्न बेचने का अड्डा हैं’, नागेश कुकुनूर बोले- आज सिनेमा सिर्फ ट्रेंड पर चल रहा
Nagesh Kukunoor Interview: नेशनल अवॉर्ड विनर निर्देशक नागेश कुकुनूर ने थिएटर में फिल्मों के न चलने और मौजूदा वक्त के सिनेमा को लेकर कसा तंज।
विस्तार
फिल्ममेकर नागेश कुकुनूर एक सच्ची घटना पर आधारित वेब सीरीज ‘द हंट – द राजीव गांधी असैसिनेशन केस’ लेकर आए हैं। यह सीरीज अनिरुद्ध मित्रा की किताब ‘नाइंटी डेज: द ट्रू स्टोरी ऑफ द हंट फॉर राजीव गांधी असैसिन्स’ पर आधारित है। अमर उजाला से बातचीत में नागेश कुकुनूर ने इस वेब सीरीज को लेकर और सिनेमाघरों में दम तोड़ती कहानियों व ओटीटी को लेकर विस्तार से बात की।
जब आपको ये सीरीज ऑफर हुई, जो एक बड़े राजनीतिक मर्डर केस पर है, क्या डर या हिचक थी?
बिलकुल थी। मैंने साफ कहा था कि कुछ भी राजनीतिक नहीं करना है। लेकिन फिर समझ आया कि ये एक थ्रिलर है, एक पुलिस इन्वेस्टिगेशन ड्रामा। इसमें कोई बयानबाजी नहीं है, कोई एजेंडा नहीं है। सिर्फ दो पक्ष हैं एसआईटी और एलटीटीई। कहानी इन दोनों की नजर से ही कही गई है।
इतनी संवेदनशील, सच्ची घटना पर काम करते वक्त सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?
सबसे बड़ी चुनौती थी, सच्चाई के साथ न्याय करते हुए कहानी को ड्रामैटिक भी बनाना। रिपोर्टिंग में जो लिखा होता है, वो थर्ड पर्सन में होता है। पर स्क्रीन पर हमें असली लोगों के मुंह से वो बातें कहलवानी होती हैं, जो उन्होंने शायद कभी नहीं कही हों, पर कह सकते थे। इसके लिए रिसर्च, सहानुभूति और जिम्मेदारी तीनों चाहिए।
आपकी फिल्मों में गहराई होती है, लेकिन वो ग्लैमर या मसाला नहीं होता। ऐसा क्यों?
क्योंकि मसाला मेरी समझ में नहीं आता। बड़े सेट, आइटम सॉन्ग, एक्शन सीक्वेंस, मेरे लिए ये सब बाहर से थोपा गया लगता है। मैं किरदारों की दुनिया में जीता हूं। मुझे मजा आता है एक्टर के चेहरे पर काम करने में। क्लोज-अप्स में उनकी आंखों में जो कुछ भी छिपा होता है, उसे पकड़ना मेरा क्राफ्ट है। मैंने खुद एक्टिंग सीखी है, इसलिए जानता हूं कि एक्टर किन चीजों से असहज हो सकता है या किन हालातों में वो अपना बेस्ट देगा।
क्या आप बड़े स्टार्स से जानबूझकर बचते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। मैंने अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, कीर्ति सुरेश जैसे स्टार्स के साथ काम किया है। लेकिन सच ये है कि उनके साथ काम करना स्लो प्रोसेस होता है। स्क्रिप्ट भेजो, एजेंट से बात करो, डेट्स मिलें, फिर मीटिंग हो। मुझे ये सब बहुत स्लो लगता है। मैं जब एक कहानी पर काम शुरू करता हूं, तो चाहता हूं कि दो महीने में शूटिंग शुरू हो जाए। इसलिए अगर स्टार्स के साथ बात जमे, तो बढ़िया। नहीं जमे तो भी कोई बात नहीं।
आपकी फिल्म ‘धनक’ को नेशनल अवॉर्ड मिला, लेकिन थिएटर में ज्यादा लोग नहीं पहुंचे। ऐसा क्यों?
क्योंकि अब थिएटर सिर्फ स्टार पावर और टिकट प्राइस के खेल का हिस्सा बन चुका है। थिएटर्स पॉपकॉर्न बेचने का अड्डा मात्र रह गए हैं। जब 300- 400 रूपए की टिकट हो, तो कोई क्यों एक बिना स्टार वाली फिल्म देखने जाएगा? मैंने कई बार थिएटर मालिकों से कहा कि 100 रूपए की टिकट रखो, दोपहर का शो दो, लोग आएंगे। लेकिन उनके लिए बिजली, स्टाफ, किराया, ये सब निकालना होता है। आज थिएटर का कैलकुलेशन बदल गया है और उसमें हमारी जैसी फिल्में फिट नहीं बैठतीं।
क्या ओटीटी इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स के लिए नई उम्मीद है?
बिलकुल। ओटीटी ने हमें वो आजादी दी है, जो कभी थिएटर या डिस्ट्रीब्यूशन से नहीं मिली। यहां आपका कंटेंट ही आपकी ताकत है। यहां किसी की शक्ल या स्टारडम पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। सबसे बड़ी बात ये है कि एक बार फिल्म या सीरीज पूरी हो गई, तो आप अगली चीज पर ध्यान दे सकते हैं। यहां रिलीज या प्रमोशन की राजनीति नहीं है।
क्या आज सिनेमा सिर्फ ट्रेंड और एजेंडे के हिसाब से बन रहा है?
बिलकुल। जो चल रहा है, सब वहीं दौड़ रहे हैं। आज नेशनलिस्टिक फिल्में हिट हैं तो हर कोई वही बना रहा है। क्रिएटिविटी और कमाई के बीच बैलेंस खत्म हो गया है। एक सिंपल कॉमेडी भी 100 करोड़ रूपए में बनती है, जो 20 करोड़ रूपए में बन सकती थी, क्योंकि स्टार चाहिए, चेहरा चाहिए।
क्या अब दमदार लेकिन छोटी फिल्में बनाना नामुमकिन होता जा रहा है?
कठिन है और ये कोई नई बात नहीं है। हम जैसे इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स पिछले 15 साल से यही कहते आ रहे हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब सिर्फ बड़ी, दिखावटी फिल्में ही बचेंगी। छोटी फिल्में आज भी बनती हैं, लेकिन उन तक ऑडियंस पहुंच ही नहीं पाती। मेरी दो फिल्में बनकर रह गईं, रिलीज नहीं हो पाईं। इसलिए जब तक ओटीटी है, वहीं से कहानियां कहता रहूंगा। कम से कम कहानी तो जिंदा रहेगी।