Shehar Lakhot Review: दो-दो चंदनों के बाद भी नहीं महका ‘शहर लखोट’, भानुमती के कुनबे सरीखी नवदीप की वेब सीरीज
कोई 16 साल पहले अपनी पहली ही फिल्म ‘मनोरमा सिक्स फिट अंडर’ से फिल्म जगत का ध्यान अपनी तरफ खींचने वाले निर्देशक नवदीप सिंह अपनी पिछली फिल्म ‘लाल कप्तान’ के बाद से हाशिये पर रहे हैं। बीच में ‘पाताल लोक’ में उनका नाम स्क्रीन पर चमका था, लेकिन गाड़ी उनकी अब भी ‘एनएच 10’ पर ही अटकी है। वेब सीरीज ‘शहर लखोट’ नवदीप ने देविका भगत के साथ लिखी है और इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो आप पहले देख नहीं चुके हैं। इस अपराध कथा का आधार खनन है। संगमरमर की खदानों के आसपास कुछ आदिवासी धरना देकर बैठे हैं, उसके नेता को तोड़ने (जरूरत पड़े तो फोड़ने भी) गुरुग्राम से एक शातिर को भेजा जाता है। उसका अपना अतीत शहर लखोट में कहीं दबा है। भाई से उसकी बनती नहीं है। पुश्तैनी विरासत की ऐंठ में हर बात आधी अंग्रेजी और आधी हिंदी में करने वाले एक ‘हुकुम’ भी कहानी में हैं। अब लोग ‘हुकुम’ कहकर बुलाते हैं तो जाहिर है कि पुलिस को वह गरियाएंगे। दैहिक संबंधों की बगिया खिलाएंगे। और, वह सब करेंगे जिसकी झलक वेब सीरीज ‘आर्या’ में इला अरुण और उनका गिरोह पहले ही दिखा चुका है।
कहानी के नाम पर फीकी साबित हुई वेब सीरीज ‘शहर लखोट’ की दूसरी बड़ी दिक्कत इसकी पटकथा में है। आठ एपिसोड की ये सीरीज देखना अपने आप में चुनौती है। सारे एपिसोड एक साथ प्राइम वीडियो ने रिलीज कर दिए हैं और हर एक एपिसोड औसतन 50 मिनट के आसपास का है। इस सीरीज की पटकथा इतनी फैली हुई भी नहीं है कि हर एपिसोड में नए किरदार नमूदार होने के साथ इसका रायता फैलता जाए, लेकिन कहानी जमा जमाकर आगे बढ़ाने के चक्कर में नवदीप ने इसकी रफ्तार बहुत घटा दी है। जब सारे किरदार पहले ही एपिसोड में अपने पत्ते खोल चुके हैं तो फिर उसके बाद तुरुप के पत्ते बचाने के लिए नवदीप पुरानी गुलाटियां मारते तो हैं, लेकिन एक बार चूक जाने के बाद भी लौटकर पुरानी डाली पर लौट नहीं पाते। देविका भगत का साथ मिलने से उम्मीद यही थी कि सीरीज के महिला किरदारों का एक नया रुआब सीरीज में नजर आएगा। लेकिन, ‘दहाड़’ और ‘आर्या’ के बीच पेंडुलम सी डोलती इस कहानी में कभी ‘गन्स और गुलाब्स’ की महक आती है तो कभी सुनाई देती हैं ‘मिर्जापुर’ जैसी मुक्तहस्त गालियां।
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अभिनय के मामले में प्रियांशु पैन्यूली और चंदन रॉय को छोड़कर दूसरा कोई कलाकार प्रभावित नहीं करता है। प्रियांशु का देव का किरदार परतदार है। वह बीच बीच में अपने अतीत के सुर्रे छोड़ता रहता तो है लेकिन इसकी अतीत खुलने में कहानी इतनी सुस्त हो जाती है कि जब तक हादसे में मौत नहीं हो जाती है, कहानी में कहीं कोई चौंकाने वाला खुलासा होता नहीं है। प्रियांशु का लगातार गांजा पीते रहना भी उनके किरदार को कमजोर ही करता है हालांकि अपनी भाव भंगिमाओं से वह मामला संभाल लेते हैं। चंदन रॉय को ‘पंचायत’ सीरीज के बाद अपना अलग हुनर दिखाने का ये बढ़िया मौका मिला और इसे उन्होंने दोनों हाथों से भुनाया भी है। लेकिन, चंदन रॉय सान्याल के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। एक तो उनकी कद काठी रजवाड़ों के नवयुवकों जैसी कतई नहीं है। दूसरे उनके किरदार को स्याह बनाने के चक्कर में उसके ऐब इतने ज्यादा हो जाते हैं कि लगता है अति हो गई।
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वेब सीरीज ‘शहर लखोट’ के महिला किरदार भी बिना गुर्दा वाले हैं। कुब्रा सैत की तो कास्टिंग ही गलत है। उनके किरदार के लिए जो रुआब चेहरे पर चाहिए था, वह नजर नहीं आता। मनु ऋषि चड्ढा जरूर अपने किरदार में अलग अलग रंग लाने की कोशिश करते हैं लेकिन पहली बार परदे पर दिखने के बाद जो कुत्ता घसीटने का काम उन्होंने किया है, वह उनके किरदार को आगे दो टांगों पर खड़ा नहीं होने देता। श्रुति मेनन का काम सीरीज की कहानी में वह सब परोसना है, जो इतनी बार वेब सीरीज के दर्शक चख चुके हैं कि अब इस स्वाद में मजा नहीं रहा। सीरीज तकनीकी रूप से भी कुछ खास नहीं है। बैकग्राउंड म्यूजिक, सिनेमैटोग्राफी औसत है और संपादन लचर। अगर आपको अपने जीवन के आठ कीमती घंटे बचाने हैं तो इस सीरीज को देखने से पहले दो बार सोचें जरूर।