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लव गेम्स समीक्षा: कुछ भी नहीं छोड़ता छाप
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
Updated Fri, 08 Apr 2016 03:35 PM IST
सार
- -निर्माताः टी सीरीज-विशेष फिल्म्स
- -निर्देशक-लेखकः विक्रम भट्ट
- -सितारेः गौरव अरोड़ा, पत्रलेखा, तारा अलीशा बेरी
- रेटिंग *1/2
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विस्तार
सेक्स विषयक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लॉटरी की तरह होती हैं। भट्ट कैंप अक्सर उन पर दांव खेलता है। उसका तर्क है कि ऐसी फिल्मों के बहाने वह नई, अत्याधुनिक महिला की छवि को पेश करता है। परंतु सच यह है कि उसका लक्ष्य इन बातों की आड़ में विवाहेतर/उच्छृंखल यौन संबंधों के कामुक दृश्य दिखा कर बॉक्स ऑफिस पर धन बटोरना होता है।
स्त्री की तरक्की, उसकी आजादी को लेकर बड़ी बातें करने वाले कैंप की लव गेम्स इसका सटीक उदाहरण है। इस फिल्म की नायिकाएं कहीं से तरक्की की दिशा में बढ़ रहे समाज की नहीं दिखतीं। वे कतई मजबूत नहीं हैं। वे मजबूर, कमजोर, शोषित-पीड़ित हैं। यह सब उन्हें लेखक-निर्देशक विक्रम भट्ट की देन है।
समाज के बदलते चेहरे को दिखाने का दावा करने वाले भट्ट कैंप की यह एक और कमजोर, कच्ची और कई मायनों में कमतर फिल्म है। अगर आपमें थोड़ी भी संवेदनशीलता और समझदारी है तो इसे देखना खुद को किसी यंत्रणा में झोंकने की तरह है।
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स्त्री की तरक्की, उसकी आजादी को लेकर बड़ी बातें करने वाले कैंप की लव गेम्स इसका सटीक उदाहरण है। इस फिल्म की नायिकाएं कहीं से तरक्की की दिशा में बढ़ रहे समाज की नहीं दिखतीं। वे कतई मजबूत नहीं हैं। वे मजबूर, कमजोर, शोषित-पीड़ित हैं। यह सब उन्हें लेखक-निर्देशक विक्रम भट्ट की देन है।
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समाज के बदलते चेहरे को दिखाने का दावा करने वाले भट्ट कैंप की यह एक और कमजोर, कच्ची और कई मायनों में कमतर फिल्म है। अगर आपमें थोड़ी भी संवेदनशीलता और समझदारी है तो इसे देखना खुद को किसी यंत्रणा में झोंकने की तरह है।
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संबंध सिर्फ कामवासना के हैं
लव गेम्स युवा रमोना रायचंद (पत्रलेखा) की कहानी हैं, जिसके बूढ़े पति की फ्लैट से गिरकर मौत के साथ फिल्म शुरू होती है। कमसिन पत्नी और बूढ़ा पति! कुछ ही पलों में आप पाते हैं कि अथाह दौलत की मालकिन रमोना की जिंदगी में एक नशाखोर इंसान समीर सक्सेना उर्फ सैम (गौरव अरोड़ा) है। रमोना उसे अपना ‘सेक्स बडी’ बताती है।
दोनों के संबंध सिर्फ कामवासना के हैं। परंतु जब वे आपस में ऊबने लगते हैं तो रमोना उसे एक किताब के बारे में बताती हैः लव गेम्स। इसमें वह एक खेल चुनते हैं कि पेज थ्री पार्टियों में ऐसे युगल को अपना निशाना बनाएंगे, जो सबसे आकर्षक हो। रमोना पुरुष को रिसाएझी और सैम स्त्री को।
दोनों में जो पहले बिस्तर तक पहुंचेगा वह जीतेगा! एक पार्टी में दोनों पति-पत्नी एडवोकेट गौरव (हितेन तेजवानी) और अलीशा (तारा अलीशा बैरी) से मिलते हैं। यहां गौरव रमोना के जाल में फंसता है और सैम को तारा से सचमुच प्यार हो जाता है!
दोनों के संबंध सिर्फ कामवासना के हैं। परंतु जब वे आपस में ऊबने लगते हैं तो रमोना उसे एक किताब के बारे में बताती हैः लव गेम्स। इसमें वह एक खेल चुनते हैं कि पेज थ्री पार्टियों में ऐसे युगल को अपना निशाना बनाएंगे, जो सबसे आकर्षक हो। रमोना पुरुष को रिसाएझी और सैम स्त्री को।
दोनों में जो पहले बिस्तर तक पहुंचेगा वह जीतेगा! एक पार्टी में दोनों पति-पत्नी एडवोकेट गौरव (हितेन तेजवानी) और अलीशा (तारा अलीशा बैरी) से मिलते हैं। यहां गौरव रमोना के जाल में फंसता है और सैम को तारा से सचमुच प्यार हो जाता है!
विक्रम भट्ट ने किरदारों को गहरे रहस्यों से भरा दिखाने की कोशिश की है
विक्रम भट्ट ने किरदारों को गहरे रहस्यों से भरा दिखाने की कोशिश की है, परंतु वे उथले ही रहे। सैम का प्यार में इसलिए भरोसा नहीं कि उसकी मां अपने पति को छोड़ कर किसी और के साथ चली गई थी।
रमोना सेक्स के आगे कुछ इसलिए नहीं सोचती कि मामा ने उसका यौनशोषण किया था और बॉयफ्रेंड गर्भवती छोड़ कर चला गया था। गौरव सिर्फ बीवी पर शक करता और उसे पीटता है। आलीशा ने मां-बाप की मर्जी के विरुद्ध शादी की थी इसलिए वह डॉक्टर होने के बावजूद मार खाती रहती है।
थ्रिल पैदा करने के चक्कर में विक्रम कहानी की सहजता को बरकरार नहीं रख सके। हालांकि यह थ्रिल भी 1980 के दशक की सस्ती अमेरिकी फिल्मों की नकल जैसा या सड़कछाप सस्ते उपन्यासों जैसा है।
रमोना सेक्स के आगे कुछ इसलिए नहीं सोचती कि मामा ने उसका यौनशोषण किया था और बॉयफ्रेंड गर्भवती छोड़ कर चला गया था। गौरव सिर्फ बीवी पर शक करता और उसे पीटता है। आलीशा ने मां-बाप की मर्जी के विरुद्ध शादी की थी इसलिए वह डॉक्टर होने के बावजूद मार खाती रहती है।
थ्रिल पैदा करने के चक्कर में विक्रम कहानी की सहजता को बरकरार नहीं रख सके। हालांकि यह थ्रिल भी 1980 के दशक की सस्ती अमेरिकी फिल्मों की नकल जैसा या सड़कछाप सस्ते उपन्यासों जैसा है।
इक्का-दुक्का पलों को छोड़ कर पत्रलेखा सेक्स एडिक्ट की भूमिका में मिसफिट हैं
फिल्म में कुछ भी अपनी छाप छोड़ता। टाइटल लव गेम्स, ट्रेलर और पोस्टर से भले इसमें कामोत्तेजक दृश्यों की भरमार का आभास हो परंतु ऐसा नहीं है। अगर कोई इनके चक्कर में भी जाएगा तो निराश होगा। पत्रलेखा का व्यक्तित्व फिल्मी भव्यता के बीच सिटी लाइट्स की ग्रामीण महिला जैसा ही लगता है।
इक्का-दुक्का पलों को छोड़ कर वह सेक्स एडिक्ट की भूमिका में मिसफिट हैं। लाइट-कैमरा-पोशाकें और मेक-अप भारी पड़ जाते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद वह मर्दखोर औरत जैसी नहीं दिखती।
गौरव का ट्रेक एकरंगी है। निराश और उदास। अलीशा के प्यार में होने के बावजूद उनके चेहरे पर रंगत नजर नहीं आती। यही स्थिति आलिशा की है। यहां केवल एक गीत दिलकश हैः आवारगी से दिल भर गया। लेकिन उसे आप यूट्यूब से लेकर कहीं भी सुन/देख सकते हैं।
इक्का-दुक्का पलों को छोड़ कर वह सेक्स एडिक्ट की भूमिका में मिसफिट हैं। लाइट-कैमरा-पोशाकें और मेक-अप भारी पड़ जाते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद वह मर्दखोर औरत जैसी नहीं दिखती।
गौरव का ट्रेक एकरंगी है। निराश और उदास। अलीशा के प्यार में होने के बावजूद उनके चेहरे पर रंगत नजर नहीं आती। यही स्थिति आलिशा की है। यहां केवल एक गीत दिलकश हैः आवारगी से दिल भर गया। लेकिन उसे आप यूट्यूब से लेकर कहीं भी सुन/देख सकते हैं।