Maidaan Review: बायोपिक में अजय देवगन की चौंकाने वाली अदाकारी, देखिए कहानी एस ए रहीम की और बोलिए ईद मुबारक
हालात उन दिनों देश में ठीक नहीं थे। खाड़कुओं की बंदूकें उत्तर भारत में खूब गरज रही थीं। स्कूल-कॉलेजों तक में इनका असर दिख रहा था और तभी एक फिल्म रिलीज हुई ‘हिप हिप हुर्रे’! गुलजार ने इसकी पटकथा, संवाद और गीत लिखे थे। हालांकि, विकीपीडिया पर गुलजार की फिल्मोग्राफी में साल 1984 में रिलीज इस फिल्म का जिक्र नहीं मिलेगा। ध्यान रहे कि साल 1983 में भारत ने पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता था और उसके बाद से इस देश में क्रिकेट खेल से आगे निकलकर क्या क्या बन चुका है, किसी से छुपा नहीं है। प्रकाश झा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘हिप हिप हुर्रे’ अगर आपने देखी है तो इसके हीरो संदीप चौधरी का अक्स आपको फिल्म ‘मैदान’ देखते समय अजय देवगन के किरदार सैयद अब्दुल रहीम में बार बार याद आएगा। कहानी की अंतर्धारा वैसी ही है। बस समय थोड़ा और पीछे का है। सैयद अब्दुल रहीम ने हालांकि ये कारनामा जो किया, उसकी कहानी न कभी इतिहास में और न कभी खेल के मैदानों पर छात्रों को बताई गई। इस लिहाज से अजय देवगन और बोनी कपूर दोनों ने ये बड़ा काम किया है, देश के एक अनसुने लाल पर इतनी मेहनत से इतनी शानदार फिल्म बनाकर।
हिंदी सिनेमा के लिए फुटबॉल का खेल एलियन जैसा ही रहा है। ‘दे दना दन गोल’ जैसी इक्का दुक्का फिल्मों को छोड़ दें तो हौसले की मजबूती और पैरों की फुर्ती वाले इस खेल को ज्यादा तवज्जो सितारों ने दी नहीं है। फिल्म ‘मैदान’ के निर्देशक अमित शर्मा और इसके निर्माता बोनी कपूर का साथ कोई 10 साल पुराना है। दोनों पहली बार फिल्म ‘तेवर’ के लिए मिले। फिर अमित शर्मा ने ‘बधाई हो’ बनाई और 2019 में रिलीज इस फिल्म के बाद का उनका अब तक का जीवन फिल्म ‘मैदान’ के लिए ही रहा है। बड़े मुश्किलों से सिनेमाघरों तक पहुंची फिल्म ‘मैदान’ इस लिहाज से एक कालजयी फिल्म है कि इसे कोई बरसों बाद मोबाइल पर भी देखेगा तो इसे बनाने वालों और इसमें काम करने वालों का काम देखकर उसका दिल खुश हो जाएगा। तो दिल खुश कर देने वाली इस फिल्म की कहानी बस इतनी सी ही है कि अपनी धुन में खोया फुटबॉल का एक दीवाना एक दिन दुनिया के सामने फुटबॉल के मैदान में तिरंगा फहराने की ठान लेता है। समय फिल्म ‘मैदान’ के लिए बहुत अच्छा नहीं है लेकिन फिल्म ईद पर रिलीज हो रही है और कहानी सैयद अब्दुल रहीम की है तो ईदी मिलनी तो बनती है।
अजय देवगन को उनके भीतर से हिला देने वाला किरदार मिले तो वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। और, किरदार असली जैसा हो तो फिर तो वह एक ही साल में ‘कंपनी’ भी कर लेते हैं और ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ भी। असल किरदारों को उनके पूरे ताव के साथ जीने का ताप अजय देवगन ने फिल्म ‘तानाजी’ तक वैसे का वैसा ही बनाए रखा और अब सैयद अब्दुल रहीम। फख्र होगा ये फिल्म देखकर अजय देवगन के हर प्रशंसक को और हिंदी सिनेमा का आम दर्शक इस बात से खुश होगा कि अब भी हिंदी सिनेमा में कुछ लोग तो हैं जो देश की, इसकी मिट्टी की, इसकी इंसानियत की और इसकी गंगा जमुनी तहजीब को बचाए हुए हैं। फिल्म इंटरवल से पहले एक घंटे की है और इंटरवल के बाद दो घंटे की। आमतौर पर होता इसका उल्टा है लेकिन अमित शर्मा को भी तो ढर्रे तोड़ने में ही महारत हासिल है।
बोनी कपूर, अमित शर्मा और अजय देवगन की तिकड़ी ने फिल्म ‘मैदान’ के जरिये जो कमाल रचा है, उसकी गूंज राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर तमाम दूसरे पुरस्कारों तक में दिखने वाली है। हाशिये पर पड़े लोगों को लेकर टीम बनाने और फिर उन्हें चैंपियन बनाने का एक असली किस्सा दर्शक हालांकि अमिताभ बच्चन की नागराज मंजुले निर्देशित फिल्म ‘झुंड’ में भी देख चुके हैं, लेकिन यहां बात कुछ और है और इसका रंग ही कुछ और है। अजय देवगन ने ये फिल्म अपनी मेहनत से सींची है। बोनी कपूर का इस विषय पर भरोसा उन्हें हिंदी सिनेमा के निर्माताओं की सबसे आगे की कतार से भी आगे ले आता है और अमित शर्मा ने इसे बनाने के लिए जिस तरह चुन चुनकर कलाकार तलाशे और तराशे हैं, उसके किस्से अभी बरसों तक चर्चा में रहेंगे। रितेश शाह के लिखे फिल्म के संवादों के साथ भी यही होने वाला है।
फिल्म ‘मैदान’ में मनोज मुंतशिर और ए आर रहमान की जुगलबंदी से बने लेकिन सुने सुने से लगने वाले गीत-संगीत को और रहीम के बार बार सिगरेट पीने वाले दृश्यों को अगर इसके कमजोर पक्ष मानकर थोड़ी देर के लिए किनारे रख दें, तो तकनीकी रूप से भी ये एक अच्छी फिल्म बन पड़ी है। फिल्म की कहानी के हिसाब से इसके कालखंड को अमित शर्मा ने फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइनर ख्याति मोहन कंचन और इसके सिनेमैटोग्राफर तुषार कांति रे के साथ मिलकर खूब अच्छे से जमाया है। खेल वाले हिस्सों की सिनेमैटोग्राफी के लिए अमित ने फ्योदोर ल्यास की मदद ली है और शुरू में थोड़ी सुस्त सी लगती फिल्म इंटरवल के बाद जब रफ्तार पकड़ती है तो दर्शकों को परदे से आंखें हटाने का मौका ही नहीं मिलता और यहीं फिल्म का संपादन करने वाले देव राव जाधव का काम निखरकर सामने आता है। फिल्म अच्छी बन पड़ी है और देश में फुटबॉल के प्रेमियों की संख्या भी ‘हिप हुप हुर्रे’ के रिलीज होने के साल 1984 के 40 साल बाद कई गुना बढ़ चुकी है। फिल्म टेलीग्राम और दूसरी तमाम देसी-विदेशी वेबसाइट्स पर लीक हो चुकी है। लेकिन, इस फिल्म का असली मजा सिनेमाघरों में ही है।
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