Ranjish Hi Sahi Review: जियो स्टूडियोज ने बनाई महेश भट्ट की अधपकी सी प्रेम कहानी, ताहिर की बतौर हीरो खराब बोहनी
कभी आपने सोचा कि ये विदेशी ओटीटी पर दिखने वाले ‘मनी हाइस्ट’, ‘ब्लैकलिस्ट’, ‘स्क्विड गेम्स’, ‘गेम्स ऑफ थ्रोन्स’ या फिर ‘हॉकआई’ जैसे शोज हिंदी में क्यों नहीं बनते? वजह आपको वूट सेलेक्ट पर रिलीज हुई नई वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ देखकर समझ आ सकती है। अहमद फराज की लिखी गजल ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ...!’ जैसी भावनाएं इस सीरीज के रचयिता महेश भट्ट में बीते तमाम दशकों से उछाल मारती रही हैं। जिंदगी को उन्होंने करीब से देखा भी है, जिया भी है। भोगा भी है, भुगता भी है। जब तक वह अपने इन हालात से निकली कहानियों को लेकर ईमानदार रहे। उनकी खूब इज्जत हुई। फिर वह नए निर्देशकों को सामने फर्श पर बिठाकर दरबार लगाने लगे। फर्श पर बैठने वाले ये निर्देशक अर्श पर पहुंच गए। महेश भट्ट वहीं सोफे पर पालथी लगाए रह गए। हां, उनके सामने फर्श पर बैठने वाले नए नवेलों की तादाद अब भी कम नहीं है। वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ महेश भट्ट के गुरबत के दिनों से निकली वह कहानी है जिसे पिछली पीढ़ी थिएटर में फिल्म ‘अर्थ’ के नाम से पहले ही देख चुकी है और मार्वेल सिनेमैटिक यूनीवर्स से दिल लगा चुकी पीढ़ी को ऐसे किसी निर्देशक की निजी कहानी में दिलचस्पी नहीं है।
वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ जैसी कहानियां ही देसी ओटीटी पर क्यों बनती है, ये जानना जरूरी है क्योंकि इसकी वजह से में ही हिंदी मनोरंजन जगत के तेजी से नीचे जाते ग्राफ की वजह छुपी है। एक दक्षिण भारतीय सिनेमा ‘पुष्पा पार्ट वन’ ने हिंदी के दिग्गजों को हिला दिया है। अब सब दिन रात सोशल मीडिया पर अल्लू अर्जुन के गुणगान कर रहे हैं। लेकिन, कोई ये नहीं सोच रहा कि आखिर लाल चंदन की तस्करी की रिसर्च से निकली ये कहानी उनके पास क्यों नहीं पहुंची? हिंदी सिनेमा ने कहानियों में निवेश करने की परंपरा मार दी है। वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ जैसी कहानियां बार बार निचोड़ने वालों के यहां अब राइटर्स रूम तो बचे हैं, राइटर्स नहीं हैं। इसकी बड़ी वजह हिंदी सिनेमा की वह मठाधीशी है जिसकी झलक वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ में भी दिखती है। यहां निर्देशक बनने के लिए एक अदद नामचीन हीरोइन चाहिए। हिंदी सिनेमा का निर्माता पैसा कहानी से पहले सितारे पर लगाता है। और, कहानी तो उसको लगता है हर राइटर उसके दफ्तर में मुफ्त ही छोड़ जाए।
वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की कहानी में दम नहीं है। और, यही इस सीरीज की सबसे कमजोर कड़ी है। महेश भट्ट और परवीन बाबी की प्रेम कहानी में दिलचस्पी रखने वाले लोग यह देखने के लिए तो सीरीज देख सकते हैं कि आखिर दोनों के बीच हुआ क्या था? लेकिन, ऐसा कुछ खास सीरीज में है नहीं जो इससे पहले गॉसिप पत्रिकाओं में छप न चुका हो। ओशो आश्रम पहुंचे विनोद खन्ना से लेकर कबीर बेदी के परवीन बाबी के प्रेम प्रसंग तक सब कुछ यहां इशारों इशारों में बताए गए हैं। अमिताभ बच्चन वाला प्रसंग भी अपनी पूरी गर्मी के साथ बाहर आता तो चोट शायद सही होती, लेकिन फिल्म ‘सड़क 2’ के बाद विशेष फिल्म्स बंद करने का ऐलान करने वाले भट्ट बंधु यहां बहुत सेफ खेल रहे हैं। फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ का नाम तक फिल्म में लेने की हिम्मत उनकी नहीं होती, वे इसकी जगह ‘अजय अनवर अलबर्ट’ का पोस्टर दिखाते हैं। कंपनी भी दोनों भाइयों ने नई बना ली है। बस, कहानी वे नई नहीं खोज पाए।
महेश भट्ट की पाठशाला नए कलाकारों और तकनीशियनों के बड़े इम्तिहान लेती है। जो इस पाठशाला के शुरुआती सबक पढ़कर यहां से भाग निकला, हिंदी फिल्म उद्योग में भला बस उसी का हो पाया। वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ के लेखक निर्देशक पुष्पराज भारद्वाज की फिल्म मेकिंग अब भी उनकी फिल्म ‘जलेबी’ पर ही अटकी है। सिनेमा दिखाने का माध्यम है, इसमें बताने का काम बेहद मजबूरी में तो करना ठीक है लेकिन आधी कहानी अगर बोलकर ही सुनानी है तो फिर पॉडकास्ट ही क्या बुरा है? वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की सबसे कमजोर कड़ी इसकी कहानी औऱ इसकी पटकथा है। दूसरे नंबर पर जहां ये सीरीज मात खाती है वह है इसकी कास्टिंग।
ये अच्छा है कि यशराज टैलेंट्स के कलाकार ताहिर राज भसीन को उन भट्ट बंधुओं की सीरीज में लीड रोल मिला, जिनका यशराज फिल्म्स से शुरू से 36 का आंकड़ा रहा। लेकिन लीड रोल के लालच भर में ताहिर को ये किरदार करना नहीं चाहिए था। वह काबिल अभिनेता हैं। पर उनके अभिनय की रेंज निखरनी अभी बाकी है। महेश भट्ट की शख्सीयत जैसा जटिल किरदार करने का माददा हिंदी सिनेमा के कम अभिनेताओं में ही है। अमला पॉल और अमृता पुरी दोनों ने अपनी तरफ से कहानी के मुताबिक किरदार करने में मेहनत पूरी की है लेकिन जैसा ग्लैमर का रुतबा और जैसा कलेजा कचोट लेने वाला एहसास ‘वो’ और ‘पत्नी’ के किरदारों में दिखना जरूरी था वह यहां है नहीं। यही काम फिल्म ‘अर्थ’ में स्मिता पाटिल और शबाना आजमी ने शानदार तरीके से किया था।
वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ के एक सीजन के लिए कहानी का कालखंड भी इतना लंबा होना खटकता है। सीरीज में बीती सदी के छठे दशक से लेकर नई सदी के पहले दशक तक का सिलसिला समेटना इसकी टीम पर भारी पड़ गया है। मेकअप, हेयरस्टाइल, लोकेशन और बैकग्राउंड म्यूजिक तक सब शुरू से लेकर आखिर तक भ्रमित ही दिखते हैं। हां, घडियों की मरम्मत करने वाले ‘वाचमैन’ वाला एंगल अच्छा है। महेश भट्ट की फिल्मों का संगीत उनके चाहने वालों की पहली पसंद रहा है लेकिन मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते उनके समय की तरह अब उनके काबू में कुछ रहा दिखता नहीं है। न अच्छा सिनेमा। न अच्छा दरबार।