Illegal Season 2 Review: अश्विनी चौधरी के निर्देशन का करिश्मा, इस सप्ताहांत बिंच वॉच के लिए सही पसंद
कानून के हाथ लंबे होते हैं, ये सिर्फ एक जुमला भर हो सकता है लेकिन कानून को पृष्ठभूमि में रखकर मानवीय संवेदनाओं की चौहद्दी नापती कहानियां हर समय अपना असर छोड़ती रही हैं। ओटीटी पर ऐसी कहानियों की मांग खूब होती है। हर ओटीटी के पास अपना अपना कोई न कोई लीगल शो है, लेकिन वूट इस मामले में थोड़ा अलग है क्योंकि इसके शो का नाम ही ‘इललीगल’ है। वेब सीरीज ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन गुरुवार को रिलीज हो चुका है। और, शो के नैन नक्श बताते हैं कि वूट सेलेक्ट को आखिरकार अपनी किसी सीरीज में वह स्तर हासिल हो चुका है जिसकी कमी उसके अधिकतर शोज में महसूस की जाती रही है। अपनी पहली ही फिल्म में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले निर्देशक अश्विनी चौधरी ने इस बार ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन के निर्देशन का जिम्मा संभाला है और उनके निर्देशन की छाप इस सीरीज के हर एपीसोड पर साफ नजर आती है। हिंदी सिनेमा के काबिल निर्देशकों में शुमार अश्विनी ने एक पेशेगत दुश्मनी में इंसानी जज्बात घोलकर कानून की पृष्ठभूमि में ऐसा कैनवास खींचा है, जिस पर पड़े काले सफेद रंगों के छींटे भी इंद्रधनुषी लगने लगे हैं।
वेब सीरीज ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन शुरुआत से ही कहानी का विस्तार दिखा देता है। दिल्ली के राजपथ पर भागती निहारिका और देश चलाने वाले इलाके में दिखा जेटली अपने अपने किरदारों के भूगोल के साथ साथ उनका मनोविज्ञान भी दर्शकों के सामने स्थापित करने में सफल रहते हैं। कहानी एक वकील के राजनीति में आने और इस दौरान अपने पेश में टक्कर दे सकने वाले वकील की निजी और पेशेगत जिंदगी में रायता फैलाने वाले बांसों पर खिचें तार पर संतुलन बनाए रखने की है। बेटा यहां बाप से बढ़कर है। और अपने भरोसेमंद सिपहसालार की बेइज्जती करके अपने बेटे को अपनी कंपनी की कमान संभालने वाला बाप पहले फ्रेम से काइयां दिखता है। कहानी में दिलचस्प कानूनी पेंच हैं। अनुभव के सामने जोश और हौसले का मोर्चा है और महिला सशक्तीकरण के साथ साथ डिजिटल दौर के दांव पेंचों से आगे बढ़ती ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन की कहानी अगले सीजन का बीज बोकर अपने फैसले पर पहुंचती है।
अश्विनी चौधरी ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन के उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) हैं। किरदार वहीं हैं, कलाकार भी अधिकतर वहीं हैं, बस निर्देशक का नजरिया बदल जाने से एक औसत सीरीज कैसे एक दमदार सीरीज में तब्दील हो सकती है, ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन इसका सही उदाहरण है। अश्विनी के निर्देशन में दर्शकों को किरदारों को पहले दूर से देखने की आदत लगती है और जैसे जैसे एहसास दर्शकों के दिल से जुड़ने शुरू होते हैं, वह दर्शकों को कहानी का हिस्सा इतने आहिस्ता से बनाते हैं कि खुद दर्शक को पता ही नहीं चलता। उनके निर्देशन में एक काल्पनिक कथा में असलियत की प्रतिक्रियाओं को जोड़ लेने की अनोखी क्षमता शुरू से रही है। इन दिनों कारगिल की कहानियों का बहुत शोर है लेकिन अश्विनी की बनाई ‘धूप’ अब भी इन सारी फिल्मों पर भारी है। वह बागी फिल्ममेकर हैं और इस चक्कर में वह भीड़ में शामिल भी नहीं होते। उनके सिनेमा में भी ये झलकता रहा है और अब ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन में इसका फायदा ओटीटी मनोरंजन जगत को भी मिल रहा है।
वेब सीरीज ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन को इसकी मजबूत लेखन टीम से भी अच्छी मदद मिलती दिखती है। अद्वैत काला और अभिजीत देशपांडे ने मिलकर कहानी का विस्तार प्रभावशाली तरीके से किया है। निहारिका और जेटली की कहानियों को समानांतर शुरू करके और इनके बीच दूसरे किरदारों के सहारे पुल बनाते रहने के बाद दोनों कहानियों का ताप बढ़ाते रहने की खास कारीगरी इसकी पटकथा में दिखती है। अपर्णा नादिग के संवाद कहीं कहीं बहुत जोरदार बन पड़े हैं जैसे, ‘मैच्योरिटी ना स्टूपिडिटी के बाद आती है।’ सीरीज की भाषा को हिंदुस्तानी की बजाय मेट्रोस्तानी रखा गया है और इसके पीछे शायद लक्ष्य उन युवाओं का ध्यान खींचना है जो इन दिनों ओटीटी की सामग्री सबसे ज्यादा खपाते हैं। संतोष थुंडियल का कैमरा यहां अश्विनी चौधरी के सजोए कैनवस पर कूची का काम करता है। वह शो का ग्लैमर बढ़ाने और इसे अंतर्राष्ट्रीय लुक देने में काफी हद तक सफल रहे हैं। सलीम सुलेमान का रचा टाइटल ट्रैक भी सीरीज का मूड सेट करने में कामयाब है।
कलाकारी के लिहाज से ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन नेहा शर्मा को उनके करियर में चार कदम और आगे ले आया है। निहारिका के अपने करियर में लगातार आगे बढ़ते रहने के संकल्प को और पुरुषसत्ता से सीधे भिड़ने के उसके हौसले को नेहा ने वास्तविकता के करीब रखने में सफलता पाई है। अक्षय ओबेरॉय की अदाकारी का अपना सेट पैटर्न है और वह उसी टेम्पलेट के सहारे इस किरदार को भी जीदते हैं। सीरीज का सबसे खुशनुमा एहसास है सत्यदीप मिश्रा की अदाकारी। सत्यदीप के अंदर अभिनय की एक ऐसी लौ है जिसकी रोशनी भरपूर तरीके से हिंदी सिनेमा को अब भी महसूस करना बाकी है। बाकी कलाकारों में अचिंत कौर, पारुल गुलाटी के साथ साथ तनुज ने भी अपने हिस्से का काम बखूबी निभाया है। जेटली के किरदार में पीयूष मिश्रा की अदाकारी और उनकी संवाद अदायगी ऐसी है कि उसे समझने के लिए दर्शक को बहुत सतर्क रहना होता है। अपने किरदार में वह इतने सहज रहते हैं कि कलाकार की अपनी छाया उस पर हमेशा बनी रहती है। इस सप्ताहांत बिंज वॉच के लिए अगर आप कोई नई वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो ‘इललीगल’ उसके लिए बिल्कुल फिट है।