Ranneeti Balakot & Beyond Review: ‘तेजस’, ‘फाइटर’, ‘ऑपरेशन वैलेंटाइन’ और अब ‘रणनीति’, कहानी वही, सोच भी वही
इक्कीसवीं सदी की भागती दौड़ती जिंदगी में कोई न्यू मिलेनियल युवा इंस्टाग्राम, रेडिट और चैट जीपीटी का मोह छोड़कर करीब सात घंटे किसी वेब सीरीज को देखने में खर्च करने को तैयार है क्या? जवाब इन दिनों नेटफ्लिक्स पर प्रसारित हो रही गाय रिची की वेबसीरीज ‘द जेंटलमेन’ में तलाशा जा सकता है। दुनिया भर में नीले रंग वाली कहानियां बननी करीब-करीब बंद सी हो चुकी हैं। घटनाओं को हकीकत की जमीन पर तराशने का जमाना रफ्तार में हैं। और, मुंबई फिल्म जगत अपनी ही बनाई देशभक्ति की लीक को बीते पांच साल से इतनी ज्यादा बार पीट चुका है कि अब ट्रेलर देखते ही दर्शक मन बना लेता है, सीरीज देखनी है या नहीं। जियो सिनेमा की नई पेशकश ‘रणनीति-बालाकोट एंड बियॉन्ड’ के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है, इसका ‘तेजस’, ‘फाइटर’ और ‘ऑपरेशन वैलेंटाइन’ जैसी कहानी के ऐसे धरातल पर कदम रखना, जहां कदम कदम पर दर्शकों की अपेक्षाओं की लैंडमाइन्स बिछी हैं।
हिम्मत सिंह की नकल बनाने की कोशिश
निर्देशक नीरज पांडे की सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ में रॉ एजेंट बने अभिनेता के के मेनन से मिलते जुलते गेटअप वाला एक रॉ एजेंट यहां भी है। दंत चिकित्सक के बार बार मुंह और फैलाने को कहने, और फिर मरीज के ये कहने कि क्या मुंह में बैठकर दांत निकालेगे, वाले बीती सदी के बेहद घिसे पिटे चुटकुले से शुरू होने वाली ये पूरी सीरीज अपने आप में किसी चुटकुले से कम नहीं है। सीरीज का हीरो एक पुराने ‘ऑपरेशन’ के घाव अब भी सहला रहा है। और, अपना अधिकतर समय फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ने में बिता रहा है। किरदार थोड़ा फिल्मी है और इस सीरीज की कहानी उन फिल्मों जैसी ही है जो पुलवामा में आतंकवादियों की करतूत के बाद बालाकोट की एयरस्ट्राइक पर बनी हैं। अब इतनी सी कहानी को कोई एक लेखक तो दुनिया भर में घुमाकर प्वाइंट पर लाने से रहा तो यहां रमीज इलहाम खान, मैत्रेयी बाजपेयी, संजय चोपड़ा, सुदीप निगम और अनिरुद्ध गुहा जैसे दिग्गजों ने स्टोरी का वॉर रूम संभाला है। कहानी आपको पता है, पटकथा इनको इन्हीं कतारों के बीच लिखनी है, नतीजा आप समझ सकते हैं, क्या होने वाला है?
‘बियॉन्ड’ तक तो जा ही नहीं सकी सीरीज
वेब सीरीज ‘रणनीति-बालाकोट एंड बियॉन्ड’ देखने का मुख्य आकर्षण रहा है इसमें जिमी शेरगिल और लारा दत्ता की मौजूदगी। जिमी शेरगिल ने यहां हिम्मत सिंह बनने की कोशिश पूरी की है, लेकिन उनकी सारी कलाकारी कश्यप को करामाती रॉ एजेंट बनाने में इसलिए कम पड़ जाती हैं क्योंकि कहानी देखी देखी सी और जानी पहचानी सी लगती है। भारत से पाकिस्तान पहुंचने के लिए कहानी घुमावदार और लंबा रास्ता लेती है। और, वहीं आशुतोष राणा परदे पर लंबा ओवरकोट पहने स्लो मोशन में नमूदार होते हैं। विलेन का परदे पर प्रवेश जब उसके आतंक के बजाय कैमरे को 48 फ्रेम प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलाकर हो तो, समझ में तुरंत आ जाता है कि मामला जमाने के लिए निर्देशक के पास ज्यादा तंत्र मंत्र है नहीं। निर्देशक संतोष सिंह की कहानी, पटकथा या संवादों में हिस्सेदारी भी नहीं है, तो जो कुछ उन्हें मिला, वह उन्होंने कैमरे से पकाकर परोस दिया है।
फरमे में फंसते जा रहे जिमी शेरगिल
जिमी शेरगिल कमाल के अभिनेता रहे हैं। ओटीटी के दौर में तमाम दूसरे कलाकारों की तरह उनके दिन भी बहुरे हैं, लेकिन साल 2024 ओटीटी के लिए निर्णायक साल होने वाला है। तमाम ओटीटी एक दूसरे में घुलने मिलने वाले हैं और इसके बाद इन ओटीटी से मिलने वाले अथाह पैसों का सागर भी सिकुड़ने वाला है। दर्शक मनोरंजन सामग्री की संख्या गिनने की बजाय इनकी गुणवत्ता गिनने लगा है और इस डिजिटल थकान के बीच ‘रणनीति-बालाकोट एंड बियॉन्ड’ जैसी सीरीज में काम करना जिमी शेरगिल के लिए भी कम चुनौती भरा नहीं रहा होगा। सीरीज का दूसरा सीजन शायद ही बने लिहाजा पूरी सीरीज में एक अलग तरह की उदासी चेहरे पर ओढ़े रहे जिमी का आखिर में आकर मुस्कुराना भी इसे बचा नहीं पाता है। लारा दत्ता का अपना अलग आकर्षण रहा है। निर्देशक रुचि नारायण ने जिस बिंदास तरीके से उन्हें वेब सीरीज ‘हंड्रेड’ में पेश किया, वैसा कुछ तो यहां नहीं है लेकिन उनके आने से कहानी कुछ तो रौशन होती है।
आशुतोष से बंधी उम्मीदें भी बिखरीं
वेब सीरीज ‘रणनीति-बालाकोट एंड बियॉन्ड’ में सबसे ज्यादा जिस कलाकार ने निराश किया है, वह हैं अभिनेता आशुतोष राणा। यशराज फिल्म्स स्पाई यूनिवर्स ने उन्हें अदाकारी का अगला अध्याय लिखने का मौका दिया। लेकिन, वहां भी अब अनिल कपूर की आमद हो जाने की खबरें हैं। सो, आशुतोष फिर से स्याह किरदारों के चोले में हैं। बस दिक्कत ये है कि उनकी खुद सोशल मीडिया पर बनाई अपनी इमेज इस किरदार को यहां खिलने ही नहीं देती। आशीष विद्यार्थी का अभिनय सधा सधाया है, उनसे ज्यादा कुछ प्रयोग की उम्मीद भी नहीं रहती। प्रसन्ना जरूर प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। उनसे आने वाले समय में बेहतर किरदारों की उम्मीद हिंदी पट्टी के दर्शकों को बनी रहेगी।
संतोष सिंह का संतोषजनक प्रदर्शन
निर्देशक संतोष सिंह के पास यहां कुछ नया कर दिखाने को है नहीं। किरदारों के इंसानी भावों पर उनका जोर होना चाहिए था, लेकिन वहां वह चूके हैं। एक बंधे बंधाए फॉर्मेट वाला उनका निर्देशन कलाकारों की जाती जिंदगी में गहराई से झांकने की वैसी सधी कोशिश नहीं करता जैसी नीरज पांडे ने हिम्मत सिंह के किरदार के लिए की थी। फिर भी उनकी मेहनत को पास होने लायक नंबर दिए जा सकते हैं। सीरीज ‘रणनीति-बालाकोट एंड बियॉन्ड’ के स्पेशल इफेक्ट्स टीम का काम देखकर लगता है कि उन्होंने ‘तेजस’, ‘फाइटर’ और ‘ऑपरेशन वैलेंटाइन’ के लिए बने फाइटर जेट्स के कंप्यूटर जनित सीन हू ब हू उठा लिए हैं। सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक स्टॉक कलेक्शन से बना दिखता है। कुछ नोटिस करने लायक इस सीरीज में है तो वह है इसके निर्माताओं के नामों की अंग्रेजी की वर्तनी।